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नई नेपाल सरकार ने चीन के साथ हुए इन्फ्रास्ट्रक्चर समझौतों की जांच शुरू की

काठमांडू, 26 अप्रैल (आईएएनएस)। चीन ने हमेशा नेपाल के साथ अपने आर्थिक संबंधों का इस्तेमाल हिमालयी देश में राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए एक सीढ़ी के रूप में किया है, लेकिन अब नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ किए गए कई समझौतों की जांच की जा रही है।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च एंड रिजोल्यूशन (आईसीआरआर) द्वारा प्रकाशित एक लेख के अनुसार, हाल के वर्षों में, नेपाल में चीन की बढ़ती भूमिका आर्थिक सहयोग से परे जाकर रणनीतिक और राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है, जिसमें तिब्बत और ताइवान से संबंधित मुद्दों पर राजनयिक दबाव से लेकर आंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयासों तक शामिल हैं।

लेख में कहा गया कि के.पी शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान नेपाल ने चीन के साथ कई समझौते किए, जिन्हें आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में क्रांतिकारी कदम के रूप में पेश किया गया था।

हालांकि, अब देश की नई सरकार इन समझौतों की गहन जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ओली काल में शुरू की गई चीन से जुड़ी कई परियोजनाएं बिना किसी स्पष्ट कारण के क्यों रुक गईं, उनमें देरी हुई या वे प्रभावी रूप से बंद हो गई हैं।

नई सरकार ने यह भी घोषणा की है कि इन परियोजनाओं की पूरी समीक्षा होने तक चीन के साथ किसी भी नए समझौते पर विचार नहीं किया जाएगा।

नेपाल-चीन संबंधों में निर्णायक मोड़ 2016 और 2018 के बीच आया, जब बेल्ट एंड रोड पहल के तहत नेपाल बीजिंग के करीब आया। ओली सरकार ने इन समझौतों को नेपाल को क्षेत्रीय कनेक्टिविटी केंद्र में बदलने के ऐतिहासिक अवसर के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि, इन इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को हमेशा व्यावहारिक योजना या वित्तीय स्पष्टता का समर्थन नहीं मिला।

लेख में अटकी हुई कई परियोजनाओं का जिक्र किया गया है, जिसमें बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना शामिल है, जिसका ठेका मई 2017 में चीन के गेझोउबा समूह को दिया गया था, जिसे नवंबर 2017 में रद्द कर दिया गया था, 2018 में बहाल किया गया था और 2022 से बिना किसी मजबूत प्रगति के प्रभावी रूप से रुका हुआ है।

लगभग 2016-2017 में घोषित प्रस्तावित केरंग-काठमांडू रेलवे परियोजना, तकनीकी चुनौतियों और वित्तीय समाधानों की कमी के कारण 2026 में भी अटकी हुई है।

इसी प्रकार, 2017 और 2018 के बीच बीआरआई के तहत शुरू किया गया ट्रांस-हिमालयी बहुआयामी कनेक्टिविटी नेटवर्क भी सैद्धांतिक चर्चाओं से आगे नहीं बढ़ पाया है। 2018 और 2020 के बीच जिन सीमा पार ट्रांसमिशन लाइन परियोजनाओं पर चर्चा हुई थी, वे अभी तक कार्यान्वित नहीं हुई हैं।

इसी तरह, 2017 और 2020 के बीच शुरू की गई रसुवागढ़ी-केरंग सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास भी आंशिक और धीमी गति से ही हुआ है। 2016 और 2018 के बीच शुरू की गई उत्तरी राजमार्ग कनेक्टिविटी परियोजनाएं भी अधूरी हैं, जबकि 2018-2019 के दौरान पहचानी गई बीआरआई से जुड़ी अधिकांश पहलें 2026 तक भी लागू नहीं हो पाई हैं।

लेख में बताया गया है कि 2017 से हुआवेई और जेडटीई से जुड़े डिजिटल विस्तार के प्रयास भी असमान रूप से आगे बढ़े हैं, जिससे कार्यान्वयन और रणनीतिक निहितार्थों दोनों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

--आईएएनएस

एबीएस/

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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ट्रंप समेत चार अमेरिकी राष्ट्रपति जो जानलेवा हमलों में बाल-बाल बचे

नई दिल्ली, 26 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तीसरी बार बड़े हमले से बाल-बाल बचे। ट्रंप अकेले नहीं बल्कि हमलों से बच कर निकलने वाले ऐसे अमेरिकी राष्ट्राध्यक्षों का इतिहास लंबा रहा है। एक दो नहीं बल्कि इस देश के कुल चार राष्ट्रपति ऐसे रहे हैं जो हमलों का शिकार नहीं हुए।

डोनाल्ड ट्रंप इस फेहरिस्त में सबसे नए और अत्यधिक बार हमलों का सामना करने वाले राष्ट्रपति बन गए हैं। 25 अप्रैल की रात वाशिंगटन स्थित होटल हिल्टन में आयोजित (स्थानीय समयानुसार) व्हाइट हाउस कॉरेस्पोंडेंट्स डिनर में शामिल होने आए तो हथियारबंद की बंदूक से चलीं गोलियां चलती सुनाई दीं। बाद में हमलावर पकड़ा भी गया।

इसके पहले 15 सितंबर 2024 में फ्लोरिडा गोल्फ कोर्स में भी ट्रंप को निशाना बनाने का प्रयास किया गया। ट्रंप वेस्ट पाम बीच में गोल्फ खेल रहे थे, जब 59 वर्षीय रयान वेस्ले राउथ ने एके-स्टाइल राइफल लेकर झाड़ियों में छिपकर निशाना साधा था। इस दौरान भी ट्रंप बच गए।

सबसे पहले ट्रंप 13 जुलाई 2024 को पेन्सिलवेनिया में चुनाव प्रचार अभियान के दौरान खूनी हमले में बाल-बाल बचे थे। उन्होंने तब भाषण शुरू ही किया था, तभी गोलियां चलीं। गनीमत रही कि राष्ट्रपति उम्मीदवार बच गए, लेकिन एक गोली उनके कान को छूकर निकल गई। इससे खून की धारा बह निकली।

ट्रंप से पहले रोनाल्ड रीगन भी एक ऐसे हमले से बचे थे। इसे संयोग ही कहेंगे कि रीगन पर हमला उसी होटल के बाहर हुआ जहां दशकों बाद भीतर रात्रिभोज का आयोजन किया गया था। वाशिंगटन हिल्टन होटल परिसर में ही उन पर निशाना साधा गया। ये सब 1981 में हुआ था। होटल के बाहर उन्हें गोली लगी थी, लेकिन वे बच गए। रीगन घायल हो गए थे जब एक गोली लिमोजीन से टकराकर उनके बाईं तरफ से निकल गई।

70 के दशक में राष्ट्रपति गेराल्ड फोर्ड उन खुशकिस्मतों में से रहे जो एक बार नहीं, दो-दो बार हमलों का शिकार होने से बच गए। साल 1975 का था जब तीन हफ्तों से भी कम समय में दो हमले हुए और फोर्ड बिना किसी खरोंच के बच निकले।

इसमें एक नाम थियोडोर रूजवेल्ट का भी आता है, जिन पर 1912 में चुनाव प्रचार के दौरान हमला हुआ। गोली सीने में जा लगी, लेकिन वो बच गए।

वहीं कुछ अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसे भी रहे जो हिंसक वारदात का शिकार हुए। इनमें 1865 में अब्राहम लिंकन, 1881 में जेम्स गारफील्ड, 1901 में विलियम मैकिन्ले और 1963 में जॉन एफ. कैनेडी का नाम शामिल है। ये सब तब मारे गए जब ये राष्ट्रपति पद पर आसीन थे।

--आईएएनएस

केआर/

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