भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी को संतुलित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। केंद्रीय बैंक ने सात दिवसीय परिवर्तनीय दर रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी के माध्यम से वित्तीय प्रणाली से अस्थायी रूप से 2,00,031 करोड़ रुपये वापस ले लिए हैं। केंद्रीय बैंक को इस नीलामी में दो लाख करोड़ रुपये की अधिसूचित राशि के मुकाबले 2,28,098 करोड़ रुपये की अधिक बोलियां मिलीं।
आरबीआई ने 5.24 प्रतिशत की कट-ऑफ दर और 5.23 प्रतिशत की भारित औसत दर पर बोलियों को स्वीकार किया।
परिवर्तनीय रेपो दर नीलामी आरबीआई की बैंकों में अल्पकालिक नकदी संतुलित करने के लिए उपयोग की जाने वाली एक मौद्रिक नीति पहल है।
निश्चित रेपो दर के उलट, वीआरआर में ब्याज दर नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित की जाती है, जिससे बैंकों को धनराशि के लिए बोली लगाने की अनुमति मिलती है।
वर्तमान में बैंकिंग प्रणाली में लगभग 4.09 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी मौजूद है।
इससे पहले, 10 अप्रैल को भी आरबीआई ने इसी अवधि की वीआरआरआर नीलामी के जरिए 2,00,041 करोड़ रुपये की नकदी वित्तीय प्रणाली से निकाली थी, जो अब प्रणाली में वापस आ गई है।
आम तौर पर हर महीने की 20 तारीख के आसपास जीएसटी भुगतान होने के कारण वित्तीय प्रणाली से नकदी निकल जाती है। इससे बाजार में नकदी की उपलब्धता पर दबाव पड़ता है और मुद्रा बाजार की दरें बढ़ सकती हैं।
जीएसटी भुगतान के बाद नकदी में आई कमी को पूरा करने के लिए वीआरआरआर के तहत ली गई राशि प्रणाली में वापस आएगी, जिससे अल्पकालिक ब्याज दरें नियंत्रण में रहेंगी।
अप्रैल की शुरुआत में द्विमासिक मौद्रिक समीक्षा बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा था कि केंद्रीय बैंक नकदी प्रबंधन में सक्रिय और पूर्व-तैयारी वाला रुख अपनाए रखेगा तथा अर्थव्यवस्था की उत्पादक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करेगा।
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इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के ताज़ा 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' अनुमानों के मुताबिक, नॉमिनल जीडीपी के मामले में भारत अब दुनिया की टॉप पाँच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल नहीं है। हालाँकि, यह बदलाव किसी ढाँचागत कमज़ोरी के बजाय करेंसी में आए बदलावों को दिखाता है; अनुमानों के मुताबिक, भारत आने वाले सालों में अपनी खोई हुई जगह फिर से हासिल कर सकता है। आईएमएफ के अप्रैल 2026 के 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' के आधार पर, नॉमिनल GDP के मामले में भारत अब दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ताज़ा अनुमानों के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका का आंकड़ा $30 ट्रिलियन से अधिक है, जिसके बाद चीन लगभग $19–20 ट्रिलियन के साथ दूसरे स्थान पर है। जर्मनी का अनुमान लगभग $5 ट्रिलियन है, जबकि जापान और यूनाइटेड किंगडम दोनों ही $4–4.5 ट्रिलियन की सीमा में हैं। भारत, जो $4 ट्रिलियन से थोड़ा ही ऊपर है, अब इस समूह से ठीक नीचे स्थित है।
भारत GDP रैंकिंग में पीछे क्यों खिसका?
ग्लोबल GDP रैंकिंग की गणना US डॉलर में की जाती है, इसलिए एक्सचेंज रेट एक अहम फैक्टर बन जाता है। जब रुपया कमज़ोर होता है, तो भारत के आर्थिक उत्पादन की डॉलर वैल्यू कम हो जाती है, भले ही घरेलू उत्पादन में कोई बदलाव न आया हो। पिछले एक साल में डॉलर के मुकाबले रुपया तेज़ी से गिरा है। 80 के दशक के मध्य से गिरकर यह 90 से ज़्यादा के स्तर पर पहुँच गया है। इससे अर्थव्यवस्था का डॉलर-आधारित आकार छोटा हो गया है और रैंकिंग में बदलाव में इसका भी योगदान रहा है। इसका असर इसलिए भी ज़्यादा बढ़ जाता है, क्योंकि कई अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे के बहुत करीब हैं। भारत, जापान और यूनाइटेड किंगडम—ये सभी $4–5 ट्रिलियन के दायरे में आते हैं; ऐसे में करेंसी में होने वाले छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव भी इनकी रैंकिंग बदल सकते हैं।
करेंसी के दबाव ने भी डाला असर
रुपये पर हालिया दबाव, पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के साथ ही शुरू हुआ है। इस संघर्ष ने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है और डॉलर की मांग में भी इज़ाफ़ा किया है। भारत के लिए, जो अपने कच्चे तेल का लगभग 90% हिस्सा आयात करता है, कीमतों में यह बढ़ोतरी आयात बिल को बढ़ा देती है और डॉलर के बाहर जाने (outflows) में वृद्धि करती है, जिससे देश की मुद्रा पर सीधा दबाव पड़ता है। इन भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक बाजारों में 'जोखिम से बचने' (risk aversion) की भावना भी बढ़ी है, जिससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (flows) में अस्थिरता आ गई है। भारतीय इक्विटी और बॉन्ड से निवेश के बाहर जाने (outflows) के दौर ने डॉलर की मांग को और बढ़ा दिया है, जिससे रुपया और भी कमज़ोर हुआ है। इसके साथ ही, अमेरिकी डॉलर की बढ़ती मज़बूती—जिसे ऊंची ब्याज दरों और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौरान 'सुरक्षित निवेश' (safe-haven) की मांग से सहारा मिला है—ने रुपये सहित अधिकांश उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव डाला है। इन अल्पकालिक कारणों से परे, कुछ गहरे दबाव भी मौजूद हैं।
रैंकिंग का गणित हर बार एक जैसा नहीं रहता
आईएमएफ ने भारत के लिए 2026 में 6.5 प्रतिशत ग्रोथ फोरकास्ट दिया है, जो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज है। भारत की GDP रैंकिंग का 4th से 6th तक खिसकना सुनने में झटका देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अर्थव्यवस्था पीछे जा रही है। असली संदेश यह है कि नॉमिनल डॉलर वैल्यू और रियल इकोनॉमिक ग्रेाथ एक चीज नहीं हैं। भारत अगर स्थिर मुद्रा, हाई रियल ग्रोथ, बेहतर प्रोडक्टिविटी और निवेश की रफ्तार बनाए रखता है, तो रैंकिंग बदलते देर नहीं लगेगी। आईएमएफ का वर्ल्ड इकोनॉनिक आउटलुक नियमित रूप से इन डेटासेट के साथ पडेट होता है। इन डेटा में बदलाव के हिसाब से नॉमिनल GDP की नई तस्वीर दिखाता है।
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