तमिलनाडु की राजनीति में कभी अजेय मानी जाने वाली ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम राज्य विधानसभा चुनाव में अपने अस्तित्व और प्रभाव को बचाए रखने की जद्दोजहद में बनी हुई है। पूर्व सीएम जे जयललिता के निधन के बाद पार्टी नेतृत्व संकट में फंस गई। जिससे वह अब तक नहीं उबर पाई है। क्योंकि जयललिता सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं थी। बल्कि वह AIADMK की केंद्रीय धुरी भी थीं।
नेतृत्व का अभाव
वहीं जयललिता की जनकल्याणकारी योजनाएं, व्यक्तित्व और सख्त प्रशासनिक छवि ने पार्टी को मजबूत जनाधार दिया था। लेकिन जयललिता के निधन के बाद AIADMK पार्टी में कोई ऐसा चेहरा उभरकर सामने नहीं आया, जो पूरे संगठन को एकजुट रख सके। पार्टी में नेतृत्व की कमी होने के कारण पार्टी को गुटबाजी की तरफ धकेल दिया। वहीं ओ. पन्नीरसेल्वम और एडप्पाड़ी के. पलानीस्वामी के बीच चलने वाले शक्ति संघर्ष ने संगठन को कमजोर किया।
इसके अलावा वी.के शशिकला की वापसी की अटकलों ने आंतरिक अस्थिरता को अधिक बढ़ाया। साल 2019 के लोकसभा चुनाव और साल 2021 के विधानसभा चुनाव में AIADMK पार्टी को सत्ता से बाहर रहना पड़ा। इन चुनावों में मिली हार ने यह स्पष्ट कर दिया कि सिर्फ 'अम्मा' की विरासत के सहारे राजनीति करना अब पर्याप्त नहीं है। खासकर युवाओं और शहरी वर्ग, मतदाताओं, विकास, रोजगार और सामाजिक न्याय के नए मुद्दों को प्राथमिकता मिली है।
गठबंधन की राजनीति
भाजपा के साथ गठबंधन कर AIADMK ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास किया है। लेकिन तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीति में बीजेपी के साथ हमेशा समीकरण सही नहीं रहे हैं। पार्टी के अंदर इस गठबंधन को लेकर मतभेद देखने को मिले हैं। वहीं विश्लेषकों की मानें, तो AIADMK पार्टी को अपने स्वतंत्र क्षेत्रीय पहचान को मजबूत करने के साथ संतुलित गठबंधन रणनीति अपनानी होगी।
कैसी रहेगी 2026 की राह
साल 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव AIADMK पार्टी के लिए अस्तित्व की लड़ाई की तरह है। पार्टी के सामने संगठनात्मक ढांचे का पुनर्गठन, एकजुट और स्वीकार्य नेतृत्व का निर्माण और युवा और महिला मतदाताओं के बीच भरोसा पुनर्स्थापित करना आदि जैसी कई बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे में अगर AIADMK इन तीनों मोर्चों पर सफल होती है, तो पार्टी वापसी की राह पकड़ सकती है। अन्यथा, राज्य की राजनीति में पार्टी का प्रभाव और सीमित हो सकता है।
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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई 'आतंकवादी' टिप्पणी ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। भारी हंगामे और भाजपा के कड़े विरोध के बाद, खड़गे ने मंगलवार को अपने बयान पर स्पष्टीकरण जारी किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनके शब्दों का शाब्दिक अर्थ वह नहीं था जो निकाला जा रहा है।
खड़गे का स्पष्टीकरण: "व्यक्तिगत हमला नहीं, संस्थागत दुरुपयोग पर थी टिप्पणी"
कलबुर्गी में पत्रकारों से बात करते हुए खड़गे ने स्पष्ट किया कि उनकी आलोचना प्रधानमंत्री की कार्यशैली और केंद्रीय एजेंसियों के कथित दुरुपयोग को लेकर थी। उनके स्पष्टीकरण के मुख्य बिंदु:
आतंकवाद को बढ़ावा देने का संदर्भ: खड़गे ने कहा, "मैंने पीएम को व्यक्तिगत रूप से आतंकवादी नहीं कहा। मेरा मतलब था कि वह चुनाव के दौरान विपक्ष को डराने और चुप कराने के लिए 'राजनीतिक आतंकवाद' को बढ़ावा दे रहे हैं।"
एजेंसियों का डर: उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीआई (CBI), ईडी (ED) और आयकर विभाग जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को 'आतंकित' करने और चुनाव में उन्हें कमजोर करने के लिए किया जा रहा है।
चेन्नई का भाषण: खड़गे ने स्पष्ट किया कि उन्होंने चेन्नई में दिए अपने भाषण में भी इसी संदर्भ में बात की थी कि छापेमारी के जरिए लोकतंत्र को डराया जा रहा है।
खड़गे ने संवाददाताओं को बताया कि उनकी टिप्पणियों का उद्देश्य सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की गई टैक्स छापेमारी और जांच थी, जिसके बारे में उनका दावा है कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है।
खड़गे ने एएनआई को बताया, "मैंने पीएम को आतंकवादी नहीं कहा। मैंने कहा था कि वह लोगों को डराने के लिए आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। वह छापेमारी के जरिए लोगों को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें चुनाव में हराने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने चेन्नई में यही कहा था।"
बीजेपी ने चुनाव आयोग का रुख किया, कार्रवाई की मांग की
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने खड़गे की टिप्पणी को "बेहद अपमानजनक" और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज की। भाजपा के पत्र में कहा गया है कि देश के प्रधान मंत्री को "आतंकवादी" के रूप में वर्णित करना व्यक्तिगत निंदा, स्वतंत्र चुनावी विकल्प में अनुचित हस्तक्षेप और कानून की विभिन्न धाराओं के तहत प्रथम दृष्टया मानहानि है।
खड़गे की सफाई पर बीजेपी नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की. राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कांग्रेस पर भारत के संविधान को कमजोर करने और नफरत को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जबकि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने राहुल गांधी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से माफी की मांग की।
गोयल ने कहा, "यह अपवित्र गठबंधन प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर प्रभावी ढंग से भारतीयों को आतंकवादी कह रहा है। इस तरह के व्यक्तिगत हमलों से उनका चुनावी भाग्य नहीं पलटेगा।" भाजपा आईटी प्रमुख अमित मालवीय और प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी खड़गे के स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया, आरोप लगाया कि टिप्पणियां जानबूझकर और राजनीति से प्रेरित थीं।
खड़गे ने क्या कहा?
खड़गे ने कहा कि उनकी आलोचना संस्थागत दुरुपयोग के लिए थी, व्यक्तिगत तौर पर प्रधानमंत्री के लिए नहीं। एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ बोलते हुए उन्होंने कहा, "वह लोगों और राजनीतिक दलों को आतंकित कर रहे हैं। मैंने कभी नहीं कहा कि वह शाब्दिक अर्थ में आतंकवादी हैं। वह विपक्षी दलों के खिलाफ अपनी शक्ति और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रहे हैं।"
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