Explainer: 90 के दशक के सुपरस्टार्स का जलवा आज भी है बरकरार, जानिए 30 साल बाद भी क्यों कायम है इनका स्टारडम?
Bollywood 90s Superstars Stardom: 90s के दौर के सुपरस्टार्स का आज तक स्टारडम क्यों बरकरार है, इसे सझमने के लिए से पहले आपको यह बात जाननी चाहिए कि बॉलीवुड में सक्सेस और पॉपुलैरिटी की कोई तय उम्र नहीं होती है. हालांकि, आमतौर पर किसी एक्टर का सबसे अच्छा दौर कुछ सालों तक ही माना जाता है. इसके बाद न्यू कमर्स आते हैं और वो पुराने एक्टर्स की धीरे-धीरे जगह लेने लगते हैं. लेकिन 90 के दशक के सुपरस्टार्स ने इस सोच को काफी हद तक गलत साबित कर दिया. शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान, अजय देवगन और अक्षय कुमार इसी दौर के एक्टर हैं. उस दौर में उन्होंने अपनी लोगों के बीच मजबूत पहचान बनाई और 30 साल से ज्यादा का टाइम गुजर गया है लेकिन इनका जलवा आज भी बना हुआ है. इन स्टार्स की खास बात यह है कि इनका स्टारडम सिर्फ फिल्मों की सक्सेस तक लिमिटेड नहीं रहा बल्कि इन्होंने अपने फैंस के साथ ऐसा रिश्ता बनाया जो आगे आने जनरेशन तक आगे बढ़ता गया. आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं.
सोशल मीडिया ना होने का मिला फायदा
90 के दौर में और आज के दौर में सबसे बड़ा फर्क सोशल मीडिया का नजर आता है. उस समय इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म नहीं थे. फैंस अपने पसंदीदा स्टार्स को ज्यादातर फिल्मों, फिल्मी मैगजीन, टीवी इंटरव्यू या किसी पब्लिक इवेंट में ही देख पाते थे. यानी फैंस के लिए उनकी लाइफ एक मिस्ट्री बनी रहती थी. यही बात स्टार्स को और ज्यादा बड़ा बनाती थी. शाहरुख खान को रोमांस के किंग के तौर पर, सलमान खान को दबंग अंदाज के लिए, आमिर खान को परफेक्शन के लिए, अजय देवगन को सीरियस एक्टिंग और अक्षय कुमार को एक्शन हीरो के तौर पर जाना जाने लगा. ऑडियंस ने इनकी एक खास इमेज अपने मन में बना ली. लेकिन आज के सोशल मीडिया दौर पर एक्टर्स की पर्सनल लाइफ से लेकर हर छोटी चीज सोशल मीडिया पर सामने आ जाती है. लेकिन 90s के इन सितारों की स्टार वैल्यू पहले से इतनी स्ट्रॉन्ग बन चुकी है कि आज भी उनकी एक झलक या पोस्ट सुर्खियों में आ जाती है. ऐसे में कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया ना होने का फायदा 90 के दशक के स्टार्स को भरपूर मिला.
90s के स्टार्स के फैंस आज अपने बच्चों के साथ देख रहे फिल्में
90 के दशक के स्टार्स के पास एक ऐसी चीज है जिसे कोई नया कलाकार रातोंरात नहीं पा सकता है और वह है लॉयल फैन बेस. 90 के दशक में जो लोग स्कूल या कॉलेज में पढ़ने के दौरान इनकी फिल्में देखकर बड़े हुए, आज वही फैंस अपने बच्चों के साथ इनकी फिल्में देखने थिएटर में देखते हैं. यही क्रॉस-जेनरेशन फैन बेस इनकी सबसे बड़ी पावर है. कई बार दर्शक फिल्म की स्टोरी या रिव्यू देखने से पहले टिकट खरीद लेते हैं क्योंकि फिल्म में उनका फेवरेट स्टार मौजूद है. शाहरुख की फिल्म की अनाउंसमेंट के साथ ही उनके फैंस एक्साइटेड हो जाते हैं. सलमान की फिल्म को लेकर फैंस का अलग माहौल बनता है. इसी तरह अजय, अक्षय और आमिर के नाम से भी फिल्म को रिलीज भी सुर्खियों में रहती है. तीन दशक में बना यह स्टारडम किसी भी नए एक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.
समय के साथ खुद को बदला
इन स्टार्स ने खुद को समय के साथ बदला है. लंबे टाइम तक स्टार बने रहने के लिए केवल पॉपुलैरिटी काफी नहीं होती. उसके लिए खुद को भी समय के साथ बदलना जरूरी होता है और ऐसा ही इन सितारों ने किया. 90 के दशक में शाहरुख खान रोमांटिक फिल्मों के सबसे बड़े स्टार माने जाते थे. लेकिन बाद में उन्होंने अलग-अलग तरह की फिल्में के जरिए खुद को साबित किया. इससे नई जनरेशन के बीच उनकी फैन फॉलोइंग स्ट्रॉन्ग हुई. वहीं, आमिर खान ने कम फिल्मों में काम करने और शानदारी स्टोरी वाली फिल्मों के जरिए अलग पहचान बनाई. अजय देवगन ने सीरियस किस्म की एक्टिंग के साथ कॉमेडी और एक्शन में भी अपनी जगह बनाए रखी. अक्षय कुमार ने देशभक्ति, सोशल इश्यू और अलग-अलग जॉनर की फिल्मों में हाथ आजमाया. वहीं सलमान खान ने अपनी मास एक्शन हीरो की इमेज को एक्शन और मनोरंजन से जोड़े रखा. यानी इन सितारों ने अपनी पहचान छोड़ी नहीं, बल्कि समय के हिसाब से उसमें बदलाव किए.
स्क्रीन प्रेजेंस से जीतते हैं फैंस का दिल
आज ओटीटी प्लेटफॉर्म ने एंटरटेनमेंट की दुनिया को पुरी तरह बदल दिया है. लोग अपने घर बैठकर फिल्म और वेब सीरीज आसानी से देख सकते हैं. ऐसे में लोग थिएटर में तभी जाना चाहते हैं, जब उन्हें फिल्म में कुछ अलग एक्सपीरियंस करने का मौका मिले. 90s के सुपरस्टार्स की यही इमेज आज भी काम आती है. शाहरुख की एंट्री, सलमान का एक्शन, अजय का दमदार अंदाज, अक्षय के स्टंट और आमिर की यूनिक स्टोरी वाली फिल्में थिएटर में देखने में एक अलग किस्म का एक्सपीरियंस मिलता है. इन सितारों की स्क्रीन प्रेजेंस इतनी दमदार है कि कई बार सिर्फ उनकी एंट्री पर ही थिएटर में तालियां और सीटियां बजने लगती हैं. इसे ही लार्जर-देन-लाइफ स्टारडम कहा जाता है. आज के न्यू कमर्स के पास अच्छी कहानियां और टैलेंट तो है लेकिन दशकों में बनी इस तरह का स्टारडम बहुत ही कम एक्टर्स के पास है.
फिटनेस खराब नहीं होने दी
इन सभी सितारों ने अपनी फिटनेस पर भी जमकर काम किया. तीन दशक से ज्यादा समय तक बड़े पर्दे पर टिके रहना आसान काम नहीं है. खासकर तब, जब एक्टर को लगातार यंग और फिट नजर आना हो. इन सुपरस्टार्स ने उम्र बढ़ने के साथ अपनी फिटनेस पर काफी काम किया. अक्षय कुमार अपने डिसिप्लिन्ड लाइफस्टाइल के लिए जाने जाते हैं. सलमान खान और शाहरुख खान ने भी फिल्मों के लिए अपने लुक और बॉडी पर काफी वर्क किया है. लेकिन सिर्फ फिटनेस ही नहीं, मेंटल हेल्थ इनकी सक्सेस का बड़ा हिस्सा है. इनके करियर में भी फ्लॉप फिल्में आईं और ऐसे दौर भी आए जब इनके स्टारडम को लेकर सवाल उठे. फिर भी इन्होंने हार नहीं मानी और वापसी की. यही बात उन्हें लंबे समय तक टिकाए रखती है. स्टार के लिए हर फिल्म हिट देना जरूरी नहीं होता है बल्कि प्लॉप फिल्मों के बाद भी दोबारा लोगों को दिल जीतना ज्यादा जरूरी होता है.
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Explainer: रांची का Gen-Z आंदोलन क्यों है दिल्ली के NEET प्रदर्शन से अलग? जानिए JPSC आंदोलन की पूरी कहानी
Explainer: झारखंड की राजधानी रांची में इन दिनों हजारों छात्र सड़कों पर हैं. मामला झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं से जुड़ा है. आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों की मांग है कि भर्ती परीक्षाओं की प्रक्रिया पारदर्शी हो, कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई की जाए.
यह आंदोलन इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में युवा और Gen-Z छात्र शामिल हैं, लेकिन उनका प्रदर्शन करने का तरीका हाल के कुछ चर्चित छात्र आंदोलनों से काफी अलग नजर आ रहा है.
रांची में प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने अपनी नाराजगी जरूर जाहिर की, लेकिन अब तक आंदोलन का केंद्र किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि भर्ती व्यवस्था में सुधार की मांग रही है. यही वजह है कि रांची के इस आंदोलन की तुलना दिल्ली में हुए NEET से जुड़े छात्र प्रदर्शन से भी की जा रही है.
दिल्ली के NEET आंदोलन में क्या हुआ था?
जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर छात्रों का बड़ा जमावड़ा हुआ था. लंबे समय तक चले उस प्रदर्शन में परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और छात्रों के भविष्य से जुड़े सवाल प्रमुख रहे.
प्रदर्शन के दौरान छात्रों में काफी आक्रोश देखने को मिला. सोशल मीडिया और धरनास्थल पर राजनीतिक बयानबाजी भी चर्चा का हिस्सा बनी. आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया.
रांची के छात्रों का आंदोलन भी युवाओं की भागीदारी के कारण उसी तरह ध्यान आकर्षित कर रहा है, लेकिन दोनों प्रदर्शनों की शैली में अंतर दिखाई देता है.
रांची में प्रदर्शनकारी छात्र मुख्य रूप से अपनी भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित दिखाई दे रहे हैं. उनका कहना है कि उनका लक्ष्य किसी व्यक्ति को हटाना नहीं बल्कि उस व्यवस्था में सुधार कराना है, जिसके तहत सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं.
रांची में आंदोलन का मुद्दा क्या है?
JPSC और JSSC की परीक्षाओं को लेकर अभ्यर्थी लंबे समय से सवाल उठाते रहे हैं. छात्रों का आरोप है कि भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के कारण मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हो रहा है.
सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए एक परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं होती. इसके पीछे कई वर्षों की तैयारी, आर्थिक निवेश और भविष्य की उम्मीदें जुड़ी होती हैं. ऐसे में जब किसी परीक्षा की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उसका सीधा असर हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ता है.
रांची में छात्रों की मांग इसी व्यापक चिंता से जुड़ी है. वे चाहते हैं कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बढ़े, किसी भी तरह की गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच हो और योग्य अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा की जाए.
विधानसभा घेराव के दौरान क्या हुआ?
सोमवार को आंदोलन ने उस समय नया मोड़ लिया, जब हजारों अभ्यर्थी झारखंड विधानसभा की ओर बढ़े. छात्रों ने विधानसभा घेराव का प्रयास किया. प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की थी. आगे बढ़ने की कोशिश के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बनी. प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल भी किया गया.
पुलिस कार्रवाई के बाद आंदोलन को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई. विपक्ष ने छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग का मुद्दा उठाया, जबकि छात्रों का कहना है कि वे अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से सरकार तक पहुंचाना चाहते हैं.
Gen-Z होने के बावजूद आंदोलन का अंदाज अलग क्यों?
रांची के आंदोलन की सबसे खास बात इसका अनुशासित स्वरूप बताया जा रहा है. प्रदर्शन में शामिल अधिकांश युवा उस पीढ़ी से आते हैं जिसे आम तौर पर Gen-Z कहा जाता है. यह वही पीढ़ी है जो सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और तेज राजनीतिक संवाद के लिए जानी जाती है. लेकिन रांची में छात्रों ने आंदोलन को मुख्य रूप से पारंपरिक छात्र आंदोलन की शैली में रखा है.
धरना, नारे, मार्च, ज्ञापन और विधानसभा घेराव जैसे पारंपरिक तरीकों के जरिए छात्र अपनी मांग उठा रहे हैं. आंदोलन के दौरान किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाकर व्यक्तिगत हमले या अभद्र भाषा को केंद्र में नहीं रखा गया है. यही बात इसे कई दूसरे सोशल मीडिया आधारित आंदोलनों से अलग बनाती है.
न किसी का इस्तीफा, न व्यक्तिगत हमला
रांची के आंदोलन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि छात्रों की प्रमुख मांग किसी खास मंत्री या अधिकारी के इस्तीफे को लेकर नहीं है. उनका जोर परीक्षा प्रणाली में सुधार पर है.
छात्र चाहते हैं कि भर्ती प्रक्रिया ऐसी हो जिसमें अभ्यर्थियों को परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा हो. उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा सरकारी नौकरी की परीक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही है. यही कारण है कि आंदोलन का राजनीतिक स्वर होने के बावजूद छात्रों का मुख्य संदेश व्यवस्था सुधार के इर्द-गिर्द बना हुआ है.
शिबू सोरेन की तस्वीरें क्यों चर्चा में हैं?
रांची के आंदोलन से जुड़ी एक दिलचस्प तस्वीर यह भी सामने आई कि प्रदर्शनकारी छात्रों के हाथों में झारखंड के वरिष्ठ नेता और राज्य की राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे शिबू सोरेन की तस्वीरें भी दिखाई दीं.
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आंदोलन राज्य सरकार के खिलाफ है, लेकिन प्रदर्शनकारी राज्य की राजनीतिक विरासत के सम्मान को अलग रखते हुए अपनी मांग उठा रहे हैं.
छात्रों का संदेश यह रहा कि सरकार की नीतियों या व्यवस्था से असहमति हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि राजनीतिक या सामाजिक सम्मान की सीमाएं खत्म हो जाएं. यही संयम इस आंदोलन को अलग पहचान दे रहा है.
हेमंत सोरेन को जन्मदिन पर दी बधाई
रांची के आंदोलन के दौरान एक और घटना ने लोगों का ध्यान खींचा. प्रदर्शनकारी छात्रों ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं भी दीं.
यह घटनाक्रम पहली नजर में विरोध प्रदर्शन की राजनीति से अलग लग सकता है, लेकिन यही रांची आंदोलन के चरित्र को समझने में मदद करता है. छात्र सरकार की नीतियों और भर्ती व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर राजनीतिक विरोध को कटुता में बदलने से बचते दिखाई दे रहे हैं.
उनका संदेश है कि सरकार से सवाल करना और किसी व्यक्ति के प्रति व्यक्तिगत अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना दो अलग चीजें हैं.
आंदोलन की अगुवाई छात्र नेताओं के हाथ में
रांची के प्रदर्शन की एक और खास बात यह है कि यह किसी राष्ट्रीय स्तर के चर्चित चेहरे के नेतृत्व में नहीं चल रहा है. किसी बड़े सेलिब्रिटी, सामाजिक कार्यकर्ता या राष्ट्रीय आंदोलनकारी के अनशन के कारण आंदोलन को पहचान नहीं मिली. इसकी अगुवाई स्थानीय छात्र नेता कर रहे हैं.
छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. इससे प्रदर्शन का चरित्र पूरी तरह स्थानीय और छात्र-केंद्रित बना हुआ है. इसका फायदा यह भी हुआ है कि आंदोलन की मूल मांग लगातार केंद्र में बनी हुई है.
क्या यह सिर्फ परीक्षा का आंदोलन है?
देखा जाए तो JPSC-JSSC विवाद केवल भर्ती परीक्षाओं तक सीमित नहीं है. इसके पीछे सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे युवाओं की उस बड़ी चिंता को समझना होगा, जिसमें वे पारदर्शी और भरोसेमंद भर्ती प्रक्रिया चाहते हैं.
राज्य में सरकारी नौकरी के अवसर सीमित हैं और बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. ऐसे में परीक्षा से जुड़ा कोई भी विवाद सीधे हजारों परिवारों की उम्मीदों को प्रभावित करता है. इसलिए रांची का आंदोलन युवाओं के लिए केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि भरोसे की व्यवस्था का सवाल बनता जा रहा है.
दिल्ली और रांची के आंदोलनों में सबसे बड़ा अंतर
दोनों आंदोलनों में युवाओं और Gen-Z की बड़ी भागीदारी है. दोनों में परीक्षा व्यवस्था को लेकर असंतोष है और दोनों ही मामलों में छात्रों ने सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं. लेकिन दोनों की राजनीतिक भाषा और प्रदर्शन शैली अलग है.
दिल्ली के प्रदर्शन में राजनीतिक बयानबाजी और तीखी भाषा ज्यादा चर्चा में रही, जबकि रांची में छात्र अपेक्षाकृत संयमित भाषा में अपनी मांगों पर टिके हुए हैं. रांची में आंदोलन का केंद्र किसी व्यक्ति के खिलाफ अभियान नहीं बल्कि व्यवस्था में सुधार है. यही इसकी सबसे बड़ी पहचान बनती जा रही है.
क्या अनुशासन आंदोलन को ज्यादा प्रभावी बनाता है?
किसी भी आंदोलन की सफलता केवल भीड़ की संख्या से तय नहीं होती. उसकी विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण होती है. रांची के छात्रों ने जिस तरह अपनी मांगों को केंद्र में रखते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाया है, उससे उन्हें व्यापक सामाजिक समर्थन मिलने की संभावना बढ़ती है.
हालांकि पुलिस कार्रवाई और विधानसभा घेराव जैसी घटनाओं के बाद आंदोलन के आगे बढ़ने के तरीके को लेकर चुनौती भी बनी हुई है. छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि वे अपनी मांगों को स्पष्ट और शांतिपूर्ण तरीके से सरकार के सामने रखते रहें.
क्या बातचीत ही है इसके समाधान की कुंजी?
17 दिनों से जारी यह आंदोलन अब सरकार के सामने एक गंभीर चुनौती बन चुका है. छात्रों की संख्या, विधानसभा घेराव और पुलिस कार्रवाई के बाद इस मुद्दे को राज्य की राजनीति में भी प्रमुखता मिल गई है.
अब समाधान की कुंजी बातचीत में दिखाई देती है. यदि सरकार छात्रों के प्रतिनिधियों से संवाद करती है और परीक्षा संबंधी आरोपों की जांच तथा सुधार को लेकर स्पष्ट रोडमैप सामने रखती है, तो तनाव कम हो सकता है.
फिलहाल रांची की सड़कों पर खड़े ये युवा यही संदेश देते नजर आ रहे हैं कि व्यवस्था से सवाल किया जा सकता है, सरकार से जवाब मांगा जा सकता है और विरोध भी किया जा सकता है लेकिन अपनी मर्यादा बनाए रखते हुए.
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