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ट्रंप को भारत पर की गई टिप्पणियों को लेकर भारतीय अमेरिकी नेताओं की आलोचना का करना पड़ रहा सामना

वॉशिंगटन, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय-अमेरिकी विधायकों और समुदाय के नेताओं ने डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय प्रवासियों और भारत को निशाना बनाकर की गई टिप्पणियों की कड़ी निंदा की है। उन्हें आपत्तिजनक, विभाजनकारी और द्विपक्षीय संबंधों के लिए हानिकारक बताया है।

अमी बेरा, जो सबसे लंबे समय से सेवा दे रहे भारतीय-अमेरिकी कांग्रेस सदस्य हैं, ने कहा कि उन्हें अपनी विरासत और संयुक्त राज्य अमेरिका पर गर्व है। उन्होंने कहा, “भारत से आए प्रवासियों के बेटे के रूप में, मुझे अपनी विरासत पर भी गर्व है और उस देश पर भी जिसने मेरे परिवार को बेहतर जीवन बनाने का अवसर दिया।”

उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता कानूनी रूप से उस अवसर की तलाश में अमेरिका आए थे। मेरी माँ ने 35 साल तक एक पब्लिक स्कूल टीचर के रूप में काम किया। मेरे पिता एक इंजीनियर थे। उन्होंने मेरे भाइयों और मुझे कड़ी मेहनत, सार्वजनिक सेवा और उस देश को कुछ लौटाने के गहरे विश्वास के साथ पाला, जिसने उनका स्वागत किया।”

खुद को “उस अमेरिकी कहानी का एक उदाहरण” बताते हुए उन्होंने कहा, “मैंने किंडरगार्टन से लेकर मेडिकल स्कूल तक कैलिफ़ोर्निया के पब्लिक स्कूलों में पढ़ाई की, डॉक्टर बना और अब मुझे कांग्रेस में अपने देश की सेवा करने का सौभाग्य मिला है। यही अमेरिकी सपना है।”

बेरा ने ट्रंप की टिप्पणियों को “आपत्तिजनक, अज्ञानतापूर्ण और उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं” बताया। उन्होंने कहा कि ये टिप्पणियां “यह दर्शाती हैं कि हम एक राष्ट्र के रूप में कौन हैं, इसकी मूलभूत समझ का अभाव है।”

उन्होंने कहा, “अमेरिका हमेशा उन पीढ़ियों के प्रवासियों से मजबूत हुआ है जो यहां आते हैं, कड़ी मेहनत करते हैं और देश में योगदान देते हैं। वे अमेरिका को कमजोर नहीं करते बल्कि उसे मजबूत बनाते हैं।”

कांग्रेसमैन राजा कृष्णमूर्ति ने भी ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने “एक नस्लवादी बयानबाजी को बढ़ावा दिया।” उन्होंने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत और प्रवासियों पर हमला करने वाली नस्लवादी टिप्पणियों को बढ़ावा देना शर्मनाक है और उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं है।”

उन्होंने कहा, “उनकी भाषा न केवल लाखों भारतीय-अमेरिकियों और हमारे सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक साझेदारों में से एक का अपमान करती है बल्कि उन मूल्यों को भी कमजोर करती है जिन्होंने अमेरिका को अवसर और नवाचार का देश बनाया है। हमें इस साझेदारी को मजबूत करना चाहिए और अपनी विविधता का सम्मान करना चाहिए न कि राजनीतिक लाभ के लिए विभाजन पैदा करना चाहिए।”

एजय भूटोरिया, जो एशियाई अमेरिकियों, नेटिव हवाईयन और पैसिफिक आइलैंडर्स पर राष्ट्रपति की सलाहकार समिति के पूर्व सलाहकार रहे हैं, ने इन टिप्पणियों को तुरंत वापस लेने की मांग की।

उन्होंने कहा, “ओवल ऑफिस से भारत को ‘नरक’ और हमारे पेशेवर समुदाय को ‘लैपटॉप वाले गैंगस्टर’ कहने वाली भाषा वास्तविकता का खतरनाक और आपत्तिजनक विकृतिकरण है।”

भूटोरिया ने तर्क दिया कि भारतीय-अमेरिकी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा, “लैपटॉप के साथ काम करने वाले मैनेजर नौकरियाँ पैदा करते हैं, नवाचार को बढ़ावा देते हैं और बड़े पैमाने पर आर्थिक विकास में योगदान देते हैं। वे इस देश के भविष्य के लिए उन बंदूकधारी अपराधियों से कहीं बेहतर हैं जो हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय, जो कुल आबादी का केवल 1.5 प्रतिशत है, लगभग 6 प्रतिशत अमेरिकी आयकर में योगदान देता है। “हमारे ‘लैपटॉप वॉरियर्स’ अल्फाबेट, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी जैसी कंपनियों के सीईओ हैं और वे उद्यमी हैं जिन्होंने अमेरिका के 10 से अधिक यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स की स्थापना की है।”

भूटोरिया ने संबंधों के रणनीतिक पहलू पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा, “भारत एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी है… इस प्रवासी समुदाय पर हमला करना केवल सामाजिक गलती नहीं है; यह आर्थिक और भू-राजनीतिक भूल भी है।”

यह प्रतिक्रिया दर्शाती है कि भारतीय-अमेरिकियों के बीच उन टिप्पणियों को लेकर चिंता बढ़ रही है जिन्हें प्रवासियों को निशाना बनाने और एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय साझेदारी को कमजोर करने वाला माना जा रहा है। विधायकों और सामुदायिक नेताओं ने इस मुद्दे को न केवल गरिमा के सवाल के रूप में, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक परिणामों के संदर्भ में भी उठाया है।

भारतीय-अमेरिकी समुदाय संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे समृद्ध और उच्च शिक्षित समूहों में से एक है, जिसकी तकनीक, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपस्थिति है। अमेरिका में लगभग हर दस में से एक डॉक्टर भारतीय मूल का है और यह समुदाय नवाचार और उद्यमिता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पिछले दो दशकों में अमेरिका-भारत संबंध रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापार में सहयोग के कारण गहरे हुए हैं। द्विपक्षीय व्यापार 200 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है और दोनों देश वैश्विक चुनौतियों से निपटने में एक-दूसरे को प्रमुख साझेदार के रूप में देखते हैं।

--आईएएनएस

पीएम

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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दत्तात्रेय होसबोले ने पीएम मोदी के आरएसएस के साथ पुराने जुड़ाव को किया रेखांकित; वैचारिक संबंधों पर दिया जोर

वाशिंगटन, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संघ से लंबे जुड़ाव पर गर्व जताया। उन्होंने कहा कि आरएसएस और देश की मौजूदा सरकार के बीच विचार और संगठन का रिश्ता काफी गहरा और पुराना है।

हडसन इंस्टीट्यूट में एक फायरसाइड चैट में एक बातचीत के दौरान होसबोले ने साफ कहा कि पीएम मोदी की जड़ें आरएसएस में हैं और यह उनके सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व का अहम हिस्सा रही हैं। उन्होंने कहा, “यह सच है, उन्होंने खुद भी कई बार इसका जिक्र किया है और हमें इस पर बहुत गर्व है।”

यह बयान उस चर्चा के दौरान आया, जिसमें आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रिश्ते पर बात हो रही थी। होसबोले ने माना कि दोनों के बीच गहरा और लगातार जुड़ाव है। उन्होंने बताया कि जब 1980 में भाजपा बनी थी, तब इसके संस्थापकों ने आरएसएस से संबंध बनाए रखने का फैसला किया था।

उन्होंने कहा, “भाजपा के संस्थापक इस रिश्ते को बनाए रखना चाहते थे। यह ऐसा संबंध है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार में कई लोग ऐसे हैं, जिनका जुड़ाव आरएसएस से रहा है। उन्होंने कहा, “सरकार में जो लोग हैं, उनका बैकग्राउंड आरएसएस से जुड़ा हुआ है।”

हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि आरएसएस सीधे तौर पर सरकार के फैसलों में दखल नहीं देता। उन्होंने कहा, “आरएसएस भारत सरकार की राजनीति में सीधे शामिल नहीं होता।” साथ ही उन्होंने जोड़ा कि संगठन हमेशा उन नीतियों का समर्थन करता है जो देशहित में हों।

होसबोले ने बताया कि आरएसएस की भूमिका राजनीति में सीधे हस्तक्षेप करने की नहीं, बल्कि लंबे समय तक समाज और संस्कृति पर सकारात्मक प्रभाव डालने की है। संगठन सेवा, अनुशासन और सामाजिक एकता पर आधारित स्वयंसेवकों का नेटवर्क तैयार करता है।

चर्चा में आरएसएस के विकास का भी जिक्र हुआ—कैसे यह कुछ लोगों के छोटे समूह से शुरू होकर आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में बड़ा प्रभावशाली संगठन बन गया है। इस पर होसबोले ने विनम्रता पर जोर देते हुए कहा कि सफलता के साथ अहंकार नहीं, बल्कि नम्रता आनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “हम पूर्ण नहीं हैं… और नहीं बनेंगे… ताकत के साथ विनम्रता भी जरूरी है।”

उन्होंने दोहराया कि आरएसएस आगे भी “निस्वार्थ स्वयंसेवक” तैयार करने का काम करता रहेगा, जो समाज और मानवता की सेवा के लिए समर्पित हों। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत को आधुनिक बनते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को नहीं छोड़ना चाहिए।

यह बातचीत ‘न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस’ के दौरान हुई, जिसमें नीति निर्माता, विद्वान और रणनीतिक विशेषज्ञ शामिल हुए थे। इसमें भारत के उभार और उसके वैश्विक संबंधों पर चर्चा की गई।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत आरएसएस के प्रचारक के रूप में की थी। उन्होंने कई बार माना है कि उनकी सोच और राजनीतिक प्रशिक्षण पर आरएसएस का गहरा प्रभाव रहा है। 1925 में स्थापित आरएसएस आज दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है, जिसका देशभर में व्यापक नेटवर्क है और जिसने भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

--आईएएनएस

एएस/

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