तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य की कोलाथुर सीट फिर से हाई-प्रोफाइल टक्कर का केंद्र बनी है। इस सीट से डीएमके की ओर से खुद मुख्यमंत्री एमके स्टालिन चुनावी रण में उतरे हैं। बता दें कि राज्य विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल 2026 को होने हैं और 04 मई 2026 को मतगणना होनी है। ऐसे में कोलाथुर विधानसभा सीट पर दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है।
DMK का मजबूत किला
कोलाथुर विधानसभा सीट डीएमके का मजबूत किला है। यहां से सीएम स्टालिन लगातार जीत हासिल कर रहे हैं। वहीं खुद सीएम होने के नाते स्टालिन की पर्सनल इमेज और विकास कार्य इस विधानसभा चुनाव को उनके पक्ष में मजबूत करते हैं। पार्टी को बुनियादी सुविधाओं और लोकल लेवल पर इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार को लेकर फायदा मिलने की उम्मीद है।
मुख्य उम्मीदवार
राज्य की कोलाथुर विधानसभा सीट से डीएमके की ओर से खुद मुख्यमंत्री एमके स्टालिन चुनावी रण में उतरे हैं। वहीं AIADMK के प्रत्याशी P. Santhana Krishnan भी इस सीट पर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। टीवीके ने यहां से वीएस बाबू पर भरोसा जताया है, तो वहीं एनटीके ने Soundara Pandian Louther Seth को चुनावी मैदान में उतारा है। चार प्रत्याशियों के इस सीट पर आमने-सामने होने से यह मुकाबला बहुकोणीय और रोचक बन गया है।
हालांकि इस सीट पर मुख्य मुकाबला DMK और AIADMK के बीच माना जा रहा है। लेकिन टीवीके और एनटीके के प्रवेश ने सियासी समीकरणों को जटिल बना दिया है। AIADMK उम्मीदवार पी. संथाना कृष्णन एंटी-इन्कंबेंसी का फायदा उठाने और पारंपरिक वोट बैंक को साधने पर फोकस कर रहे हैं। वहीं TVK के वी.एस. बाबू और NTK के Soundara Pandian Louther Seth भी नए मतदाताओं और युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि इस हाई प्रोफाइल सीट पर जनता किसको चुनती है।
Continue reading on the app
तमिलनाडु की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम राज्य विधानसभा चुनाव में अपने अस्तित्व और प्रभाव को बचाए रखने की जद्दोजहद में बनी हुई है। पूर्व सीएम जे जयललिता के निधन के बाद पार्टी नेतृत्व संकट में फंस गई। जिससे वह अब तक नहीं उबर पाई है। क्योंकि जयललिता सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं थी। बल्कि वह AIADMK की केंद्रीय धुरी भी थीं।
नेतृत्व का अभाव
वहीं जयललिता की जनकल्याणकारी योजनाएं, व्यक्तित्व और सख्त प्रशासनिक छवि ने पार्टी को मजबूत जनाधार दिया था। लेकिन जयललिता के निधन के बाद AIADMK पार्टी में कोई ऐसा चेहरा उभरकर सामने नहीं आया, जो पूरे संगठन को एकजुट रख सके। पार्टी में नेतृत्व की कमी होने के कारण पार्टी को गुटबाजी की तरफ धकेल दिया। वहीं ओ. पन्नीरसेल्वम और एडप्पाड़ी के. पलानीस्वामी के बीच चलने वाले शक्ति संघर्ष ने संगठन को कमजोर किया।
इसके अलावा वी.के शशिकला की वापसी की अटकलों ने आंतरिक अस्थिरता को अधिक बढ़ाया। साल 2019 के लोकसभा चुनाव और साल 2021 के विधानसभा चुनाव में AIADMK पार्टी को सत्ता से बाहर रहना पड़ा। इन चुनावों में मिली हार ने यह स्पष्ट कर दिया कि सिर्फ 'अम्मा' की विरासत के सहारे राजनीति करना अब पर्याप्त नहीं है। खासकर युवाओं और शहरी वर्ग, मतदाताओं, विकास, रोजगार और सामाजिक न्याय के नए मुद्दों को प्राथमिकता मिली है।
गठबंधन की राजनीति
भाजपा के साथ गठबंधन कर AIADMK ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया है। लेकिन तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीति में बीजेपी के साथ हमेशा समीकरण सही नहीं रहे हैं। पार्टी के अंदर इस गठबंधन को लेकर मतभेद देखने को मिले हैं। वहीं विश्लेषकों की मानें, तो AIADMK पार्टी को अपने स्वतंत्र क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करने के साथ संतुलित गठबंधन रणनीति अपनानी होगी।
कैसी रहेगी 2026 की राह
साल 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव AIADMK पार्टी के लिए अस्तित्व की लड़ाई की तरह है। पार्टी के सामने संगठनात्मक ढांचे का पुनर्गठन, एकजुट और स्वीकार्य नेतृत्व का निर्माण और युवा और महिला मतदाताओं के बीच भरोसा पुनर्स्थापित करना आदि जैसी कई बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में अगर AIADMK इन तीनों मोर्चों पर सफल होती है, तो पार्टी वापसी की राह पकड़ सकती है। अन्यथा, राज्य की राजनीति में पार्टी का प्रभाव और सीमित हो सकता है।
Continue reading on the app