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पंजाब से दिल्ली तक सियासी ‘सुनामी’: संकट में 'आप'

भारत की समकालीन राजनीति में शायद ही कोई घटना इतनी तेजी से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आई हो, जितनी राघव चड्ढा सहित सात राज्यसभा सांसदों के आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से आई है। राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों का भाजपा में विलय केवल एक खबर नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी के 15 साल के इतिहास का सबसे बड़ा 'ब्लैकआउट' है। भारतीय राजनीति के क्षितिज पर यह घटनाक्रम एक बड़े ‘पॉलिटिकल अर्थक्वेक’ के रूप में दर्ज हो गया है। आम आदमी पार्टी (आप) के ‘पोस्टर बॉय’ माने जाने वाले राघव चड्ढा सहित राज्यसभा के 7 सांसदों का एक साथ पाला बदलकर भाजपा में शामिल होना न केवल ‘आप’ के लिए एक अस्तित्वगत संकट है बल्कि यह देश की राजनीति की दिशा और दशा बदलने वाला घटनाक्रम भी है। यह सिर्फ दल-बदल नहीं बल्कि सत्ता, विचारधारा और राजनीतिक रणनीति के बीच गहरे संघर्ष का संकेत है। जब राज्यसभा में पार्टी के कुल 10 में से 7 सांसद (दो-तिहाई बहुमत) एक साथ अलग होकर भाजपा में विलय करने का निर्णय लेते हैं तो यह दलबदल नहीं, एक वैचारिक और संगठनात्मक विद्रोह का प्रतीक बन जाता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय राजनीति 2027 के बड़े चुनावी चक्र की ओर बढ़ रही है। ऐसे में इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ‘आप’ का ‘पंजाब किला’ अब ढ़हने के कगार पर है? क्या 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की पटकथा अभी से लिखी जा चुकी है? और सबसे बड़ा प्रश्न कि क्या यह ‘आप’ के पतन की शुरुआत है या फिर एक अस्थायी राजनीतिक झटका?

‘आप’ के अस्तित्व पर खड़ा सबसे बड़ा सवाल

आम आदमी पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल राजनीतिक असहमति नहीं बल्कि लोकतंत्र पर सुनियोजित प्रहार करार दिया है। पार्टी नेतृत्व का स्पष्ट आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों के भय, दबाव और राजनीतिक प्रलोभनों के माध्यम से उसके सांसदों को तोड़ा गया, जिसे वह संस्थागत दुरुपयोग की श्रेणी में रखती है। यह आरोप भारतीय राजनीति में सत्ता बनाम विपक्ष की उस पुरानी बहस को फिर जीवित कर देता है, जहां नैतिकता और रणनीति आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। संवैधानिक दृष्टि से यह कदम और भी दिलचस्प हो जाता है। दलबदल विरोधी कानून की तकनीकी बारीकी (दो-तिहाई सदस्यों के एक साथ अलग होने की शर्त) का उपयोग करते हुए राघव चड्ढ़ा के नेतृत्व में सात सांसदों का भाजपा में विलय यह संकेत देता है कि यह केवल भावनात्मक निर्णय नहीं बल्कि गहन कानूनी सलाह और रणनीतिक योजना का परिणाम था। सबसे गंभीर आघात वैचारिक स्तर पर है। जब भीतर से ही यह स्वर उठे कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है तो यह केवल संगठनात्मक संकट नहीं बल्कि पहचान के संकट का संकेत बन जाता है और यही चुनौती ‘आप’ के लिए सबसे कठिन परीक्षा है।

इसे भी पढ़ें: सवालों का सामना करेगी आम आदमी पार्टी?

पंजाब की राजनीति और 2027 का रण

पंजाब की राजनीति में उठी यह हलचल महज दल-बदल नहीं बल्कि सत्ता समीकरणों के पुनर्गठन का संकेत है। इस विद्रोह का सबसे गहरा असर पंजाब की सियासत पर पड़ना तय है। राज्यसभा में पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरे (हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, संजीव अरोड़ा और विक्रमजीत सिंह साहनी) का पार्टी से अलग होना ‘आप’ की उस सामाजिक पकड़ को कमजोर करता है, जो विविध वर्गों के प्रतिनिधित्व से बनी थी। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं बल्कि भरोसे और प्रभाव का क्षरण है। सबसे बड़ी चुनौती भगवंत मान के सामने है। यह उनके नेतृत्व और राजनीतिक संतुलन की सीधी परीक्षा है। राघव चड्ढ़ा को लंबे समय तक सरकार और संगठन के बीच रणनीतिक कड़ी माना जाता रहा, उनके हटने से यह संतुलन डगमगाता दिख रहा है। दूसरी ओर, भाजपा इस घटनाक्रम को अवसर में बदलने की कोशिश में है। भाजपा पंजाब में हमेशा से एक 'छोटा भाई' (अकाली दल के साथ) बनकर रही है लेकिन 7 सांसदों के आने से, जिनमें सिखों और उद्योगपतियों का प्रतिनिधित्व है, भाजपा अब 2027 में 'अकेले दम' पर सरकार बनाने का सपना देख रही है। अब तक सहयोगी राजनीति तक सीमित रही भाजपा अब पंजाब में स्वतंत्र शक्ति बनने की दिशा में आक्रामक कदम बढ़ाती दिख रही है और 2027 का रण अब पहले से कहीं अधिक खुला और अनिश्चित हो गया है।

क्या खत्म हो जाएगी 'आप'?

इतिहास गवाह है कि क्षेत्रीय दल जब ऐसे बड़े विद्रोह का सामना करते हैं तो अक्सर वे या तो बिखर जाते हैं या फिर सिमटकर रह जाते हैं लेकिन आप की स्थिति थोड़ी भिन्न है। इसका सबसे बड़ा कारण है अरविंद केजरीवाल का व्यक्तित्व। आम आदमी पार्टी का आधार अरविंद केजरीवाल की ‘व्यक्तिगत ब्रांडिंग’ पर टिका है। जब तक दिल्ली और पंजाब जैसे अहम राज्यों में उनका जनाधार सुरक्षित है, तब तक ‘आप’ का पूर्ण पतन लगभग असंभव प्रतीत होता है। इसके समानांतर, ‘आप’ की ताकत उसका विकसित कैडर ढांचा है। आप ने पिछले एक दशक में एक मजबूत कैडर तैयार किया है। हालांकि शीर्ष स्तर पर योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और अब राघव चड्ढा जैसे प्रमुख चेहरों का अलग होना पार्टी को बड़ा झटका देता है लेकिन जमीनी कार्यकर्ता अब भी पार्टी की विचारधारा से जुड़े हैं। एक वैकल्पिक, जनोन्मुख और व्यवस्था-विरोधी नेता की केजरीवाल की छवि अब भी पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी बनी हुई है।

राष्ट्रीय राजनीति में बदलता खेल

राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह घटनाक्रम सत्ता-संतुलन को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है। राज्यसभा में सात सांसदों के जुड़ने से भाजपा की स्थिति और सुदृढ़ हुई है, जिससे अब महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में उसकी छोटे दलों पर निर्भर रहने की बाध्यता कम हो गई है। इसके विपरीत, विपक्षी गठबंधन के लिए यह स्पष्ट झटका है क्योंकि ‘आप’ इस गठबंधन की मुखर आवाज रही है। सबसे गंभीर आघात ‘आप’ की वैचारिक विश्वसनीयता पर पड़ा है। जो पार्टी ‘ईमानदार राजनीति’ को अपनी पहचान मानती रही, उसी के भीतर से वैचारिक विचलन और आरोपों का उठना उसके नैरेटिव को कमजोर करता है। यह स्थिति नेतृत्व शैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है, लगातार बड़े चेहरों का अलग होना इस ओर संकेत करता है कि संवाद की कमी और निर्णय प्रक्रिया का केंद्रीकरण आंतरिक असंतोष को जन्म दे रहा है। राष्ट्रीय विस्तार की महत्वाकांक्षा पर भी इसका प्रभाव पड़ना तय है। दिल्ली और पंजाब से आगे बढ़ने की जो रणनीति थी, वह अब धीमी पड़नी तय है, विशेषकर तब, जब पंजाब, जो ‘आप’ का सबसे मजबूत गढ़ है, स्वयं इस राजनीतिक भूकंप के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।

आप के लिए अग्निपरीक्षा का समय

यह कहना जल्दबाजी होगी कि 7 सांसदों के जाने से आम आदमी पार्टी खत्म हो जाएगी। राजनीति में रिक्तियां हमेशा भर दी जाती हैं। हालांकि यह निश्चित है कि आप अब अपनी सबसे कठिन अग्निपरीक्षा से गुजर रही है। यदि अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान अगले कुछ महीनों में पंजाब और दिल्ली के कैडर को एकजुट रखने में विफल रहे तो 2027 का चुनाव उनके लिए एक राजनीतिक ढ़लान साबित हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा ने इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ के जरिए यह संदेश दे दिया है कि वह दिल्ली और पंजाब की सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। बहरहाल, ‘आप’ के लिए चुनौती अब केवल चुनाव जीतना नहीं बल्कि अपने अस्तित्व और साख को बचाए रखना है।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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IPL 2026: चेन्नई सुपर किंग्स कर सकती है बड़ी घोषणा, इस खिलाड़ी को ट्रायल के लिए बुला सकती है

चेन्नई सुपर किंग्स धीरे-धीरे जीत की लय को वापस हासिल कर रही है। हालांकि, टीम को अपना पिछला मैच गंवाना पड़ा। चेन्नई के लिए अब हर मैच करो या मरो का होगा। इस बीच उन्होंने मिड सीजन ट्रायल शुरू किया है। चेन्नई इस साल अपने चोटिल खिलाड़ियों की वजह से भी मुश्किल में रही है, नाथन एलिस, खलील अहमद, आयुष अहमद चोट के कारण बाहर हो चुके हैं। एमएस धोनी अभी तक खेले नहीं हैं। चेन्नई सुपर ने खलील के रिप्लेसमेंट का ऐलान नहीं किया है। 

मिज सीजन शुरू हुए इस ट्रायल में फ्रेंचाइजी ने महाराष्ट्र के युवा ऑलराउंडर को बुलाया है। ये खिलाड़ी आयुष वर्तक है जिनकी उम्र महज 21 साल है। रिपोर्ट के अनुसार, वह 27 अप्रैल को चेन्नई पहुंच गया और अब उनका ट्रायल होगा। हालांकि, अभी साफ नहीं है कि वर्तक अकेले ट्रॉयल पर आए हैं और भी खिलाड़ियों को इसमें बुलाया गया है। बड़ी बातये है कि वर्तक ने अभी तक सीनियर लेवल पर क्रिकेट नहीं खेला है।

आयुष वर्तक 21 साल के हैं, जो मुंबई के वसई के रहने वाले हैं। वह दाएं हाथ के बल्लेबाज हैं और मीडियम पेसर हैं। वह ऑक्शन में भी शामिल हुए थे, लेकिन उनपर किसी टीम ने बोली नहीं लगाई थी। वह सनराइजर्स हैदराबाद, मुंबई इंडियंस और राजस्थान रॉयल्स के लिए भी ट्रायरल दे चुके हैं। 

आंकड़ों की बात करें तो आयुष सीके नायडू ट्रॉफी के पिछले सीजन के पहले फेज में वह मुंबई के कप्तान थे। पुरुष टेस्ट ए ट्रॉफी 2025 में मुंबई के लिए खेलते हुए उन्होंने 6 पारियों में 363 चौके जड़े थे। वह इस टूर्नामेंट में दूसरे सबसे ज्यादा छक्के लगाने वाले बल्लेबाज थे। पहले नंबर पर मुकुल चौधरी थे जिन्होंने 39 छक्के लगाए थे। 

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  Sports

IPL 2026: आज पंजाब-राजस्थान की टक्कर, दिल्ली-आरसीबी मैच के खास पल

आज आईपीएल का 40वां मैच पंजाब और राजस्थान के बीच मुल्लानपुर में होगा. पंजाब टीम इस सीजन में अभी तक अजेय रही है और अंक तालिका में शीर्ष पर है, जबकि राजस्थान चौथे स्थान पर है. वहीं, पिछले मैच में आरसीबी ने दिल्ली को 9 विकेट से हराया, जहां दिल्ली मात्र 75 रन पर सिमट गई थी. यह मुकाबला रोमांचक होने की उम्मीद है. Tue, 28 Apr 2026 15:56:06 +0530

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