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Explainer: रिटायरमेंट प्लानिंग में लोग करते हैं ये 7 बड़ी गलतियां, बुढ़ापे में पैसों की कमी से बचने के लिए अभी समझें

Retirement Planning Tips: रिटायरमेंट की तैयारी सिर्फ हर महीने कुछ पैसे बचाकर रखने का नाम नहीं है. यह एक लंबी वित्तीय योजना है, जिसमें आज की कमाई के साथ-साथ भविष्य की जरूरतों को भी ध्यान में रखना पड़ता है. बढ़ती जीवन प्रत्याशा, महंगाई, मेडिकल खर्च और टैक्स के नियमों में बदलाव के कारण रिटायरमेंट के बाद पर्याप्त पैसा होना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है.

कई लोग नौकरी शुरू करने के बाद रिटायरमेंट के लिए निवेश करने की सोचते हैं, लेकिन इसे लगातार टालते रहते हैं. कुछ लोग सिर्फ एक निवेश उत्पाद पर निर्भर रहते हैं, जबकि कुछ बाजार में गिरावट आते ही अपनी SIP या निवेश रोक देते हैं. ऐसी गलतियां लंबे समय में रिटायरमेंट फंड को काफी नुकसान पहुंचा सकती हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक रिटायरमेंट प्लानिंग में किसी एक निवेश उत्पाद की तलाश करने के बजाय कितना निवेश कर रहे हैं, कितने समय तक निवेश करेंगे और पैसा किन-किन एसेट क्लास में लगाया गया है, इन बातों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है.

1. रिटायरमेंट प्लानिंग को टालते रहना

सबसे आम गलती है रिटायरमेंट के लिए निवेश शुरू करने में देरी करना. अक्सर युवा सोचते हैं कि रिटायरमेंट अभी 20-30 साल दूर है, इसलिए बाद में निवेश कर लेंगे. लेकिन यही देरी भविष्य में बड़ा अंतर पैदा कर सकती है.

जल्दी निवेश शुरू करने का सबसे बड़ा फायदा कंपाउंडिंग का मिलता है. निवेश जितने लंबे समय तक बना रहता है, रिटर्न पर मिलने वाला रिटर्न उतना ज्यादा असर दिखा सकता है. इसलिए कम उम्र में छोटी रकम से शुरुआत करना भी देर से बड़ी रकम निवेश करने से बेहतर हो सकता है.

2. सिर्फ निवेश उत्पाद पर ध्यान देना

कई निवेशक यह सोचते हैं कि कौन-सा म्यूचुअल फंड, FD या दूसरी स्कीम सबसे ज्यादा रिटर्न देगी. लेकिन रिटायरमेंट प्लानिंग इससे कहीं बड़ी प्रक्रिया है.

Tata Asset Management के सीनियर फंड मैनेजर सोबन उदासी के मुताबिक रिटायरमेंट के लिए केवल निवेश उत्पाद चुनना पर्याप्त नहीं है. निवेश की रकम, निवेश की अवधि और एसेट एलोकेशन भी बेहद महत्वपूर्ण हैं.

यानी सही सवाल यह नहीं होना चाहिए कि "सबसे अच्छा निवेश कौन-सा है?", बल्कि यह होना चाहिए कि "मेरे लक्ष्य के लिए कितनी रकम, कितने समय और किस तरह के निवेश में होनी चाहिए?"

3. SIP बीच में बंद कर देना

बाजार में गिरावट आते ही कई निवेशक घबरा जाते हैं और अपनी SIP बंद कर देते हैं. यह रिटायरमेंट जैसे लंबे लक्ष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है. बाजार में उतार-चढ़ाव निवेश का हिस्सा है. अगर निवेश का समय लंबा है तो हर गिरावट के दौरान निवेश रोकना जरूरी नहीं है. विशेषज्ञ लगातार और अनुशासित निवेश पर जोर देते हैं.

इसका मतलब यह नहीं कि हर परिस्थिति में एक ही निवेश जारी रखना चाहिए. लेकिन किसी लंबी अवधि के लक्ष्य के लिए केवल बाजार में अस्थायी गिरावट देखकर घबराकर निवेश बंद करना सही रणनीति नहीं मानी जाती.

4. कमाई बढ़ने के साथ निवेश न बढ़ाना

करियर की शुरुआत में अगर कोई व्यक्ति हर महीने 5,000 रुपये निवेश करता है तो जरूरी नहीं कि 10 साल बाद भी उसे इतनी ही रकम निवेश करनी चाहिए. आय बढ़ने के साथ निवेश की रकम भी बढ़ानी चाहिए.

इसे आसान तरीके से ऐसे समझ सकते हैं—

कमाई बढ़े → बचत बढ़े → निवेश बढ़े → रिटायरमेंट फंड तेजी से बढ़े.

समय के साथ निवेश में धीरे-धीरे बढ़ोतरी करने से भविष्य का बड़ा लक्ष्य हासिल करना आसान हो सकता है.

5. पूरा पैसा एक ही जगह लगाना

रिटायरमेंट के लिए पूरा पैसा किसी एक एसेट क्लास में रखना जोखिम बढ़ा सकता है. उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति का पूरा निवेश सिर्फ इक्विटी में है तो बाजार में बड़ी गिरावट उसके पोर्टफोलियो को प्रभावित कर सकती है. वहीं अगर पूरा पैसा केवल फिक्स्ड इनकम में है तो लंबे समय में महंगाई से मुकाबला करना मुश्किल हो सकता है. इसीलिए डायवर्सिफिकेशन यानी अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश महत्वपूर्ण माना जाता है.

6. महंगाई को नजरअंदाज करना

रिटायरमेंट प्लानिंग में सबसे खतरनाक गलतियों में से एक महंगाई को नजरअंदाज करना है.आज अगर किसी व्यक्ति का मासिक खर्च 50,000 रुपये है तो जरूरी नहीं कि 20 साल बाद भी उतने ही पैसों में वही जीवनशैली कायम रहेगी. महंगाई के कारण समय के साथ सामान, घर, शिक्षा, यात्रा और दूसरी सेवाओं की कीमत बढ़ती रहती है. इसलिए रिटायरमेंट का लक्ष्य तय करते समय केवल आज के खर्च को नहीं देखना चाहिए, बल्कि भविष्य के संभावित खर्च को भी ध्यान में रखना चाहिए.

7. टैक्स और हेल्थकेयर खर्च को भूल जाना

कई लोग रिटायरमेंट के लिए एक बड़ा कॉर्पस तय कर लेते हैं और मान लेते हैं कि वही रकम जीवनभर पर्याप्त होगी. लेकिन इसमें टैक्स और मेडिकल खर्च को शामिल नहीं किया जाता.

Otto Money के फाउंडर और CEO अपूर्व गुप्ता के अनुसार रिटायरमेंट प्लानिंग में केवल प्री-टैक्स रिटर्न देखना जोखिम भरा हो सकता है. उनके मुताबिक रिटायरमेंट के दौरान व्यक्ति की वास्तविक आय वह होती है जो टैक्स और महंगाई के असर के बाद बचती है.

उदाहरण के तौर पर अगर किसी निवेश से 7% रिटर्न मिलता है तो टैक्स के बाद वास्तविक रिटर्न कई निवेशकों के लिए 5% से भी कम रह सकता है.

इसलिए रिटायरमेंट प्लानिंग में इन चीजों को जरूर शामिल करना चाहिए—

  • इनकम टैक्स
  • महंगाई
  • मेडिकल और हेल्थकेयर खर्च
  • जीवन प्रत्याशा
  • रोजमर्रा के खर्च
  • इमरजेंसी फंड

सिर्फ 'कितने करोड़ चाहिए' यह तय करना काफी नहीं

रिटायरमेंट प्लानिंग में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि व्यक्ति केवल एक लक्ष्य तय कर लेता है, जैसे रिटायरमेंट तक 1 करोड़ या 2 करोड़ रुपये जमा करने हैं. लेकिन असली सवाल यह है कि रिटायरमेंट के समय उस रकम की वास्तविक कीमत कितनी होगी? अगर महंगाई लगातार बढ़ती है तो आज का 1 करोड़ रुपये भविष्य में उतनी खरीदारी क्षमता नहीं रखेगा. इसलिए रिटायरमेंट कॉर्पस तय करते समय भविष्य के खर्च और महंगाई का अनुमान लगाना जरूरी है.

रिटायरमेंट के करीब आते समय क्या करना चाहिए?

जैसे-जैसे रिटायरमेंट करीब आता है, निवेशक को अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करते रहना चाहिए. रिटायरमेंट से कुछ साल पहले अत्यधिक जोखिम वाले निवेश पर निर्भरता कम करना और जरूरत के मुताबिक एसेट एलोकेशन में बदलाव करना उपयोगी हो सकता है. साथ ही यह भी देखना चाहिए कि रिटायरमेंट के बाद हर महीने कितनी रकम की जरूरत होगी और वह रकम कहां से आएगी.

सही रिटायरमेंट प्लान की बुनियाद क्या है?

एक मजबूत रिटायरमेंट प्लान किसी एक "परफेक्ट" निवेश उत्पाद पर निर्भर नहीं करता. इसकी बुनियाद कुछ आसान लेकिन महत्वपूर्ण आदतों पर होती है—

  • जल्दी शुरुआत करें
  • हर महीने नियमित निवेश करें
  • आय बढ़ने पर निवेश भी बढ़ाएं
  • पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई रखें
  • महंगाई और टैक्स को गणना में शामिल करें
  • हेल्थकेयर खर्च के लिए अलग तैयारी रखें
  • समय-समय पर अपने प्लान की समीक्षा करें

रिटायरमेंट प्लानिंग का मतलब सिर्फ एक बड़ा कॉर्पस तैयार करना नहीं है. असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि रिटायरमेंट के बाद भी आपकी आय, खर्च और जीवनशैली के बीच संतुलन बना रहे. इसके लिए जल्दी शुरुआत, नियमित निवेश, सही एसेट एलोकेशन, महंगाई और टैक्स को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है. बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान अनुशासन बनाए रखना और आय बढ़ने के साथ निवेश बढ़ाना भी अहम है. आखिरकार रिटायरमेंट की आर्थिक सुरक्षा किसी एक शानदार निवेश से नहीं, बल्कि लंबे समय तक सही योजना और अनुशासन के साथ किए गए छोटे-छोटे वित्तीय फैसलों से तैयार होती है.

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