AR Rahman Son Accident: ए.आर. रहमान के बेटे ए.आर. आमीन की कार का एक्सीडेंट, अस्पताल में कराया गया भर्ती
AR Rahman son AR Ameen accident: मशहूर संगीतकार एआर रहमान के बेटे एआर आमीन सोमवार तड़के चेन्नई में एक सड़क हादसे का शिकार हो गए. हादसे के बाद उन्हें इलाज के लिए एक निजी अस्पताल ले जाया गया.
तीन तिगाड़ा काम...पाक-सऊदी-तुर्किये की यारी क्या भारत पर पड़ेगी भारी? 'सुन्नी NATO' से हम कितने मजबूत, इस रिपोर्ट में जानें
तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा इस प्रसिद्ध हिंदी मुहावरे के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा। इसका अर्थ है कि जहाँ तीन लोग मिल जाते हैं या जहाँ तीन का समूह होता है, वहाँ अक्सर काम खराब हो जाता है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर जो नया त्रिपक्षीय गठबंधन बनाया है, उसने वैश्विक कूटनीति और दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन में एक नई हलचल पैदा कर दी है। पाकिस्तान का सऊदी अरब के वित्तीय प्रभाव और तुर्की की उन्नत सैन्य तकनीक के साथ जुड़ना, सतह पर देखने में एक साधारण रक्षा-समझौता लग सकता है, लेकिन इसके दूरगामी रणनीतिक मायने हैं। क्या यह 'तीन तिगाड़ा' वास्तव में भारत की सुरक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय प्रभुत्व पर कोई बड़ा प्रहार करने की क्षमता रखता है, या फिर यह गठबंधन खुद अपने ही विरोधाभासों के बोझ तले दब जाएगा? आइए, इस गठजोड़ के हर पहलू, इसके संभावित खतरों और भारत की मजबूत रणनीतिक स्थिति का बारीक विश्लेषण करते हैं।
क्या है पूरा मामला?
पाकिस्तान ने जो सऊदी और टर्की के साथ यह समझौता किया है, जो करार किया है, क्या वह भारत के ऊपर प्रहार करने के लिए किया गया है? पाक का सऊदी तुर्किए से करार क्या होगा भारत पर प्रहार? जी हां, यह भी एक बहुत बड़ा विषय है जिस पर हम आज बात करेंगे। क्योंकि यह जो समझौता हुआ है इसका असर तो होगा, लेकिन भारत के लिहाज से यह क्या हो सकता है? भारत के लिए समझौता क्या मायने रखता है वो भी हम आपको बताएंगे। मगर सबसे पहले ये आपको बताते हैं कि आखिरकार ये ट्राईटरल संधि है क्या? ये त्रिपक्षीय संधि क्या है जो सऊदी, टर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ है। ये वो ट्रीटी है जो इस तीनों देशों के बीच हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण है जगह। जगह है मक्का जो मुस्लिमों के लिए सबसे पवित्र स्थान है। वहां पर यह समझौता किया गया है। सऊदी, टर्की और पाकिस्तान की ओर से तो यह बताया गया कि ये जो समझौता है ये सिर्फ और सिर्फ डिफेंस पैक्ट है। और कहा भी ये जा रहा है कि ये समिट जो है फॉर जॉइंट डिफेंस समिट किया गया। ये समिट जो हुआ वो डिफेंस इसका मसौदा था। लेकिन इसमें जो बातें निकल कर सामने आई है इसका मतलब यह है कि अगर पाकिस्तान पर तुर्किए और साथ ही सऊदी में से किसी भी एक देश पर अगर हमला होता है तो यह माना जाएगा कि तीनों देशों के ऊपर हमला हुआ है। एक बात इससे क्लियर हो गई कि जिस तरह का पैक्ट सऊदी और साथ ही साथ पाकिस्तान के साथ 2025 सितंबर में हुआ था। बिल्कुल वही पैक्ट इस वक्त हो गया है इन तीनों देशों के बीच। यानी ये कह सकते हैं कि पाकिस्तान और सऊदी के बीच जो पैक्ट हुआ था सितंबर 2025 को उसमें अब तुर्किए भी जुड़ गया है। तो अब ये तीनों देश हो गए हैं। अब इसमें तीनों देश को अगर देखा जाए तो हर देश की अपनी-अपनी खूबी होती है।
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पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर बम है। सऊदी के पास पैसा है। उसका डिफेंस बजट ही करीब 100 बिलियन डॉलर का है। और टर्की के पास क्या है? तुर्की के पास है पहली चीज। नाटो की दूसरी सबसे बड़ी आर्मी फौज है और दूसरी चीज है उनके पास एक डिफेंस इंडस्ट्री है जिसमें वो कई आधुनिक हथियार तैयार करते हैं। ड्रोंस उनका सबसे घातक हथियार इस वक्त दुनिया में माना जाता है। तो तीनों देशों की जो ताकत है वो साथ लेकर आ रहे हैं और तीनों देश मिलकर अब ये समझौता किया है।
ये संधि क्यों की गई?
मौजूदा हालात सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। ईरान सबसे बड़ा इस वक्त फैक्टर है, जिसकी वजह से तुर्किए को इसमें आना पड़ा। यहां पर पाकिस्तान के साथ पहले सऊदी अरब को ये ट्रीटी करनी पड़ी इसकी वजह भी ईरान है। क्योंकि इस वक्त जो हालात मिडिल ईस्ट के बने हुए हैं उसमें एक बात तो ईरान ने दुनिया के सामने साबित कर दी है कि अमेरिका जैसा दुनिया का सुपर पावर ईरान को घुटनों पर लाने में नाकामयाब रहा। 150 दिन का वक्त हो चुका है। 28 फरवरी 2026 को पहला हमला हुआ था। जिसके बाद से हमले होते रहे, संघर्ष होता रहा, समझौता भी हुआ। माना गया कि शायद डील हो गई है। अब सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा। लेकिन अमेरिका जो चाहता है ईरान वो करने को तैयार नहीं है। क्योंकि ईरान अपनी शर्तों पर ही ट्रीटी करेगा। और पूरी दुनिया को ईरान ने बता दिया कि वो सुपर पावर के सामने झुकने को तैयार नहीं है और सरेंडर अमेरिका करवा भी नहीं सकता। यानी कि जो दबदबा है इस वक्त मिडिल ईस्ट में वो ईरान का साफ नजर आ रहा है। और जिस तरह से उसने स्टेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी करके पूरे अरब देशों को गल्फ कंट्रीज को धूल चटा दी है। उसके बाद सऊदी अरब के लिए यह बड़ा मसला हो गया कि क्योंकि पूरे इस अरब वर्ल्ड का इस पूरे अरब वर्ल्ड का खाड़ी देशों का सबसे मजबूत देश माना जाता था। सबसे अमीर देश है। दूसरी बड़ी बात है कि पिछले कुछ दिनों में देखा गया जिस तरह से होर्मुज के बाद बाब अल मंदेब या जो रेड सी का इलाका पड़ता है इस इलाके से भी जहाजों की आवाजाही पर रोक लगा दी है। हैं।
शिया से मुकाबले को एकजुट हुए तीन सुन्नी मुल्क
कुल मिलाकर ईरान ने जिस तरह से पूरी घेराबंदी की है और जिस तरह से वो पूरी दुनिया के सामने एक मजबूत ताकतवर मुल्क के तौर पर मिडिल ईस्ट में निकल कर आया है। यह कहीं ना कहीं सऊदी के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट चीज है वो है शिया और सुन्नी। क्योंकि ये तीनों देश जो हैं चाहे वो पाकिस्तान हो, पाकिस्तान, सऊदी और टर्की ये तीनों देश सुन्नी हैं। जिसमें से एकलौता है ईरान जो शिया देश है और ये शिया एक देश है जिसने पूरे मिडिल ईस्ट में इस वक्त सबको धूल चटा के रखी हुई है।
नाटो के सदस्य देश तुर्किये का जुड़ना क्यों है इतना महत्वपूर्ण
नाटो का सदस्य, अमेरिका के बाद सबसे बड़ी सेनाओं में एक। मजबूत रक्षा उद्योग और उन्नत सैन्य तकनीक। ड्रोन, मिसाइल, युद्धपोत व बख्तरबंद वाहन बनाने की क्षमता। पाकिस्तान के साथ पहले से रक्षा और तकनीकी सहयोग। पाकिस्तान के एफ-16 विमानों के आधुनिकीकरण में मदद। तकनीकी और सैन्य विशेषज्ञता देने की भूमिका। तुर्किये तकनीक, पाकिस्तान सैन्य क्षमता और सऊदी अरब आर्थिक व रणनीतिक सहयोग प्रदान करेगा।
सऊदी अरब के समुद्री रक्षा गठबंधन में बांग्लादेश भी सऊदी अरब द्वारा बनाए गए नए
14 देशों के समुद्री रक्षा गठबंधन में बांग्लादेश भी एक प्रमुख सदस्य के रूप में शामिल हुआ है। इस का उद्देश्य लाल सागर, बाब अल-मंदेब और अदन की खाड़ी जैसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा करना है।
ईऱान ने बताया कागजी समझौता
ईरान ने रक्षा समझौते पर तंज कसा है। ईरान के सांसद इब्राहिम रजाई ने कहा कि यह कागजी समझौता सऊदी को सुरक्षा नहीं दे सकता। अमेरिका की तरह यह भी नाकाम रहेगा।
भारत की स्थिति पर नजर
समझौते पर भारत की भी नजर है। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि भारत इसके प्रभावों का आकलन कर रहा है। अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थिति पर नजर रखेगा। नई दिल्ली इस पूरे घटनाक्रम में चीन के पहलू पर भी कड़ी नजर बनाए हुए है। बीजिंग के पाकिस्तान और सऊदी अरब दोनों के साथ गहरे आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं, वहीं तुर्की इस समीकरण में उद्योग स्तर पर अपनी अत्याधुनिक स्वदेशी रक्षा क्षमता को जोड़ता है। इसी वजह से भारतीय खुफिया एजेंसियां इस नए त्रिस्तरीय ढांचे को भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा पर चीन-समर्थित सुरक्षा गठबंधन के रूप में देख रही हैं। हालांकि, नई दिल्ली के लिए तत्काल कूटनीतिक चिंता का मुख्य विषय कश्मीर है। खुफिया सूत्रों का मानना है कि इस्लामाबाद, रियाद के साथ अपने मजबूत होते रिश्तों का इस्तेमाल सऊदी अरब पर दबाव बनाने के लिए करेगा, ताकि वह कश्मीर और भारत के आंतरिक सुरक्षा मुद्दों पर खुलकर बयान दे। यह कदम भारत के साथ अपने संबंधों में सऊदी अरब के पारंपरिक और संतुलित रुख की परीक्षा ले सकता है। फिलहाल, मक्का समझौता NATO जैसी एकीकृत सैन्य व्यवस्था के बजाय एक राजनीतिक प्रतिबद्धता अधिक दिखाई देता है। इसकी वास्तविक सार्थकता "किसी एक पर हमला सभी पर हमला" जैसी पंक्तियों से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से सिद्ध होगी कि अगली किसी बड़ी चुनौती या संकट के आने पर ये तीनों देश धरातल पर एक-दूसरे के लिए क्या कदम उठाने को तैयार होते हैं।
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