ट्रंप की डिनर पार्टी में फायरिंग की घटना पर ईरानी महावाणिज्यदूत का बयान, 'यह लोगों का राष्ट्रपति के प्रति गुस्सा'
नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिका के साथ तनाव के बीच मुंबई में ईरान के महावाणिज्यदूत सईद रजा मोसायेब मोतलाग ने आईएएनएस से खास बातचीत की। महावाणिज्यदूत मोसायेब ने कहा कि अमेरिका के लोगों के साथ धोखा हो रहा है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के डिनर पार्टी के दौरान हुई फायरिंग की निंदा की और कहा कि जो हुआ, वह ट्रंप के खिलाफ लोगों का गुस्सा है।
महावाणिज्यदूत सईद रजा मोसायेब मोतलाग ने कहा, जाहिर है, हम आतंकवाद के किसी भी काम की बुराई करते हैं। लेकिन मुझे कहना होगा, इस मामले में जो हमने देखा, ठीक यही हुआ। ये वे लोग हैं जो पुरानी दुनिया में आए हैं और आतंकवाद का इस्तेमाल करके, वे अपने मकसद पूरे करना चाहते थे। बदकिस्मती से, यह उनकी स्थिति का हिस्सा बन गया है। बेशक, कुछ मीडिया आउटलेट्स ने कहा है कि यह एक दिखावा था या वे अपने अंदरूनी मामलों के लिए कुछ करना चाहते थे, जिसके बारे में मुझे पता नहीं है। यह ट्रंप पर पहला हमला नहीं है, यह ट्रंप पर दूसरा हमला है। यह ट्रंप को लेकर लोगों का गुस्सा है।
उन्होंने आगे कहा, जहां तक मैंने यूनाइटेड स्टेट्स का इतिहास पढ़ा और देखा है, बदकिस्मती से मुझे लगता है कि इस दौर में ट्रंप पर दूसरे प्रेसिडेंट या लोगों के मुकाबले हमलों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अब, मुझे नहीं पता कि यह असलियत है या दिखावा। लेकिन, मैं एक बात कह सकता हूं कि कोई भी टॉपिक हो सकता है। जाहिर है, जैसा कि मैंने अपने पिछले सवाल में कहा था, जिस तरह से उन्होंने बर्ताव किया है, यहां तक कि अमेरिका के लोगों के साथ भी, अमेरिका में हुए विरोध के दौरान उन्होंने जो क्लिप्स बनाईं और प्रोड्यूस कीं, वह अमेरिका के लोगों के साथ ही बाकी दुनिया के लोगों के साथ भी एक तरह का धोखा है।
ईरानी महावाणिज्यदूत ने आगे कहा कि हमने देखा है कि वह लोगों को धोखा दे रहे हैं। जाहिर है, इसके नतीजे होंगे। हो सकता है कि कुछ लोगों को इस तरह से धोखा भी दिया गया हो। वहीं, भारत और अमेरिका को लेकर उन्होंने कहा कि ट्रंप के भारत के साथ बहुत मजबूत संबंध हैं। यहां तक कि अमेरिका के भी भारत के साथ बहुत मजबूत संबंध हैं। ईरान और भारत के बीच का संबंध गहरा, सांस्कृतिक और सम्मानजनक है।
--आईएएनएस
केके/एबीएम
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बिहार की सियासत में फिर आया नया मोड़, क्या विलय की राह पर आगे बढ़ रहा ये दिग्गज नेता?
बिहार की राजनीति हर किसी को आकर्षित करती है. भले ही लोकसभा का रास्ता यूपी से होकर गुजरता हो लेकिन बिहार की राजनीति का भी केंद्र में खासा महत्व है. बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं. राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और भारतीय जनता पार्टी के बीच संभावित विलय को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में प्रस्तावित कैबिनेट विस्तार से पहले यह फैसला राजनीतिक समीकरणों को नया रूप दे सकता है.
विलय की अटकलों के पीछे की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन न करने के बाद भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजकर अपने साथ जोड़े रखा. इसके बाद 2025 के विधानसभा चुनाव में आरएलएम ने एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और चार सीटों पर जीत दर्ज की. मार्च 2026 में राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने के बावजूद उन्हें दोबारा भेजा जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक समझ बनी हो सकती है.
सूत्रों का दावा है कि भाजपा की ओर से पार्टी विलय का प्रस्ताव दिया गया है, हालांकि इस पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.
बेटे के भविष्य की राजनीति
इस पूरे घटनाक्रम में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे का राजनीतिक भविष्य भी एक अहम पहलू बनकर उभरा है. माना जा रहा है कि कुशवाहा अपने बेटे को बिहार की मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं. इसके लिए वे मंत्रिमंडल या विधान परिषद जैसे विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. ऐसे में भाजपा के साथ तालमेल या विलय उनके लिए एक सुरक्षित राजनीतिक रास्ता बन सकता है.
पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी
आरएलएम के भीतर भी हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हैं. पार्टी के कई विधायक और कार्यकर्ता नेतृत्व के फैसलों से असहज नजर आ रहे हैं. खासकर परिवारवाद के आरोपों ने संगठन में दरार पैदा की है. नवंबर 2025 में मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान बेटे को प्राथमिकता देने की कोशिश से असंतोष और बढ़ गया था.
इसके अलावा, कई विधायकों को यह चिंता भी सता रही है कि यदि पार्टी का विलय होता है, तो भाजपा में उनका भविष्य क्या होगा. टिकट मिलने या राजनीतिक पहचान बनाए रखने को लेकर संशय बना हुआ है।
संगठनात्मक चुनौतियां और असंतोष
पार्टी के भीतर संवाद की कमी भी असंतोष का बड़ा कारण बनी है. कई विधायकों का आरोप है कि अहम फैसलों में उनकी राय नहीं ली जाती. ‘लिट्टी-चोखा पार्टी’ में कुछ विधायकों की अनुपस्थिति ने इस असंतोष को सार्वजनिक कर दिया था. हालांकि बाद में संगठन में बदलाव कर स्थिति संभालने की कोशिश की गई, लेकिन पूरी तरह संतुलन नहीं बन पाया.
आगे क्या होगा?
उपेंद्र कुशवाहा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी के अस्तित्व और राजनीतिक भविष्य के बीच संतुलन बनाने की है. यदि वे भाजपा में विलय का फैसला लेते हैं, तो आरएलएम का स्वतंत्र अस्तित्व खत्म हो सकता है. वहीं, विलय से उन्हें और उनके करीबी नेताओं को सत्ता में बेहतर अवसर मिल सकते हैं.
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कुशवाहा कौन सा रास्ता चुनते हैं अपनी पार्टी को बचाए रखना या बड़े राजनीतिक गठजोड़ में शामिल होकर नई भूमिका निभाना. बिहार की राजनीति में यह फैसला दूरगामी प्रभाव डाल सकता है.
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