चीनी अधिकारी तिब्बत को 'शोपीस' की तरह मानते हैं: निर्वासित नेता
टोक्यो/बीजिंग, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तिब्बत में डेमोक्रेटिक सुधार, आजादी और विकास को लेकर चीन के दावे खोखले हैं। तिब्बत मेनलैंड में लोकतंत्र नहीं है।
दलाई लामा के जापान और पूर्व एशिया के लिए संपर्क ऑफिस के प्रतिनिधि, त्सावांग गिलापो आर्य ने जापान फॉरवर्ड में इसका जिक्र किया है। गिलापो ने कहा कि चीनी शासन खुद को लोकतांत्रिक बताता है और दावा करता है कि पहले गुलाम रहे लोग मालिक बन गए हैं।
हालांकि, उन्होंने कहा कि 76 साल के लोकतांत्रिक सुधारों के बाद भी किसी भी तिब्बती ने स्वायत्त क्षेत्र के पार्टी सचिव के तौर पर काम नहीं किया। आर्य ने इसे लगातार विदेशी गुलामी की एक कड़वी याद बताया।
आर्य ने कहा कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के आधिकारिक मुखपत्र द ग्लोबल टाइम्स ने हाल ही में सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (सटीए) के फरवरी के चुनावों का मजाक उड़ाया। द ग्लोबल टाइम्स ने इसे बिना जमीन के चुनाव बताया और कहा कि ये निर्वासन में रह रहे अलगाववादी समूहों द्वारा बनाया गया एक संस्थागत भ्रम हैं।
विशेषज्ञ ने कहा, ऐसे बयान को चीनी एक्सपर्ट्स के विचार के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन लोकतंत्र और तिब्बती समुदाय के चुनावों के प्रति उनकी आंखें बंद कर लेना और दुनिया भर में उनकी बढ़ती पहचान उनकी विशेषज्ञता पर सवाल उठाती है।
आर्य ने बताया कि 1959 में दलाई लामा, लगभग 80,000 लोगों के साथ भारत, नेपाल और भूटान भाग गए, जहां उन्होंने शरणार्थियों का समर्थन करने के लिए निर्वासन लिया। उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने अपने देश में अन्याय और दमन को दूर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी समर्थन जुटाया।
आर्य ने जोर देकर कहा, “आज 75 साल से ज्यादा समय के बाद, दलाई लामा और सीटीए के नेतृत्व में तिब्बतियों ने बहुत लंबा सफर तय किया है, तिब्बत में जो बर्बाद हो रहा था उसे बचाया है और एक जिंदादिल लोकतांत्रिक समुदाय बनाया है जिसकी दुनिया भर में सराहना हो रही है।”
विशेषज्ञ के मुताबिक, तिब्बत एक दिखावे की चीज बन गया है, जैसे एक सुंदर कटा हुआ फूल, जिसमें कोई चीज या असली जड़ें नहीं हैं, जबकि मठ और ननरी सीसीपी कैडर के कंट्रोल में हैं।
आर्या ने कहा, “बच्चों और युवाओं को मठों में जाने और उनमें शामिल होने से मना किया गया है। सभी तिब्बती स्कूल बंद कर दिए गए हैं और उनकी जगह चीनी कॉलोनियल बोर्डिंग स्कूल बना दिए गए हैं, जहां चार साल की उम्र के करीब दस लाख बच्चों को सरकार की एसिमिलेटिव पॉलिसी के तहत जबरदस्ती सिखाया जाता है।”
उन्होंने कहा, “तिब्बती भाषा को भी हतोत्साहित किया जाता है। जो लोग अपनी भाषा को बढ़ावा देते हैं, उन्हें झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया जाता है और टॉर्चर किया जाता है। अल्पसख्यक देशों के लोगों पर दबाव डालने और उन्हें जबरदस्ती एसिमिलेशन में डालने को सही ठहराने के लिए कानून बनाए गए हैं।”
चीनी अधिकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जा रहे गलत कामों पर जोर देते हुए आर्य ने कहा, “तिब्बती, तिब्बत के अंदर और बाहर, और उनके समर्थक न केवल तिब्बतियों की, बल्कि चीनी लोगों और दूसरी जातीय अल्पसंख्यकों की भी आजादी और भलाई चाहते हैं।”
--आईएएनएस
केके/डीकेपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
सरकार ने कमजोर वर्गों के लिए बचपन से ही एक 'व्यापक व्यवस्था' बनाई है: डॉ. जितेंद्र सिंह
नई दिल्ली, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य कमजोर वर्गों के लिए बचपन से ही सहयोग और मार्गदर्शन देने की एक व्यापक व्यवस्था तैयार की है। यह बात केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने शनिवार को कही। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य इन वर्गों को शुरुआती स्तर से ही समर्थन देकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए सक्षम बनाना है।
जम्मू विश्वविद्यालय में डॉ. अंबेडकर चैंबर ऑफ कॉमर्स के जम्मू-कश्मीर चैप्टर के शुभारंभ के दौरान बोलते हुए मंत्री ने कहा कि अब समय आ गया है कि समाज के वंचित वर्ग केवल सरकारी नौकरियों पर निर्भर न रहें, बल्कि उद्यमिता और निवेश के क्षेत्र में भी आगे बढ़ें। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाई जा रही योजनाओं का लाभ उठाकर अपना खुद का व्यवसाय शुरू करें।
डॉ. सिंह ने कहा कि सरकार ने कमजोर वर्गों के लिए एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जिसमें उन्हें बचपन से ही मार्गदर्शन और सहायता मिलती है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार की कई प्रमुख योजनाएं सामाजिक और आर्थिक विकास को ध्यान में रखकर शुरू की गई हैं।
उन्होंने प्रधानमंत्री जन धन योजना का जिक्र करते हुए कहा कि इस योजना ने बैंकिंग सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचाया है। वहीं प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिए छोटे कारोबारियों को आसानी से लोन मिल रहा है, जिससे वे अपना बिजनेस शुरू कर पा रहे हैं। इसके अलावा पीएम विश्वकर्मा योजना का उद्देश्य पारंपरिक कौशल को बचाते हुए लोगों को स्थायी रोजगार देना है।
मंत्री ने बताया कि इन योजनाओं के सकारात्मक असर अब दिखने लगे हैं। आंकड़ों के अनुसार, दलित और अन्य कमजोर वर्गों के लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और उनमें आगे बढ़ने की इच्छा भी बढ़ी है।
उन्होंने आगे कहा कि अब साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले लोग भी सिविल सेवा जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, जो समाज में बढ़ते सशक्तिकरण को दर्शाते हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि सरकार इन योजनाओं का दायरा और बढ़ाना चाहती है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इनका लाभ उठा सकें और देश के विकास में भागीदारी कर सकें।
--आईएएनएस
डीबीपी
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