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Anti-Incumbency, SIR और बीजेपी की घेराबंदी, ममता के लिए क्यों है सबसे मुश्किल चुनाव?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के पहले चरण के लिए मंच तैयार है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है, लेकिन पार्टी को अपने रास्ते में कुछ अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। टीएमसी को मुख्य विपक्षी दल बीजेपी से कड़ी चुनौती मिल रही है और इस चुनौती की अगुवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कर रहे हैं, जो पूरे बंगाल में बीजेपी के ज़ोरदार चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में राज्य में अपनी पैठ बनाते हुए, बीजेपी ने 42 में से 18 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी को 22 सीटें मिली थीं। हालाँकि, 2021 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने अपनी सर्वोच्चता निर्णायक रूप से स्थापित की और बीजेपी की 77 सीटों के मुकाबले 294 में से 215 सीटें जीतीं। टीएमसी ने 2021 के बाद से हुए 21 उपचुनावों में से 20 में भी जीत हासिल की। ​​2024 के लोकसभा चुनावों में, उसने बीजेपी की 12 सीटों के मुकाबले 29 सीटें जीतीं। पहले चरण में, 16 ज़िलों की 152 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने जा रहे हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा, पुरबा, पश्चिम मेदिनीपुर, पश्चिम बर्धमान और बीरभूम के अलावा, इन ज़िलों में उत्तरी बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, कूच बिहार, और उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर; तथा राज्य के पश्चिमी हिस्सों के झारग्राम, पुरुलिया और बांकुड़ा भी शामिल हैं।

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SIR कैलकुलेशन

राज्य में 90 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए, जिससे कुल मतदाता संख्या घट गई है। आंकड़े बताते हैं कि 2024 लोकसभा चुनाव में इन्हीं 152 सीटों पर वोटिंग करीब 80% और 2021 विधानसभा चुनाव में करीब 83% रही थी। यानी कुल मतदाता घटे, लेकिन वोट डालने वालों की संख्या लगभग बराबर या ज्यादा रही, इसलिए भी बढ़ा।

16 में से 13 जिलों में 90% से ज्यादा वोटिंग

पहले चरण के आंकड़े बताते हैं कि लगभग सभी 16 जिलों में 2021 के मुकाबले 7-10% तक ज्यादा मतदान हुआ है। 13 जिलों में तो ये 90% से ज्यादा बढ़ा है। खास बात यह है कि जहां एसआईआर में ज्यादा नाम कटे, जैसे मुर्शिदाबाद और मालदा, वहां भी वोटिंग 90% के पार गई। दूसरी ओर, झाड़ग्राम और कालिम्पोंग जैसे जिलों में, जहां कटौती कम रही, वहां भी टर्नआउट पिछली बार से ज्यादा है।

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एंटी इनकंबेंसी और डर

राज्य में 15 साल से तृणमूल सरकार है। नेताओं से असंतोष, रोजगार, भ्रष्टाचार, सिंडिकेट जैसे मुद्दे भी ज्यादा मतदान की वजह हो सकते हैं। वहीं, मुस्लिम बहुल जिलों और सीमावर्ती इलाकों में यह एसआईआर और एनआरसी के डर से उपजी प्रतिक्रिया भी मानी जा रही है। ध्रुवीकरण जबरदस्त था, इसके बावजूद हिंदु वोटर भी उत्साह के साथ वोटर डालने निकला।

पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन

तृणमूल और भाजपा दोनों ने चुनाव को 'आर-पार' की जंग की तरह लड़ा है। ममता और अभिषेक बनर्जी ने जहां कमान संभाली, वहीं भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी और अमित शाह महीनों से एक्टिव रहे। बूथ लेवल तक कार्यकर्ताओं ने एक-एक वोटर को बाहर निकालने पर जोर दिया।

प्रवासी कामगार

यह भी बड़ा 'टर्निंग पॉइंट' है। बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर अन्य राज्यों से केवल वोट डालने बंगाल लौटे हैं। उन्हें लगा कि इस बार वोट नहीं दिया, तो हमेशा के लिए अधिकार छिन सकता है।
आयोग की सख्तीः निर्वाचन आयोग की अभूतपूर्व निगरानी और 2.40 लाख केंद्रीय बलों की तैनाती के कारण मतदाताओं ने बिना किसी डर के मतदान किया। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक 90% से ज्यादा मतदान को अप्रत्याशित नहीं माना जाना चाहिए। अगर, वहां एसआईआर के पहले (7.5 करोड़) की वोटर लिस्ट होती, तो प्रतिशत तकनीकी रूप से 83% तक ही होता।

ध्रुवीकरण का दांव

ममता के लिए एक और बड़ी रुकावट बीजेपी की तरफ़ से राज्य के वोटरों का ध्रुवीकरण करने की ज़ोरदार कोशिश लगती है। बीजेपी के एक सीनियर नेता ने कहा कि 2019 से, जब हमने बंगाल में अच्छा प्रदर्शन किया था, और 2021 और 2024 में, जब हमारा प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा था, हमारा वोट शेयर लगभग एक जैसा ही रहा है। हम समझते हैं कि हमें मुसलमानों के वोट नहीं मिलेंगे। लेकिन अगर हमें हिंदुओं के ज़्यादा वोट मिलते हैं, तो हम बहुमत के जादुई आंकड़े (153 सीटें) तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं। मुस्लिम समुदाय, जिसकी राज्य की आबादी में लगभग 30% हिस्सेदारी है। 2011 से ज़्यादातर टीएमसी का ही साथ दिया है; इसी साल ममता ने लेफ्ट फ्रंट सरकार के 34 साल के शासन को खत्म किया था। टीएमसी के लिए अपने मुस्लिम समर्थक आधार को बरकरार रखना एक चुनौती है, क्योंकि समुदाय के एक वर्ग में OBC सूची, वक्फ कानून के लागू होने और अन्य कारणों को लेकर नाराज़गी दिखाई दे रही है। कांग्रेस, ISF, AJUP और AIMIM जैसी अन्य विपक्षी पार्टियां भी TMC के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा सकती हैं।

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23 साल बाद इस देश से बोरिया बिस्तर समेटगी होंडा, जानें क्या लिया ये बड़ा फैसला?

23 सालों से साउथ कोरिया में कार बेच रही जापानी कंपनी होंडा ने देश में बिक्री बंद करने का फैसला लिया है. कंपनी 2026 के आखिर तक कारों की बिक्री बंद कर देगी. हालांकि, मोटरसाइकिल बिजनेस पर कोई असर नहीं होगा.

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  Sports

Rinku Singh की Super Over में तूफानी पारी, दिवंगत पिता को समर्पित की KKR की यादगार जीत

आईपीएल 2026 में रविवार का मुकाबला रोमांच और भावनाओं से भरा रहा, जहां कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाड़ी रिंकू सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए टीम को सुपर ओवर में जीत दिलाई हैं। इस जीत के पीछे सिर्फ खेल नहीं, बल्कि एक गहरी व्यक्तिगत भावना भी जुड़ी हुई थी, जिसने इस पारी को और खास बना दिया।

मौजूद जानकारी के अनुसार, रिंकू सिंह की इस बेहतरीन पारी पर उनकी मंगेतर प्रिया सरोज ने कहा कि वह बेहद खुश हैं और यह पारी उनके पिता के लिए समर्पित थी। उन्होंने बताया कि रिंकू ने यह मैच अपने पिता खंचंद सिंह की याद में खेला, जिनका इसी साल निधन हो गया था। बता दें कि खंचंद सिंह लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और 57 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ था।

गौरतलब है कि इस व्यक्तिगत दुख के बावजूद रिंकू सिंह ने मैदान पर असाधारण प्रदर्शन किया। जब कोलकाता की टीम 93 रन पर 7 विकेट खोकर मुश्किल में थी, तब उन्होंने पारी को संभालते हुए नाबाद 83 रन बनाए। उनकी इस पारी में धैर्य और आक्रामकता दोनों देखने को मिली, खासकर अंतिम ओवर में लगातार चार छक्के लगाकर टीम का स्कोर 155 तक पहुंचाया।

लखनऊ सुपर जायंट्स ने भी इस लक्ष्य की बराबरी कर ली, जिसके बाद मैच सुपर ओवर में पहुंच गया। यहां सुनील नरेन ने शानदार गेंदबाजी करते हुए निकोलस पूरन और एडेन मार्कराम को आउट कर मैच का रुख पलट दिया।

फील्डिंग में भी रिंकू सिंह ने कमाल दिखाया और रोवमैन पॉवेल के साथ मिलकर एक शानदार कैच लिया। इसके अलावा उन्होंने कुल पांच कैच पकड़कर मैच में अपनी उपयोगिता साबित की।

सुपर ओवर में जीत के लिए सिर्फ दो रन चाहिए थे और रिंकू सिंह ने विजयी चौका लगाकर टीम को यादगार जीत दिलाई। उनके इस हरफनमौला प्रदर्शन के लिए उन्हें मैच का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया।
Mon, 27 Apr 2026 19:41:23 +0530

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