IPL 2026 रोमांचक अंदाज में आगे बढ़ रहा है. इस सीजन रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु शानदार प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ रही है. शुक्रवार को चिन्नास्वामी स्टेडियम में गुजरात टाइटंस के साथ खेले गए मुकाबले में RCB ने 5 विकेट से जीत दर्ज की और अंक तालिका में टॉप-2 में पहुंच गई. RCB जिस तरह से खेल रही है, उसे देखकर ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि बोल्ड आर्मी का प्लेऑफ में पहुंचना तय ही है. तो आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं कि अब आरसीबी को प्लेऑफ में पहुंचने के लिए कितने मैच जीतने होंगे.
GT को हराकर RCB ने दर्ज की 5वीं जीत
IPL 2026 का 34वां मैच रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और गुजरात टाइटंस के बीच खेला गया. चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेले गए इस मुकाबले में टॉस जीतकर रजत पाटीदार ने टॉस जीतकर गेंदबाजी चुनी. जहां, गुजरात ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 206 रनों का लक्ष्य तय किया, जिसे बोल्ड आर्मी ने 7 गेंद शेष रहते हुए लक्ष्य को हासिल कर लिया और 5 विकेट से जीत दर्ज कर ली. ये आरसीबी की आईपीएल 2026 में 5वीं जीत रही.
आपको बता दें, आईपीएल 2026 में आरसीबी ने चिन्नास्वामी स्टेडियम में 5 मैच खेले हैं, जिसमें 4 मैच जीते हैं और सिर्फ एक मैच में हार का सामना करना पड़ा.
— Royal Challengers Bengaluru (@RCBTweets) April 25, 2026
टॉप-2 में पहुंची RCB
इंडियन प्रीमियर लीग 2026 रोमांचक अंदाज में आगे बढ़ रहा है और हर मैच के बाद प्वॉइंट्स टेबल में फेरबदल देखने को मिल रहा है. RCB VS GT मैच के बाद एक बार फिर अंक तालिका में बदलाव हुए. जीत के साथ आरसीबी ने 2 अंक हासिल किए और अंक तालिका में टॉप-2 में पहुंच गई. IPL 2026 में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने 7 मैच खेले हैं, जिसमें 5 मैच जीते हैं और 2 मैचों में हार का सामना किया है. इस तरह 10 अंक और +1.101 नेट रन रेट के साथ नंबर-2 पर पहुंच चुकी है.
VIDEO: Yet another chase masterclass from Virat Kohli, sensational striking from Devdutt Padilkkal, Krunal’s finishing touches and more, summed up by our talented young’uns… ????????#PlayBold#ನಮ್ಮRCB… pic.twitter.com/DZuPGfuTy2
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प्लेऑफ में पहुंचने के लिए RCB को जीतने हैं कितने और मैच?
IPL 2026 में 10 टीमें हिस्सा ले रही हैं और सभी टीमों को 14-14 मैच खेलने होंगे. रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने अभी 7 मैच खेले हैं, जिसमें 5 मैच जीते हैं और उनके पास 10 अंक हैं. ऐसे में अब RCB को प्लेऑफ में पहुंचने के लिए कम से कम 4 जीतने होंगे. जी हां, 4 मैच जीतकर आरसीबी प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई कर सकती है. वैसे पिछले सीजन तो टीमों ने 16 अंक के साथ भी टॉप-4 में जगह बनाई थी.
मगर, 16 अंक के साथ रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु को दूसरी टीमों के नतीजों पर निर्भर रहना होगा. इसलिए 18 अंक हासिल कर टीम सीधे प्लेऑफ में क्वालीफाई करना चाहेगी. हालांकि, मौजूदा समय में बोल्ड आर्मी इतनी अच्छी स्थिति में है कि वह लीग स्टेज को टॉप-2 में ही फिनिश करना चाहेगी.
आज सीता नवमी है, यह दिन मां सीता के प्राकट्य दिवस का पर्व है, जिसे जानकी नवमी भी कहते हैं। यह दिन स्त्री शक्ति एवं अटूट मर्यादा का प्रतीक है। सीता का चरित्र हमें आत्मबल, कर्तव्यनिष्ठा और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है तो आइए हम आपको सीता नवमी का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें सीता नवमी के बारे में
सनातन धर्म में सीता नवमी के त्योहार का विशेष महत्व माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन माता सीता का प्राकट्य हुआ था। वैष्णव संप्रदाय में आज माता सीता के निमित्त व्रत रखने की परंपरा भी है। व्रत रखकर श्री राम सहित माता सीता का पूरे विधि-विधान से पूजन किया जाता है और उनकी स्तुति की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जो कोई भी व्रत करता है, उसे सोलह महा दानों और सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलता है। सीता नवमी को जानकी नवमी के नाम से भी जाना जाता है, हर साल यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और माता सीता की पूजा-अर्चना करते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से घर-परिवार में खुशहाली बनी रहती है, इस शुभ दिन पर कुछ विशेष चीजें घर लाई जाएं, तो न केवल नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, बल्कि माता लक्ष्मी की कृपा भी घर पर बनी रहती है।
हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन सीता नवमी मनाई जाती है और इस बार ये त्योहार 25 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन माता जानकी की पूजा का मुहूर्त सुबह 11:20 से दोपहर 01:55 बजे तक रहेगा। 25 अप्रैल, शनिवार को सीता नवमी पूजन का सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 01 मिनिट से दोपहर 01 बजकर 38 मिनिट तक रहेगा। यानी भक्तों को पूजा के लिए पूरे 02 घण्टे 37 मिनट का समय मिलेगा। मुहूर्त से पहले पूजा की पूर तैयारी कर लें।
सीता नवमी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व
माता सीता को आदर्श स्त्री और नारी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन धैर्य, समर्पण, सत्य और धर्म के पालन का संदेश देता है। मान्यतानुसार जिस दिन सीता माता प्रकट हुई, उसे जानकी जयंती या सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन लोग विशेष पूजा-अर्चना, हवन, कथा वाचन और भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं। यह दिन नारी शक्ति, मर्यादा और धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। माता सीता को धैर्य, शांति और धर्म की प्रतीक माना जाता है, और उनके जीवन से हम सभी को सत्संग, त्याग और भक्ति की प्रेरणा मिलती है।
सीता नवमी पर इन मंत्रों का करें जाप, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार सीता नवमी के दिन माता सीता और श्री राम के इस मंत्र का 11 बार जप अवश्य करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है-
1. श्री सीतायै नमः।
2. श्री रामाय नमः।
इस मंत्र का जप करके माता सीता और श्री राम, दोनों को पुष्पांजलि चढ़ाकर उनका आशीर्वाद लें। इससे आपके सारे मनोरथ सिद्ध होंगे।
इसलिए मनाई जाती है सीता नवमी
सीता जी को जानकी भी कहा जाता है, क्योंकि उनका जन्म जनकपुरी (जनक राजा के राज्य) में हुआ था। उन्हें धरती से उत्पन्न देवी माना जाता है। जानकी जयंती का पर्व न केवल माता सीता के जन्मदिन के रूप में, बल्कि स्त्री सम्मान और धार्मिक आदर्शों के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है।
मर्यादा और चरित्र की अटूट शक्ति हैं मां सीता
देवी सीता को मर्यादा और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। लंका में रावण की कैद में रहने के दौरान भी उन्होंने अपनी गरिमा और आत्मसम्मान को कभी आंच नहीं आने दी। उनका चरित्र यह सिखाता है कि असली शक्ति बाहरी शस्त्रों में नहीं, बल्कि मन की शुद्धता और इरादों की मजबूती में होती है। सीता नवमी का यह दिन हमें अपने भीतर के आत्मसम्मान को जगाने और मर्यादा की सीमाओं का सम्मान करने की प्रेरणा देता है। समाज में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाना और किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से समझौता न करना ही मां सीता की सच्ची सेवा है। उनके जीवन का हर अध्याय हमें यह अहसास कराता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी हारता नहीं है, बल्कि वह सब के लिए प्रेरणा बन जाता है।
सीता नवमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास
कथा यह है कि मां लक्ष्मी जी का अवतार सीता माता अपने पिछले जन्म में मुनि कुषध्वजा की बहुत ही सुंदर पुत्री वेदावती थी। वे भगवान विष्णु की भक्त थी वे हर समय केवल उनकी पूजा में ही लीन रहती थी, उनका प्रण था कि वे भगवान विष्णु के अतिरिक्त किसी और से विवाह नही करेंगी। उनके पिता एक ऋषि थे, वे अपनी बेटी के इस प्रण को अच्छी तरह से जानते थे, उन्होनें कभी अपनी पुत्री को अपना मन बदलने के लिए विवष नही किया। पुत्री की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होनें पुत्री के लिए आए अनेकों षक्तिषाली राजाओं और देवताओं के रिष्तों को मना कर दिया। मना किए गए रिष्तों में से एक रिष्ता दैत्यों के षक्तिषाली राजा षंभु का भी था। रिष्ते के लिए न मिलने पर दानव षंभु ने इसे अपना अपमान समझा और अपने अपमान का बदला लेने के उद्देष्य से मौका देखकर वेदावती के माता पिता का वध कर दिया।
अपने माता पिता की मृत्यु के बाद वेदावती संसार में बिलकुल अकेली और अनाथ हो गई वे अपने पिता के आश्रम में ही रहने लगी और सारा समय भगवान विष्णु का ध्यान करने लगी। वेदावती बहुत ही खुबसूरत थी और उनकी तपस्या ने उन्हें पहले से भी अधिक सुंदर बना दिया था। एक बार लंका के राजा रावण ने उसे जंगल में भगवान विष्णु के लिए तपस्या करते हुए देखा वो वेदावती की सुंदरता पर मोहित हो गया उसने वेदावती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा परन्तु उसे भी न में ही जवाब मिला। न में जवाब मिलने पर रावण ने वेदावती की तपस्या भंग कर दी और उनके बालों को पकड़़कर उन्हें घसीटने लगा। ंरावण के इस कुकृत्य से क्रोधित वेदावती ने अपने बाल काट दिए और कहा कि वो वहीं उसकी आखों के सामने ही अग्नि में कूदकर अपने प्राणों का त्याग करेगीं। अग्नि में प्रवेष करते समय वेदावती ने कहा कि रावण ने इस जंगल में उन्हें अपमानित किया है वो दोबारा से जन्म लेकर उसके विनाष का कारण बनेगीं। वो वेदावती ही थीं जो सीता के रुप में जन्मीं और राम जी के माध्यम से रावण के विनाष का कारण बनी। जब वेदावती का जन्म सीता जी के रुप में हुआ तो वे मिथिला नरेष राजा जनक को उनकें खेतों में जुताई करते समय भूमि पर लेटी हुई मिली। उनकी दैविक सुंदरता से प्रभावित होकर राजा जनक ने उन्हें अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। देवी सीता को जानकी, वैदही, मैथली तथा और अन्य नामों से भी जाना जाता है। वे राजा जनक को भूमि पर पड़ी हुई मिली थी इसलिए उन्हें भूदेवी की संतान भी माना जाता है।
अशोक वाटिका और अटूट मर्यादा का प्रतीक
रावण की अशोक वाटिका में बंदी होने के बाद भी मां सीता के मन में जरा भी डर नहीं था। जब रावण अपने वैभव का प्रदर्शन कर उन्हें डराने का प्रयास करता, तब वह कभी उसकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखती थीं। उन्होंने अपने और रावण के बीच केवल एक ‘तिनके’ यानी घास के छोटे से टुकड़े को ओट की तरह रखा था। यह मामूली सा तिनका असल में उनकी अटूट मर्यादा और चारित्रिक बल का सबसे बड़ा प्रतीक था। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब इंसान अपने धर्म और सच्चाई पर अडिग रहता है, तो दुनिया की कोई भी बड़ी ताकत उसे विचलित नहीं कर सकती। मां सीता की यह दृढ़ता आज भी हमें अपने मूल्यों पर टिके रहने की प्रेरणा देती है।
सीता नवमी पर ऐसे करें पूजा, होंगे लाभान्वित
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धालु माता सीता की मूर्ति या चित्र की तथा राम-सीता की पूजा करते हैं। व्रत, कथा पाठ और हवन का आयोजन भी किया जाता है। कई जगहों पर रामायण का पाठ और भजन कीर्तन होते हैं। पंडितों शनिवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और इसके बाद व्रत-पूजा का संकल्प लें। शुभ मुहूर्त से पहले पूजा की पूर तैयारी कर लें। शुभ मुहूर्त शुरू होने पर भगवान श्रीराम के साथ देवी सीता का चित्र साफ स्थान पर स्थापित करें। सबसे पहले चित्र पर कुमकुम से तिलक लगाएं। चित्र पर फूलों की माला पहनाएं और शुद्ध घी का दीपक लगाएं। अबीर, गुलाल, चावल, फूल, रोली, फल आदि चीजें भगवान को एक-एक करके चढ़ाएं। भगवान श्रीराम को सफेद और देवी सीता को लाल वस्त्र अर्पित करें। बिंदी, काजल, चूड़ी, मेहंदी आदि चीजें भी देवी सीता को अर्पित करें। पूजा के बाद फल व अन्य चीजों का भोग भगवान को लगाएं और आरती करें। संभव हो तो कुछ देर देवी सीता के मंत्रों का जाप भी करें। सीता नवमी पर इस तरह पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। इस दिन गरीबों को दान देने का भी विशेष महत्व है।