बांग्लादेश की प्रेस को नैतिक आवाज को पुनः प्राप्त करना होगा: रिपोर्ट
ढाका, 23 अप्रैल (आईएएनएस)। बांग्लादेश के समाचार पत्रों को सत्ता के प्रतिबिंब के रूप में नहीं, बल्कि जवाबदेही के साधन के रूप में अपनी आवाज को फिर से खोजना होगा। एक रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि राष्ट्रीय संकट के दौरान प्रेस केवल एक दर्शक के रूप में कार्य नहीं करता है, बल्कि यह जनता की अंतरात्मा बन जाता है।
बांग्लादेशी दैनिक द एशियन एज के लिए इस सप्ताह की शुरुआत में लिखते हुए 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी और स्तंभकार अनवर ए खान ने कहा कि 5 अगस्त, 2024 से मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोपों ने बांग्लादेश पर एक लंबी और चिंताजनक छाया डाल दी है, जिसके साथ ही समाचार जगत में एक परेशान करने वाली चुप्पी छाई हुई है। उन्होंने तर्क दिया कि यह चुप्पी तटस्थता नहीं बल्कि कर्तव्य से मुकर जाना है।
खान ने लिखा, बांग्लादेश का संविधान अपने मूल स्वरूप में मौलिक अधिकारों को संजोए हुए है जो न तो दिखावटी हैं और न ही वैकल्पिक। अनुच्छेद 11 यह घोषणा करता है कि गणराज्य एक लोकतंत्र होगा, जिसमें मौलिक मानवाधिकार और स्वतंत्रताएं सुनिश्चित की जाएंगी। अनुच्छेद 39 स्पष्ट रूप से विचार, विवेक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है। जब इन सिद्धांतों पर खतरा मंडराता हुआ प्रतीत होता है तो प्रेस का यह गंभीर कर्तव्य है कि वह प्रश्न उठाए, जांच करे और बोले। चुप रहना मौन सहभागिता में खड़े रहने के समान है।
उन्होंने आगे कहा, इसी तरह चिंताजनक बात अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाना है जो ऐतिहासिक रूप से देश की सबसे पुरानी, सबसे बड़ी और संस्थापक राजनीतिक शक्ति है। चाहे कोई इसकी राजनीति से सहमत हो या न हो, एक प्रमुख राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लगाना लोकतांत्रिक जीवन की बहुलतावादी नींव पर प्रहार है। संविधान का अनुच्छेद 37 सभा करने और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के अधिकार की गारंटी देता है। इस अधिकार को कमजोर करना लोकतंत्र को खोखला करने के समान है।
खान ने बांग्लादेश के समाचार पत्रों में नैतिक स्पष्टता वाले संपादकीय लेखों के अभाव और संवैधानिक सीमाओं से भटकने पर सत्ता को चुनौती देने वाली साहसिक सुर्खियों की कमी पर सवाल उठाया।
उन्होंने कहा, प्रेस, जिसे चौथा स्तंभ कहा जाता है, अत्यधिक सतर्कता और अस्पष्टता में सिमट गया है, और जहां दृढ़ नैतिक दृढ़ विश्वास की आवश्यकता होती है, वहां भी वह फीकी रिपोर्टिंग करता है। यह अनिच्छा एक खतरनाक मिसाल कायम करती है कि सच्चाई को नरम किया जा सकता है, अन्याय को सामान्य माना जा सकता है, और सत्ता को चुनौती नहीं दी जा सकती।
बांग्लादेश को एक नाजुक मोड़ पर खड़ा बताते हुए खान ने कहा, बलिदान और संघर्ष के बल पर हासिल किया गया इसका संवैधानिक ढांचा सतर्क संरक्षण का हकदार है। सार्वजनिक चर्चा के संरक्षक के रूप में समाचार पत्रों को अपना साहस पुनः प्राप्त करना होगा। उन्हें कठिन प्रश्न पूछने होंगे, असुविधाजनक तथ्यों को प्रस्तुत करना होगा और सैद्धांतिक बहस के लिए स्थान प्रदान करना होगा। इससे कम कुछ भी न केवल उनकी अपनी विश्वसनीयता को कम करेगा बल्कि उस लोकतांत्रिक ताने-बाने को भी कमजोर करेगा जिसे बनाए रखने का दायित्व उन पर है।
--आईएएनएस
डीकेपी/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
नेपाल में भारतीय सामान पर कस्टम ड्यूटी को लेकर भारत ने जताई चिंता, बातचीत जारी
नई दिल्ली, 23 अप्रैल (आईएएनएस)। विदेश मंत्रालय (एमईए) ने गुरुवार को कहा कि भारत को उन खबरों की जानकारी है, जिनमें बताया जा रहा है कि नेपाल अब सीमा पार से आने वाले यात्रियों से कस्टम ड्यूटी ले रहा है, अगर वे भारत से खरीदा हुआ 100 नेपाली रुपए (एनपीआर) से ज्यादा का सामान साथ ला रहे हैं।
नई दिल्ली में साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान एमईए के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत इस मुद्दे पर नेपाल के साथ लगातार बातचीत कर रहा है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, हमने भी ऐसी खबरें देखी हैं कि नेपाली अधिकारी एक पुराने नियम को लागू कर रहे हैं, जिसके तहत अगर कोई व्यक्ति भारत से खरीदा हुआ 100 नेपाली रुपए से ज्यादा का सामान लेकर आता है तो उस पर कस्टम ड्यूटी ली जाती है। हमें समझ में आता है कि नेपाल सरकार ने यह कदम मुख्य रूप से गैर-आधिकारिक व्यापार और तस्करी को रोकने के लिए उठाया है। हमने यह भी देखा है कि नेपाल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि जो लोग अपने निजी या घरेलू इस्तेमाल का सामान ला रहे हैं, उन्हें रोका नहीं जाएगा। हम इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं और बातचीत कर रहे हैं।”
इससे पहले आईएएनएस की रिपोर्ट में बताया गया था कि नेपाल सरकार के इस फैसले की सीमा से लगे इलाकों में काफी आलोचना हो रही है, क्योंकि वहां के लोग लंबे समय से सस्ते सामान के लिए भारत के बाजारों पर निर्भर रहते हैं।
नेपाल सरकार ने पिछले कुछ दिनों में इस नियम को सख्ती से लागू करना शुरू किया है। यह नियम कई साल पहले बनाया गया था, लेकिन सीमा क्षेत्रों के लोगों की दिक्कतों की वजह से इसे लागू नहीं किया जा रहा था। अब नई सरकार के इसे लागू करने से स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ गई है।
नेपाल-इंडिया ओपन बॉर्डर इंटरैक्शन ग्रुप, जो एक सामाजिक संगठन है, ने शनिवार को सरकार से इस नीति में तुरंत बदलाव करने की मांग की। उनका कहना है कि इससे सीमा पर रहने वाले लोगों को बेवजह परेशानी हो रही है।
इस समूह ने अपने बयान में कहा कि नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते हैं, इसलिए सरकार को ऐसे फैसले लेने चाहिए जो लोगों के लिए आसान हों और आपसी संबंधों को मजबूत करें।
समूह ने मांग की कि 100 नेपाली रुपए से ज्यादा के सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाने का नियम तुरंत खत्म किया जाए। उनका कहना है कि यह नियम गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए ज्यादा मुश्किल पैदा करता है और इसे लागू करना भी आसान नहीं है। इसके बजाय घरेलू इस्तेमाल के सामान पर कोई ड्यूटी नहीं होनी चाहिए।
नेपाल के कस्टम विभाग के निदेशक किशोर बरतौला ने कहा कि यह नियम तस्करी को रोकने के लिए लागू किया गया है। तस्कर आम लोगों का इस्तेमाल करते हैं, जो भारत से बार-बार थोड़ा-थोड़ा सामान लाते हैं और उस पर ड्यूटी नहीं देते। बाद में इस सामान को इकट्ठा करके बड़े पैमाने पर बेच दिया जाता है। वैसे भी 100 नेपाली रुपए से ज्यादा के सामान पर ड्यूटी लेने से सरकार को ज्यादा राजस्व नहीं मिलता।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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