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तीन तिगाड़ा काम...पाक-सऊदी-तुर्किये की यारी क्या भारत पर पड़ेगी भारी? 'सुन्नी NATO' से हम कितने मजबूत, इस रिपोर्ट में जानें

तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा इस प्रसिद्ध हिंदी मुहावरे के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा। इसका अर्थ है कि जहाँ तीन लोग मिल जाते हैं या जहाँ तीन का समूह होता है, वहाँ अक्सर काम खराब हो जाता है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर जो नया त्रिपक्षीय गठबंधन बनाया है, उसने वैश्विक कूटनीति और दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन में एक नई हलचल पैदा कर दी है। पाकिस्तान का सऊदी अरब के वित्तीय प्रभाव और तुर्की की उन्नत सैन्य तकनीक के साथ जुड़ना, सतह पर देखने में एक साधारण रक्षा-समझौता लग सकता है, लेकिन इसके दूरगामी रणनीतिक मायने हैं। क्या यह 'तीन तिगाड़ा' वास्तव में भारत की सुरक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय प्रभुत्व पर कोई बड़ा प्रहार करने की क्षमता रखता है, या फिर यह गठबंधन खुद अपने ही विरोधाभासों के बोझ तले दब जाएगा? आइए, इस गठजोड़ के हर पहलू, इसके संभावित खतरों और भारत की मजबूत रणनीतिक स्थिति का बारीक विश्लेषण करते हैं।

क्या है पूरा मामला? 

पाकिस्तान ने जो सऊदी और टर्की के साथ यह समझौता किया है, जो करार किया है, क्या वह भारत के ऊपर प्रहार करने के लिए किया गया है? पाक का सऊदी तुर्किए से करार क्या होगा भारत पर प्रहार? जी हां, यह भी एक बहुत बड़ा विषय है जिस पर हम आज बात करेंगे। क्योंकि यह जो समझौता हुआ है इसका असर तो होगा, लेकिन भारत के लिहाज से यह क्या हो सकता है? भारत के लिए समझौता क्या मायने रखता है वो भी हम आपको बताएंगे। मगर सबसे पहले ये आपको बताते हैं कि आखिरकार ये ट्राईटरल संधि है क्या? ये त्रिपक्षीय संधि क्या है जो सऊदी, टर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ है। ये वो ट्रीटी है जो इस तीनों देशों के बीच हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण है जगह। जगह है मक्का जो मुस्लिमों के लिए सबसे पवित्र स्थान है। वहां पर यह समझौता किया गया है। सऊदी, टर्की और पाकिस्तान की ओर से तो यह बताया गया कि ये जो समझौता है ये सिर्फ और सिर्फ डिफेंस पैक्ट है। और कहा भी ये जा रहा है कि ये समिट जो है फॉर जॉइंट डिफेंस समिट किया गया। ये समिट जो हुआ वो डिफेंस इसका मसौदा था। लेकिन इसमें जो बातें निकल कर सामने आई है इसका मतलब यह है कि अगर पाकिस्तान पर तुर्किए और साथ ही सऊदी में से किसी भी एक देश पर अगर हमला होता है तो यह माना जाएगा कि तीनों देशों के ऊपर हमला हुआ है। एक बात इससे क्लियर हो गई कि जिस तरह का पैक्ट सऊदी और साथ ही साथ पाकिस्तान के साथ 2025 सितंबर में हुआ था। बिल्कुल वही पैक्ट इस वक्त हो गया है इन तीनों देशों के बीच। यानी ये कह सकते हैं कि पाकिस्तान और सऊदी के बीच जो पैक्ट हुआ था सितंबर 2025 को उसमें अब तुर्किए भी जुड़ गया है। तो अब ये तीनों देश हो गए हैं। अब इसमें तीनों देश को अगर देखा जाए तो हर देश की अपनी-अपनी खूबी होती है। 

इसे भी पढ़ें: Turkey ने स्पष्ट किया: Saudi Arabia और Pakistan के साथ रक्षा समझौता किसी देश के खिलाफ नहीं

पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर बम है। सऊदी के पास पैसा है। उसका डिफेंस बजट ही करीब 100 बिलियन डॉलर का है। और टर्की के पास क्या है? तुर्की के पास है पहली चीज। नाटो की दूसरी सबसे बड़ी आर्मी फौज है और दूसरी चीज है उनके पास एक डिफेंस इंडस्ट्री है जिसमें वो कई आधुनिक हथियार तैयार करते हैं। ड्रोंस उनका सबसे घातक हथियार इस वक्त दुनिया में माना जाता है। तो तीनों देशों की जो ताकत है वो साथ लेकर आ रहे हैं और तीनों देश मिलकर अब ये समझौता किया है। 

ये संधि क्यों की गई?

मौजूदा हालात सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। ईरान सबसे बड़ा इस वक्त फैक्टर है, जिसकी वजह से तुर्किए को इसमें आना पड़ा। यहां पर पाकिस्तान के साथ पहले सऊदी अरब को ये ट्रीटी करनी पड़ी इसकी वजह भी ईरान है। क्योंकि इस वक्त जो हालात मिडिल ईस्ट के बने हुए हैं उसमें एक बात तो ईरान ने दुनिया के सामने साबित कर दी है कि अमेरिका जैसा दुनिया का सुपर पावर ईरान को घुटनों पर लाने में नाकामयाब रहा। 150 दिन का वक्त हो चुका है। 28 फरवरी 2026 को पहला हमला हुआ था। जिसके बाद से हमले होते रहे, संघर्ष होता रहा, समझौता भी हुआ। माना गया कि शायद डील हो गई है। अब सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा। लेकिन अमेरिका जो चाहता है ईरान वो करने को तैयार नहीं है। क्योंकि ईरान अपनी शर्तों पर ही ट्रीटी करेगा। और पूरी दुनिया को ईरान ने बता दिया कि वो सुपर पावर के सामने झुकने को तैयार नहीं है और सरेंडर अमेरिका करवा भी नहीं सकता। यानी कि जो दबदबा है इस वक्त मिडिल ईस्ट में वो ईरान का साफ नजर आ रहा है। और जिस तरह से उसने स्टेट ऑफ होर्मुज पर नाकेबंदी करके पूरे अरब देशों को गल्फ कंट्रीज को धूल चटा दी है। उसके बाद सऊदी अरब के लिए यह बड़ा मसला हो गया कि क्योंकि पूरे इस अरब वर्ल्ड का इस पूरे अरब वर्ल्ड का खाड़ी देशों का सबसे मजबूत देश माना जाता था। सबसे अमीर देश है। दूसरी बड़ी बात है कि पिछले कुछ दिनों में देखा गया जिस तरह से होर्मुज के बाद बाब अल मंदेब या जो रेड सी का इलाका पड़ता है इस इलाके से भी जहाजों की आवाजाही पर रोक लगा दी है। हैं।  

शिया से मुकाबले को एकजुट हुए तीन सुन्नी मुल्क

कुल मिलाकर ईरान ने जिस तरह से पूरी घेराबंदी की है और जिस तरह से वो पूरी दुनिया के सामने एक मजबूत ताकतवर मुल्क के तौर पर मिडिल ईस्ट में निकल कर आया है। यह कहीं ना कहीं सऊदी के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। और दूसरी सबसे इंपॉर्टेंट चीज है वो है शिया और सुन्नी। क्योंकि ये तीनों देश जो हैं चाहे वो पाकिस्तान हो, पाकिस्तान, सऊदी और टर्की ये तीनों देश सुन्नी हैं। जिसमें से एकलौता है ईरान जो शिया देश है और ये शिया एक देश है जिसने पूरे मिडिल ईस्ट में इस वक्त सबको धूल चटा के रखी हुई है।

नाटो के सदस्य देश तुर्किये का जुड़ना क्यों है इतना महत्वपूर्ण

नाटो का सदस्य, अमेरिका के बाद सबसे बड़ी सेनाओं में एक। मजबूत रक्षा उद्योग और उन्नत सैन्य तकनीक। ड्रोन, मिसाइल, युद्धपोत व बख्तरबंद वाहन बनाने की क्षमता। पाकिस्तान के साथ पहले से रक्षा और तकनीकी सहयोग। पाकिस्तान के एफ-16 विमानों के आधुनिकीकरण में मदद। तकनीकी और सैन्य विशेषज्ञता देने की भूमिका। तुर्किये तकनीक, पाकिस्तान सैन्य क्षमता और सऊदी अरब आर्थिक व रणनीतिक सहयोग प्रदान करेगा।

सऊदी अरब के समुद्री रक्षा गठबंधन में बांग्लादेश भी सऊदी अरब द्वारा बनाए गए नए

14 देशों के समुद्री रक्षा गठबंधन में बांग्लादेश भी एक प्रमुख सदस्य के रूप में शामिल हुआ है। इस का उद्देश्य लाल सागर, बाब अल-मंदेब और अदन की खाड़ी जैसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा करना है।

ईऱान ने बताया कागजी समझौता

ईरान ने रक्षा समझौते पर तंज कसा है। ईरान के सांसद इब्राहिम रजाई ने कहा कि यह कागजी समझौता सऊदी को सुरक्षा नहीं दे सकता। अमेरिका की तरह यह भी नाकाम रहेगा।

भारत की स्थिति पर नजर

समझौते पर भारत की भी नजर है। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि भारत इसके प्रभावों का आकलन कर रहा है। अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थिति पर नजर रखेगा। नई दिल्ली इस पूरे घटनाक्रम में चीन के पहलू पर भी कड़ी नजर बनाए हुए है। बीजिंग के पाकिस्तान और सऊदी अरब दोनों के साथ गहरे आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं, वहीं तुर्की इस समीकरण में उद्योग स्तर पर अपनी अत्याधुनिक स्वदेशी रक्षा क्षमता को जोड़ता है। इसी वजह से भारतीय खुफिया एजेंसियां इस नए त्रिस्तरीय ढांचे को भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा पर चीन-समर्थित सुरक्षा गठबंधन के रूप में देख रही हैं। हालांकि, नई दिल्ली के लिए तत्काल कूटनीतिक चिंता का मुख्य विषय कश्मीर है। खुफिया सूत्रों का मानना है कि इस्लामाबाद, रियाद के साथ अपने मजबूत होते रिश्तों का इस्तेमाल सऊदी अरब पर दबाव बनाने के लिए करेगा, ताकि वह कश्मीर और भारत के आंतरिक सुरक्षा मुद्दों पर खुलकर बयान दे। यह कदम भारत के साथ अपने संबंधों में सऊदी अरब के पारंपरिक और संतुलित रुख की परीक्षा ले सकता है। फिलहाल, मक्का समझौता NATO जैसी एकीकृत सैन्य व्यवस्था के बजाय एक राजनीतिक प्रतिबद्धता अधिक दिखाई देता है। इसकी वास्तविक सार्थकता "किसी एक पर हमला सभी पर हमला" जैसी पंक्तियों से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से सिद्ध होगी कि अगली किसी बड़ी चुनौती या संकट के आने पर ये तीनों देश धरातल पर एक-दूसरे के लिए क्या कदम उठाने को तैयार होते हैं।


 

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Republic of Balochistan जल्द बनेगा हकीकत! Balochistan Independence में सिर्फ 24 घंटे बाकी, Pakistan में हलचल तेज

बलूचिस्तान ने एक बार फिर पाकिस्तान की संप्रभुता को सीधी चुनौती देते हुए 11 अगस्त को अपना ‘स्वतंत्रता दिवस’ घोषित कर दिया है। खुद को ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ बताने वाले अलगाववादी समूह ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उसे एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील की है। कुछ सप्ताह पहले भी समूह पाकिस्तान से अलग होने की घोषणा कर चुका है और भारत समेत दूसरे देशों से राजनयिक मान्यता की मांग कर चुका है। यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब बलूचिस्तान में सुरक्षा पाबंदियां, कथित जबरन गुमशुदगियां और हिंसा के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। यानी बलूचिस्तान का सवाल अब केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि वह धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता जा रहा है।

लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या बलूचिस्तान वास्तव में पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बन सकता है? अंतरराष्ट्रीय कानून की कसौटी पर फिलहाल इसका रास्ता बेहद कठिन है। किसी क्षेत्र द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा कर देना अपने आप उसे नया राष्ट्र नहीं बना देता। व्यापक रूप से स्वीकार किए गए मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मानकों के अनुसार स्थायी आबादी, निश्चित भू-भाग, प्रभावी सरकार और दूसरे देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता जैसे तत्व राज्य की बुनियादी पहचान के लिए जरूरी माने जाते हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मान्यता किसी नए देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है।

इसे भी पढ़ें: बलूचिस्तान का 70% क्षेत्र गंवाया, खैबर को तालिबान ने कब्जाया, PoK में गोलियों से आवाज को दबाया, किस पाकिस्तान पर हुकूमत कर रहे मुनीर-शहबाज?

यहीं बलूचिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। अभी तक किसी देश ने औपचारिक रूप से ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। पाकिस्तान भी बलूचिस्तान पर प्रशासनिक, सैन्य और न्यायिक नियंत्रण बनाए हुए है। अलगाववादी संगठन भले ही प्रांत के कुछ हिस्सों में सक्रिय हों, लेकिन इस्लामाबाद का सरकारी तंत्र अब भी व्यापक रूप से काम कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में किसी क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण राज्य की संप्रभुता का महत्वपूर्ण संकेतक है। इसलिए जब तक पाकिस्तान का नियंत्रण निर्णायक रूप से समाप्त नहीं होता, स्वतंत्र बलूचिस्तान का दावा व्यावहारिक स्तर पर बेहद मुश्किल बना रहेगा।

वैसे बलूचिस्तान के अलगाववादी आंदोलन को समझने के लिए पाकिस्तान की दशकों पुरानी नीतियों और वहां के लोगों में पैदा हुए असंतोष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बलूच संगठनों और मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध इस प्रांत को राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विकास और नागरिक अधिकारों के मामले में लंबे समय से उपेक्षित रखा गया है, जबकि सुरक्षा के नाम पर सैन्य और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी बढ़ती गई। जबरन गुमशुदगियां इस संकट का सबसे भयावह चेहरा बनकर सामने आई हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने छात्रों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और मानवाधिकार रक्षकों के जबरन गायब किए जाने की घटनाओं को दर्ज किया है, जबकि ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाकिस्तान के सुरक्षा बलों पर गुमशुदगी, गुप्त हिरासत, यातना और न्यायेतर हत्याओं से जुड़े गंभीर आरोपों का दस्तावेजीकरण किया है। हाल के वर्षों में भी बलूच राजनीतिक आंदोलनों और प्रदर्शनों पर कार्रवाई तथा गुमशुदगी के आरोप जारी रहे हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार 2024 में बलूच नेशनल गैदरिंग के दौरान सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया और प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे। यही कथित दमन बलूच समाज के उस वर्ग को मजबूत करता है जो मानता है कि इस्लामाबाद उसे पाकिस्तान के बराबर का नागरिक नहीं, बल्कि एक ऐसे भूभाग के रूप में देखता है जिसे सुरक्षा और संसाधनों के नजरिये से नियंत्रित किया जाना है।

फिर भी बलूचिस्तान में हालात जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, वह पाकिस्तान के लिए गंभीर चिंता का संकेत हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार कालात और खुजदार में सुरक्षा कारणों से कारोबार और नागरिक आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। कालात में दुकानदारों को शाम छह बजे तक दुकानें बंद करने और लोगों को रात में घरों में रहने के निर्देश दिए गए। बाद में कालात में 9 अगस्त से 15 अगस्त तक रात आठ बजे से सुबह नौ बजे तक कर्फ्यू लागू किए जाने की आधिकारिक अधिसूचना की भी रिपोर्ट सामने आई। खुजदार में बाजारों, दुकानों, होटलों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को रात आठ बजे से सुबह दस बजे तक बंद रखने का आदेश दिया गया।

इन पाबंदियों के बीच मानवाधिकार संबंधी आरोपों ने संकट को और गंभीर बना दिया है। बलूच अधिकार संगठनों के हवाले से 19 वर्षीय मजदूर सईद अहमद के कथित जबरन गायब किए जाने की खबर सामने आई है। वहीं बलूचिस्तान के खुजदार में इनायतुल्लाह जट्टक की हत्या को लेकर भी बलूच कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान समर्थित ‘डेथ स्क्वॉड’ पर आरोप लगाए हैं। उनकी बेटी अस्मा जट्टक ने हत्या से पहले अपने पिता और परिवार की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक रूप से आशंका जताई थी।

इसके अलावा कराची और बलूचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगी के कई मामलों ने चिंता बढ़ाई है। रिपोर्टों में 28 वर्षीय मजदूर साबिर, अब्दुल अजीज और दुकानदार आमिर के हिरासत में लिए जाने के बाद उनके ठिकाने की जानकारी परिवारों को न मिलने का दावा किया गया है। क्वेटा में दो 14 वर्षीय छात्रों को भी कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने और उनके बाद से लापता होने की बात सामने आई है। बुलेदा निवासी मंसूर अनवर के परिवार ने भी उनके दोबारा कथित रूप से गायब किए जाने का आरोप लगाया है।

देखा जाये तो कानूनी रूप से बलूचिस्तान का मामला इसलिए भी जटिल है क्योंकि एक तरफ संयुक्त राष्ट्र चार्टर आत्मनिर्णय के सिद्धांत को मान्यता देता है, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था मौजूदा संप्रभु देशों की क्षेत्रीय अखंडता की भी रक्षा करती है। इतिहास बताता है कि अलगाव को अंतरराष्ट्रीय समर्थन आमतौर पर असाधारण परिस्थितियों में ही मिलता है। कोसोवो का उदाहरण अलग है, जहां बड़ी संख्या में देशों ने स्वतंत्रता को मान्यता दी, जबकि उत्तरी साइप्रस, सोमालिलैंड और ट्रांसनिस्ट्रिया जैसे क्षेत्र लंबे समय से अलग प्रशासन चलाने के बावजूद व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल नहीं कर पाए हैं।

भारत के लिए यह घटनाक्रम खास महत्व रखता है। नई दिल्ली ने अब तक बलूचिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा माना है और उसे स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी है। हालांकि भारत ने बलूचिस्तान में मानवाधिकार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चिंता जरूर जताई है।

देखा जाये तो फिलहाल बलूचिस्तान की स्वतंत्रता तत्काल वास्तविकता से ज्यादा पाकिस्तान के लिए बढ़ते दबाव का संकेत है। पाकिस्तान एक साथ बलूचिस्तान के विद्रोह, खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। 11 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश इस संघर्ष को प्रतीकात्मक और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर नया आयाम दे सकती है। लेकिन जब तक अलगाववादी ताकतें प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण, स्थायी प्रशासन और व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल नहीं करतीं, तब तक स्वतंत्र बलूचिस्तान की घोषणा पाकिस्तान की मौजूदा कानूनी स्थिति को अपने आप नहीं बदल पाएगी।

फिर भी पाकिस्तान के लिए खतरा कम नहीं है। अगर बलूचिस्तान में राजनीतिक असंतोष, सशस्त्र विद्रोह और मानवाधिकार संकट एक-दूसरे से जुड़ते गए और उन्हें अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलने लगा, तो इस्लामाबाद के सामने केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि राज्य की क्षेत्रीय अखंडता का सवाल खड़ा हो सकता है। यही वह बिंदु है जहां बलूचिस्तान भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व हासिल करता है क्योंकि पाकिस्तान के पश्चिमी मोर्चे पर बढ़ती अस्थिरता क्षेत्रीय रणनीति पर सीधा असर डाल सकती है।

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क्या टीम इंडिया का एक और खिलाड़ी हुआ चोटिल? स्पिन बॉलिंग कोच साईराज बहुतुले ने दिया बड़ा अपडेट

श्रीलंका के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की सीरीज से पहले टीम इंडिया के स्पिनर कुलदीप यादव की फिटनेस पर सवाल उठ रहे हैं. इस पूरे मामले पर टीम इंडिया के स्पिन बॉलिंग कोच साईराज बहुतुले ने अपडेट दिया. कुलदीप प्रैक्टिस मैच के एक ही पारी में गेंदबाजी की थी. इस पर बहुतुले ने कहा कि कुलदीप को फिटनेस पर कोई समस्या नहीं है. Mon, 10 Aug 2026 14:03:44 +0530

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