चीन के साथ नजदीकी कनाडा के लिए जोखिम भरा कदम : रिपोर्ट
नई दिल्ली, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। कनाडा की ओर से चीन के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने की कोशिश उसकी आर्थिक सुरक्षा के लिए जोखिम बन सकती है और अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में भी तनाव पैदा कर सकती है।
ग्लोबल न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा के पूर्व राजनयिक माइकल कोवरिग ने चेतावनी दी कि चीन को लेकर ओटावा (कनाडा की राजधानी) की बदलती रणनीति एक खतरनाक कदम है, जिसे वॉशिंगटन अच्छी नजर से नहीं देख सकता और इससे उसके सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार अमेरिका के साथ चल रही बातचीत भी प्रभावित हो सकती है।
कोवरिग के अनुसार, “असल समस्या यह है कि अमेरिका के साथ हमारी ज्यादातर दिक्कतों का समाधान चीन नहीं है।”
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कनाडा चीन के साथ ज्यादा करीब जाता है, तो अमेरिका की नजर में वह अविश्वसनीय सहयोगी लग सकता है।
कोवरिग ने बताया कि कनाडा के करीब 75 प्रतिशत निर्यात अमेरिका को जाते हैं, जबकि चीन का हिस्सा सिर्फ लगभग 4 प्रतिशत है। इससे दोनों देशों पर निर्भरता का फर्क साफ दिखता है।
हाल ही में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के नेतृत्व में कनाडा सरकार ने एक समझौते की घोषणा की, जिसमें सीमित संख्या में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों का आयात और कुछ कनाडाई कृषि उत्पादों पर टैरिफ में ढील जैसी बातें शामिल हैं।
इस समझौते का लक्ष्य 2030 तक चीन को कनाडा के निर्यात को 50 प्रतिशत तक बढ़ाना है।
कोवरिग का कहना है कि फिलहाल चीन “खरीदने के बजाय बेचने की स्थिति में” है और वह चाहता है कि दुनिया उसके निर्यात पर ज्यादा निर्भर हो जाए।
उन्होंने चेतावनी दी कि चीन धीरे-धीरे अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दबाव बना सकता है। जैसे कि भविष्य में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए तय सीमा बढ़ाने की मांग करना।
उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सस्ते आयात घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे बड़े रिटेल स्टोर छोटे दुकानदारों को पीछे छोड़ देते हैं, जिससे अंत में प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है और निर्भरता बढ़ जाती है।
उन्होंने यह भी बताया कि कैनोला, पोर्क और सीफूड जैसे सेक्टर पहले से ही चीनी बाजार पर काफी निर्भर हो चुके हैं, जिससे वे किसी भी व्यापारिक रुकावट के समय मुश्किल में पड़ सकते हैं।
उन्होंने कहा, “अगर चीन अचानक व्यापार बंद कर दे, तो इन सेक्टर के लोगों के लिए आर्थिक तबाही जैसा होगा।” साथ ही उन्होंने कहा कि ऐसी निर्भरता घरेलू नीतियों को भी प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, कोवरिग ने चीन से पूरी तरह दूरी बनाने की बात नहीं कही। उनका कहना है कि संबंध बनाए रखने चाहिए, लेकिन बहुत सोच-समझकर और सख्त नियमों के साथ, ताकि किसी तरह का गलत फायदा न उठाया जा सके।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दूसरे विशेषज्ञों ने भी इसी तरह की चिंता जताई है और चेतावनी दी है कि यह समझौता कनाडा-अमेरिका-मेक्सिको समझौते को फिर से बातचीत में लाने पर असर डाल सकता है।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
यूरोप के लिए खतरा बन रहा पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन: रिपोर्ट
इस्लामाबाद, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान में पनप रहा आतंकवाद अब केवल क्षेत्रीय या दूरस्थ खतरा नहीं रह गया है, बल्कि यह यूरोप के लिए भी एक प्रत्यक्ष सुरक्षा चुनौती बनता जा रहा है। इससे बाहरी अस्थिरता के यूरोप के भीतर स्थायी संकट में बदलने का खतरा बढ़ रहा है। बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई।
‘यूरेशिया रिव्यू’ के लिए लिखते हुए ग्रीक वकील, लेखिका और पत्रकार दिमित्रा स्टाइको ने कहा कि पाकिस्तान भले ही अमेरिका-ईरान तनाव में मध्यस्थ की अपनी छवि को उभारने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान अब भी आतंकवादी संगठनों के लिए “उत्पत्ति केंद्र और सुरक्षित पनाहगाह” बना हुआ है, जो लगातार सक्रिय रहकर क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर कर रहे हैं।
रिपोर्ट में पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जिक्र किया गया, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान गई थी। इस हमले में पीड़ितों को उनके धर्म के आधार पर अलग कर निर्ममता से हत्या की गई थी, जिससे आतंकवाद के मानवीय और सामाजिक प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आए।
विशेषज्ञ के अनुसार, यह हमला कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि एक संगठित और गहराई से जमी हुई हिंसक व्यवस्था का हिस्सा था। इस तंत्र के केंद्र में ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) है, जो लश्कर-ए-तैयबा का सहयोगी संगठन माना जाता है। रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसे संगठनों की गतिविधियां किसी आकस्मिक योजना का परिणाम नहीं, बल्कि क्षेत्र को अस्थिर करने की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि हाल के वर्षों में पाकिस्तान में आतंकी संगठनों का “मुख्यधारा में आना” बढ़ा है। लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़कर अपनी गतिविधियों का विस्तार कर रहे हैं।
2025 में मसूद अजहर के नेतृत्व में जैश-ए-मोहम्मद ने पंजाब और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भर्ती अभियान तेज किया और ‘जमात-उल-मोमिनात’ नाम से महिला विंग की स्थापना की। वहीं, 2024 से 2026 के बीच लश्कर-ए-तैयबा ने समुद्री अभियानों के लिए ‘वॉटर विंग’ जैसे विशेष प्रशिक्षण ढांचे विकसित किए।
रिपोर्ट के मुताबिक, भर्ती अभियान, जनसभाएं और भारत विरोधी बयानबाजी इस बात का संकेत हैं कि ये संगठन अब केवल भूमिगत नेटवर्क नहीं रह गए हैं, बल्कि समाज में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहे हैं और कट्टरपंथ को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा दे रहे हैं।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि इसका प्रभाव यूरोप पर भी पड़ सकता है, क्योंकि अतीत में पाकिस्तान से जुड़े नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमलों की योजना, प्रशिक्षण और वित्तपोषण में शामिल रहे हैं। ऐसे में यह खतरा अब वैश्विक रूप लेता जा रहा है।
--आईएएनएस
डीएससी
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