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शादी के बाद होती है अग्निपरीक्षा, दूल्हा-दुल्हन को दहकते अंगारों पर लेने होते हैं 7 फेरे

Raigarh News: मेहत्तर राठिया ने कहा कि उनके परिवार की इस अनोखी रस्म के पीछे गहरी आस्था है. यह अग्निपरीक्षा नवदंपति के शुरू हो रहे नए रिश्ते और पवित्रता की मजबूत नींव मानी जाती है. वहीं परिवार के लोग इसे देवताओं की कृपा से भी जोड़ते हैं.

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फोलिक एसिड को क्यों कहा जाता है 'प्रेग्नेंसी का विटामिन'? मां-बच्चे के लिए बेहद जरूरी

नई दिल्ली, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। गर्भावस्था धारण करने से पहले और बाद में महिलाओं को पोषण की बहुत आवश्यकता होती है। इस दौरान फोलिक एसिड लेने की सलाह दी जाती है।

छोटी सी दिखने वाली फोलिक एसिड की गोली को “प्रेग्नेंसी विटामिन” कहा जाता है, जो मां और बच्चे दोनों के लिए लाभकारी होता है। यह नई कोशिकाओं के निर्माण से लेकर बच्चे के मस्तिष्क का भी निर्माण करता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि फोलिक एसिड क्या है?

फोलिक एसिड विटामिन-बी समूह का एक सिंथेटिक रूप है, जबकि इसका प्राकृतिक रूप फोलेट कहलाता है। आमतौर पर फोलिक एसिड हरी सब्जियों, दालों और सूखों मेवे में आसानी से पाया जाता है। फोलिक शरीर के निर्माण से लेकर शरीर के संतुलन के लिए भी आवश्यक रहा है और सबसे महत्वपूर्ण काम लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है, यही कारण है कि मां के पेट में पल रहे बच्चे के विकास में फोलिक एसिड बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह गर्भवती महिलाओं को एनीमिया, कमजोरी, सिर दर्द जैसे लक्षणों से बचाती है।

गर्भावस्था में फोलिक एसिड भ्रूण के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भ्रूण के न्यूरल ट्यूब के विकास में बेहद जरूरी है। अगर मां गर्भावस्था में फोलिक एसिड नहीं लेती है तो बच्चे के असामान्य होने की आशंका बढ़ जाती है। इसकी कमी से बच्चे की रीढ़ की हड्डी और नेजल बॉन का विकास ठीक से नहीं होता और बच्चा पूरा तरह विकसित नहीं हो पाता है। यही कारण है कि डॉक्टर गर्भधारण से पहले और शुरुआती तीन महीनों में इसका सेवन अनिवार्य मानते हैं।

वहीं आयुर्वेद में गर्भावस्था के समय को “गर्भिणी परिचर्या” कहा जाता है और इस “गर्भिणी परिचर्या” में आयुर्वेद में ऐसे आहार को खाने की सलाह दी जाती है, जो शरीर में फोलिक एसिड की कमी को पूरा करते हैं, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी, आंवला, संतरा, अनार, मूंग, मसूर, चना, बादाम, और अखरोट शामिल हैं। इसी के साथ ही शतावरी, अश्वगंधा, और गिलोय का सेवन भी चिकित्सक की सलाह के बाद किया जा सकता है। आयुर्वेद का मानना है कि “गर्भिणी परिचर्या” में लिया जाने वाला आहार रक्त की वृद्धि करता है और गर्भ में पल रहे शिशु के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

--आईएएनएस

पीएस/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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