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पाकिस्तान पस्त : मध्य पूर्व तनाव और होर्मुज स्ट्रेट संकट से खाद की किल्लत से सरकार परेशान

नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के बीच पाकिस्तान खाद संकट का सामना कर रहा है, जिससे उसकी कृषि अर्थव्यवस्था की बड़ी कमजोरियां सामने आ रही हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि होर्मुज स्‍ट्रेट बंद होने से वैश्विक उर्वरक बाजारों में बड़ा झटका लगा है। इसके चलते यूरिया की कीमतें एक महीने से भी कम समय में लगभग 47 प्रत‍िशत तक बढ़ गई हैं।

डेली मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि वह यूरिया उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर है, लेकिन इस भू-राजनीतिक संकट ने यह दिखा दिया है कि वह फॉस्फेट आधारित उर्वरकों, खासकर डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है।

यह असंतुलन इस बात को दिखाता है कि कई वर्षों की नीतियों ने एक तरफ यूरिया उत्पादन को मजबूत किया, लेकिन दूसरी तरफ डीएपी जैसे उर्वरकों की आपूर्ति को कमजोर छोड़ दिया।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की उर्वरक नीति लंबे समय से घरेलू उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस पर सब्सिडी देने पर केंद्रित रही है, जिससे देश में यूरिया का बड़ा उत्पादन हो सका। इसी वजह से पाकिस्तान अपनी नाइट्रोजन आधारित उर्वरक की जरूरत ज्यादातर देश में ही पूरी कर लेता है। लेकिन, फॉस्फेट उर्वरकों को लेकर ऐसी कोई मजबूत नीति नहीं बनाई गई, जिसके कारण डीएपी पूरी तरह आयात पर निर्भर हो गया।

डीएपी पाकिस्तान की कुल उर्वरक खपत का लगभग 15-18 प्रत‍िशत हिस्सा है और यह गेहूं, चावल और कपास जैसी प्रमुख फसलों के लिए बहुत जरूरी है।

यूरिया के विपरीत, डीएपी बनाने के लिए रॉक फॉस्फेट की जरूरत होती है, जो पाकिस्तान में मौजूद नहीं है। देश में इसका उत्पादन बहुत सीमित है और यह मुख्य रूप से फौजी फर्टिलाइजर कंपनी के एक ही प्लांट (पोर्ट कासिम) में होता है, जो सालाना करीब 8 लाख टन उत्पादन करता है। जबकि देश की कुल मांग 13 लाख से 23 लाख टन के बीच रहती है।

अब यह आपूर्ति की कमी अंतरराष्ट्रीय हालात से और बढ़ गई है। दुनिया के लगभग 20 प्रत‍िशत फॉस्फेट व्यापार होर्मुज स्‍ट्रेट से होकर गुजरता है और इसके बंद होने से सप्लाई रुक गई है, जिससे डीएपी की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं।

पाकिस्तान अपनी लगभग आधी जरूरत मध्य पूर्व से आयात करता है। इसलिए वहां की रुकावट का सीधा असर देश पर पड़ा है। इससे उर्वरक की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी दोनों हो गई हैं।

इसका असर अब खेतों तक दिखने लगा है। रबी सीजन (अक्टूबर से जनवरी) में डीएपी की बिक्री 23 प्रत‍िशत गिर गई है, क्योंकि इसकी कीमत बढ़कर लगभग 14,000 रुपए प्रति 50 किलो बैग तक पहुंच गई है।

महंगे दामों के कारण कई किसान डीएपी का इस्तेमाल कम कर रहे हैं या उसकी जगह यूरिया का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका खेती के लिए सही नहीं है और इससे फसल को नुकसान हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट सिर्फ बाहरी हालात की वजह से नहीं है, बल्कि यह कई वर्षों की नीतिगत गलतियों का भी नतीजा है।

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार हर साल उर्वरक कंपनियों को गैस सब्सिडी के तौर पर 200 अरब रुपए से ज्यादा देती रही, लेकिन फॉस्फेट उत्पादन बढ़ाने या वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया।

आलोचकों का कहना है कि इस सब्सिडी से उद्योग को फायदा तो हुआ, लेकिन उर्वरक आपूर्ति की मूल कमजोरी को दूर नहीं किया गया।

--आईएएनएस

एवाई/एबीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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किचन के बर्तन भी तय करते हैं सेहत, जानें दूध उबालने में सही विकल्प चुनना क्यों हैं जरूरी

नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। दूध हमारे रोजमर्रा के जीवन का एक जरूरी हिस्सा है। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन और कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं। ऐसे में इस बात पर ध्यान देना बेहद जरूरी है कि दूध को किस बर्तन में उबाला जा रहा है, क्योंकि बर्तन का चुनाव दूध की गुणवत्ता, स्वाद और उसके पोषण पर असर डाल सकता है। अगर सही बर्तन चुना जाए तो दूध ज्यादा सेहतमंद रह सकता है। वहीं गलत बर्तन में दूध उबालने से उसके पोषक तत्व भी कम हो सकते हैं और कभी-कभी सेहत पर भी असर पड़ सकता है।

सबसे पहले बात करते हैं स्टेनलेस स्टील के बर्तन की, जो आज लगभग हर घर में इस्तेमाल होता है। यह सबसे सुरक्षित और आसान विकल्प माना जाता है, क्योंकि स्टील दूध के साथ कोई रासायनिक प्रतिक्रिया नहीं करता, जिससे दूध के पोषक तत्व वैसे ही बने रहते हैं। इसके अलावा, अगर सही तरीके से गर्म किया जाए, तो इसमें दूध जलने का खतरा भी कम होता है। यही वजह है कि पोषण विशेषज्ञ भी स्टील के बर्तन को रोजमर्रा के उपयोग के लिए सबसे अच्छा मानते हैं।

वहीं मिट्टी के बर्तनों में दूध उबाला भी सेहत के लिए फायदेमंद होता है। पुराने समय से गांवों में दूध मिट्टी के बर्तन में ही उबाला जाता रहा है। मिट्टी के बर्तन में दूध धीरे-धीरे गर्म होता है, जिससे उसका स्वाद अच्छा बना रहता है और जलने की संभावना भी कम होती है। कुछ लोगों का मानना है कि मिट्टी दूध को पूरी तरह प्राकृतिक बना देती है और इसे पचाना आसान होता है, हालांकि यह बात वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं है।

कांसा और पीतल के बर्तन भी पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। आयुर्वेद के अनुसार, कांसा और पीतल के बर्तन भोजन को संतुलित बनाने में मदद करते हैं। लेकिन इन बर्तनों की सफाई और देखभाल बहुत जरूरी है, वरना इनमें मौजूद धातु भोजन पर असर डाल सकते है। इसलिए दूध उबालने के लिए इनका इस्तेमाल सावधानी के साथ ही करना चाहिए।

एल्युमिनियम के बर्तन में दूध उबालना शरीर के नुकसानदायक साबित हो सकता है, क्योंकि इसमें ज्यादा गर्मी के चलते धातु भोजन के साथ प्रतिक्रिया करती है। लंबे समय तक इसका उपयोग सेहत के लिए सही नहीं माना जाता। इसी तरह नॉन-स्टिक बर्तनों में भी तेज गर्मी पर कुछ रसायन निकलने का खतरा रहता है, इसलिए दूध जैसे पीने वाले खाद्य पदार्थ के लिए यह सुरक्षित विकल्प नहीं है।

--आईएएनएस

पीके/पीएम

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