बता दें कि कर्जदाताओं की समिति ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के सामने कहा कि संभव है कि जानकारी लीक होने के कारण वेदांता लिमिटेड ने अपनी बोली में बदलाव किया। समिति की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वेदांता शुरुआती मापदंडों में पीछे थी, लेकिन बाद में उसने अचानक अपनी बोली में सुधार किया, जिससे संदेह पैदा हुआ है।
गौरतलब है कि यह सुनवाई न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ में हो रही है, जहां वेदांता ने अदानी इंटरप्राइजेज को सर्वोच्च बोलीदाता घोषित किए जाने को चुनौती दी है। समिति का कहना है कि बोली की अंतिम समय सीमा के बाद वेदांता ने संशोधित प्रस्ताव दिया, जिसे नियमों के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता था।
मौजूद जानकारी के अनुसार, समिति के एक प्रमुख सदस्य ने भी कहा कि अगर इस संशोधित प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है तो पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ेगी, जिससे समाधान में देरी होगी। वहीं समिति के वकीलों का कहना है कि बोली प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही वेदांता ने नया प्रस्ताव पेश किया, जब उसे लगा कि वह सफल नहीं हो पाएगी।
हालांकि, वेदांता की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया है। कंपनी के वकील ने कहा कि उन्होंने सभी दस्तावेज अदालत में पेश किए हैं और किसी भी तरह की जानकारी छुपाई नहीं गई है। साथ ही, वेदांता ने यह भी आरोप लगाया है कि बोली प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और उसके प्रस्ताव को नजरअंदाज किया गया।
गौरतलब है कि इस मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल को तय की गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जानकारी लीक होने की बात साबित होती है तो यह वेदांता के पक्ष को मजबूत कर सकती है, क्योंकि इससे समान अवसर न मिलने का मुद्दा उठ सकता है।
बता दें कि जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड वर्ष 2024 में दिवालिया प्रक्रिया में शामिल हुई थी और उस पर करीब 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। इस कंपनी की संपत्तियों में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में लगभग 4000 एकड़ जमीन, होटल, व्यावसायिक संपत्तियां, सीमेंट संयंत्र और फॉर्मूला रेसिंग ट्रैक शामिल हैं।
मौजूद जानकारी के अनुसार, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल की इलाहाबाद पीठ ने 17 मार्च को अडानी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दी थी। इसके बाद वेदांता ने इस फैसले को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल को इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, लेकिन यह निर्देश दिया कि आगे की किसी भी बड़ी कार्रवाई से पहले अपीलीय न्यायाधिकरण की अनुमति ली जाए।
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