ईरान में इंटरनेट बंदी के 53 दिन, सरकार 'टियर सिस्टम' की कर रही व्यवस्था
नई दिल्ली, 21 अप्रैल (आईएएनएस)। ईरान में इंटरनेट बंदी के 53 दिन हो चुके हैं। संघर्ष से हुई तबाही के बाद पुनर्निर्माण का दौर जारी है। इंटरनेट मॉनिटरिंग संस्था नेट ब्लॉक्स के अनुसार, बाहरी दुनिया ईरान का संपर्क लगभग 1248 घंटों से टूटा पड़ा है।
एक्स पर एक ग्राफिक के जरिए बताया कि सरकार ने इंटरनेट को पूरी तरह खोलने के बजाय कुछ चुनिंदा लोगों और कारोबारियों को ही सीमित पहुंच दी है, जबकि देश की ज्यादातर जनता अब भी ग्लोबल इंटरनेट से अलग-थलग पड़ी है।
नेट ब्लॉक्स के अनुसार, सरकार “टियर सिस्टम” यानी अलग-अलग स्तर पर इंटरनेट एक्सेस देने का इतंजाम कर रही है। इसका मतलब है कि कुछ खास लोगों या संस्थाओं को इंटरनेट एक्सेस मिल सकता है, लेकिन आम लोगों को इससे फिलहाल वंचित रखा जाएगा।
दावा है कि इससे दो नकारात्मक असर जमीन पर दिखने लगे हैं। पहला, आम लोगों की जिंदगी वैसी नहीं रह गई है; उन पर गंभीर असर पड़ा है और दूसरा, कारोबार उस गति से नहीं चल पा रहे हैं जैसा अपेक्षित है, और इस वजह से अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंच रहा है।
संस्था के मुताबिक, इस तरह की डिजिटल सेंसरशिप अगर जारी रही तो परिणाम काफी खराब होंगे। इस कदम से 9 करोड़ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इंटरनेट से कटा रहता है।
28 फरवरी को तेहरान में पहला बम गिरने के कुछ ही घंटों के भीतर, सरकार ने पूरे ईरान में लगभग पूरी तरह से इंटरनेट बंद कर दिया था। इस कदम से इंटरनेट कनेक्टिविटी घटकर संघर्ष से पहले के मुकाबले करीब 2 प्रतिशत तक रह गई।
अल जजीरा मीडिया आउटलेट के अनुसार, एक सीमित इंट्रानेट कुछ स्थानीय सेवाओं और ऐप्स चालू रखने के काम आ रहा है, लेकिन लोग इससे ज्यादा खुश नहीं हैं; इस डिजिटल ब्लैकआउट की वजह से अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर के राजस्व का नुकसान हुआ है।
--आईएएनएस
केआर/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
भारत में हेल्थकेयर में एआई का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल, 85 प्रतिशत के साथ दुनिया में सबसे आगे: रिपोर्ट
मुंबई, 21 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत पर्सनल हेल्थ के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) अपनाने के मामले में दुनिया में सबसे आगे निकल गया है। एक नई रिपोर्ट में मंगलवार को कहा गया कि भारत में 85 प्रतिशत लोग पहले से ही एआई-आधारित टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो विकसित देशों से काफी ज्यादा है।
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, (जिसका शीर्षक है उपभोक्ता एआई-सक्षम स्वास्थ्य सेवा के लिए तैयार हैं। स्वास्थ्य प्रणाली को भी तैयार रहने की आवश्यकता है) भारतीय उपयोगकर्ता जनरेटिव एआई को दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले कहीं तेजी से अपना रहे हैं।
यह रिपोर्ट 15 देशों के 13,000 से ज्यादा लोगों पर किए गए सर्वे पर आधारित है, जिसमें बताया गया कि भारत का एआई अपनाने का स्तर अमेरिका (50 प्रतिशत), ब्रिटेन (43 प्रतिशत) और जापान (34 प्रतिशत) से काफी ज्यादा है।
दुनिया भर में करीब 60 प्रतिशत लोग हेल्थ से जुड़े कामों के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन भारत इस मामले में सबसे आगे है। यह दिखाता है कि देश में डिजिटल हेल्थ टूल्स को लेकर लोगों का भरोसा तेजी से बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, मरीज अब इलाज के तरीके को लेकर नई सोच अपना रहे हैं। ज्यादातर लोग ऐसा मॉडल पसंद करते हैं, जिसमें डॉक्टर और एआई मिलकर काम करें, न कि एआई डॉक्टरों की जगह ले।
यह तरीका खासकर टेस्ट रिपोर्ट समझने और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों (क्रॉनिक कंडीशन) को मैनेज करने में ज्यादा उपयोगी माना जा रहा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि युवा पीढ़ी इस बदलाव को तेजी से आगे बढ़ा रही है। करीब 78 प्रतिशत जेनरेशन जेड और 71 प्रतिशत मिलेनियल्स हेल्थ से जुड़े कामों के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं।
फिलहाल हेल्थकेयर में एआई का इस्तेमाल ज्यादा तर चैटबॉट्स और वियरेबल डिवाइस तक सीमित है, लेकिन लोगों की उम्मीदें तेजी से बढ़ रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, अभी 33 प्रतिशत लोग चैटबॉट्स और 19 प्रतिशत लोग वियरेबल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन अब लोग ऐसे एडवांस एजेंटिक एआई की उम्मीद कर रहे हैं जो खुद से अपॉइंटमेंट बुक कर सके, रेफरल मैनेज कर सके और दवाओं के बीच संभावित इंटरैक्शन की पहचान कर सके।
उपभोक्ता अब ऐसे स्मार्ट एआई सिस्टम चाहते हैं जो अपने आप कई जरूरी काम कर सकें और हेल्थकेयर को ज्यादा आसान और प्रभावी बना सकें।
--आईएएनएस
डीबीपी
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