Crude Oil कीमतों में तेजी से Share Market में गिरावट, Sensex 158 अंक टूटा
वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से सोमवार को शुरुआती कारोबार में घरेलू शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ कारोबार कर रहे थे। बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में 19.38 अंक की गिरावट के साथ78,479.79 अंक पर आ गया। वहीं, एनएसई का 50 शेयरों वाला निफ्टी 5.10 अंक फिसलकर 24,567.45 अंक पर कारोबार कर रहा था।
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बाद में कारोबार के दौरान सेंसेक्स 158.62 अंक टूटकर 78,340.55 अंक पर और निफ्टी 45.20 अंक गिरकर 24,524.95 अंक पर आ गया। सेंसेक्स में शामिल कंपनियों में इटरनल, भारतीय स्टेट बैंक, इंटरग्लोब एविएशन, पावर ग्रिड, एनटीपीसी और भारती एयरटेल के शेयर प्रमुख रूप से नुकसान में रहे। वहीं, टाइटन, इन्फोसिस, टेक महिंद्रा और एचसीएल टेक के शेयर बढ़त में कारोबार कर रहे थे।
अंतरराष्ट्रीय तेल मानक ब्रेंट क्रूड का भाव 1.03 प्रतिशत बढ़कर 84.41 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने शुक्रवार को शुद्ध आधार पर 480.24 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। एशियाई बाजारों में दक्षिण कोरिया का कॉस्पी, जापान का निक्की-225, चीन का एसएसई कम्पोजिटऔर हांगकांग का हैंगसेंग बढ़त के साथ कारोबार कर रहे थे।
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अमेरिकी शेयर बाजार शुक्रवार को बढ़त के साथ बंद हुए थे। शुक्रवार को सेंसेक्स 455.59 अंक टूटकर 78,499.17 अंक पर बंद हुआ था। वहीं, निफ्टी 65.35 अंककी गिरावट के साथ 24,570.65 अंक पर बंद हुआ था।
Gold का भाव अब युद्ध से नहीं बल्कि अमेरिकी Fed के फैसलों और ब्याज दरों से होगा तय
सोने की कीमतों और भू-राजनीतिक संघर्षों के बीच पारंपरिक संबंध बदल रहा है तथा मुद्रास्फीति, ब्याज दरें और मौद्रिक नीति सर्राफा कीमतों को प्रभावित करने वाले अधिक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरे हैं। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (एमओएफएसएल)) की एच1 2026 प्रेशियस मेटल्स रिपोर्ट के अनुसार, चालू वर्ष की पहली छमाही में यह स्पष्ट हुआ कि केवल भू-राजनीतिक जोखिम सोने में तेजी बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
निवेशक अब संघर्षों का आकलन इस आधार पर अधिक कर रहे हैं कि उनका मुद्रास्फीति और ब्याज दरों पर क्या असर पड़ता है। एमओएफएसएल में जिंस शोध प्रमुख नवनीत दमानी ने कहा, 2026 की पहली छमाही ने दिखाया कि युद्ध और सोने के बीच संबंध अब पहले की तुलना में अधिक परिस्थितियों पर निर्भर हो गया है। उन्होंने कहा कि बाजार अब केवल भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर ध्यान नहीं दे रहा, बल्कि यह देख रहा है कि उनका मुद्रास्फीति, वास्तविक ब्याज दरों और मौद्रिक नीति की अपेक्षाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है।
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दमानी ने कहा कि ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल (यील्ड) सोने के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरी। इससे सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की पारंपरिक मांग पर भी असर पड़ा, जबकि भू-राजनीतिक तनाव ऊंचे स्तर पर बने रहे। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष की शुरुआत में नीतिगत अनिश्चितता, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) में निवेश, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों से सोने की कीमतों को मजबूती मिली।
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रिपोर्ट में कहा गया कि बाद में शुल्क बढ़ने से उत्पादन लागत और मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं बढ़ीं। इससे लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बने रहने की आशंका मजबूत हुई और अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की वास्तविक प्रतिफल तथा डॉलर में तेजी आई। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष भी इस बदलते रुख का उदाहरण है।
संघर्ष बढ़ने पर शुरुआती दौर में सोने की मांग बढ़ी, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति की चिंता बढ़ी और मौद्रिक नीति में ढील की उम्मीद कमजोर हुई। इससे सोने की तेजी सीमित रही और बाद में कीमतों में सुधार आया। रिपोर्ट में कहा गया, शुल्क अब केवल आर्थिक वृद्धि के लिए जोखिम नहीं रह गए हैं, बल्कि वे मुद्रास्फीति बढ़ाने वाली ताकत बन गए हैं।
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रिपोर्ट के अनुसार, आगे भी मुद्रास्फीति का रुख, फेडरल रिजर्व के संकेत, वैश्विक नकदी की उपलब्धता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, ईटीएफ में निवेश और सट्टा निवेश सोने और चांदी की कीमतों के प्रमुख चालक बने रहेंगे।
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