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शहर की भागदौड़ में भूल गए देसी स्वाद? एक बार जरूर चखें गांव वाली थाली का असली जायका, देखें कैसे होता है तैयार

Indian thali taste: साधारण देसी थाली सेहत के लिए बेहद लाभकारी होती है. ताज़ी रोटी शरीर को ऊर्जा देने के साथ पाचन को बेहतर बनाती है. देसी घी और मक्खन में मौजूद अच्छे फैट शरीर को ताकत देते हैं और हड्डियों को मजबूत करते हैं, साथ में दी गई मसालेदार नमक भूख बढ़ाने और पाचन तंत्र को सक्रिय रखने में मदद करती है. कच्चा प्याज शरीर को ठंडक देने के साथ इम्युनिटी बढ़ाता है और कई संक्रमणों से बचाव करता है.

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डिलीवरी के बाद 6 हफ्ते क्यों हैं मां-बच्चे के लिए सबसे अहम? आयुर्वेद से जानिए

नई दिल्ली, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। डिलीवरी के बाद के शुरुआती 6 हफ्ते, यानी लगभग डेढ़ महीना, मां और बच्चे दोनों के लिए बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण समय होता है। आयुर्वेद में इस अवधि को सूतिका काल कहा गया है और इसे शरीर व मन के पुनर्निर्माण का समय माना गया है। इस दौरान सही देखभाल न हो तो मां को कमजोरी, संक्रमण या लंबे समय तक चलने वाली समस्याएं हो सकती हैं, वहीं नवजात शिशु का विकास भी प्रभावित हो सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार, प्रसव के बाद महिला का शरीर काफी कमजोर हो जाता है क्योंकि इस समय शरीर से काफी ऊर्जा और रक्त की हानि होती है। शरीर में वात दोष बढ़ जाता है, जिससे दर्द, थकान, बेचैनी और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए इन 6 हफ्तों में शरीर को धीरे-धीरे संतुलन में लाना बहुत जरूरी होता है।

इस दौरान आराम और उचित देखभाल बहुत जरूरी होता है। मां को पर्याप्त आराम देना चाहिए ताकि शरीर अपनी प्राकृतिक स्थिति में लौट सके। इस दौरान हल्की मालिश (तेल से) की जाती है, जिससे शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है, दर्द कम होता है और गर्भाशय जल्दी सामान्य आकार में आता है।

आयुर्वेद में यह भी बताया गया है कि इस समय हल्का, गर्म और पौष्टिक भोजन लेना चाहिए, जैसे मूंग दाल का पानी, दलिया, गर्म सूप और घी से युक्त हल्का आहार। इससे शरीर की ताकत वापस आती है और दूध बनने की प्रक्रिया भी बेहतर होती है। ठंडा, भारी और गैस बनाने वाला खाना इस दौरान नहीं लेना चाहिए क्योंकि यह पाचन को बिगाड़ सकता है।

इस अवधि में स्तनपान को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। बच्चे को जन्म के एक घंटे के भीतर दूध पिलाना शुरू करना चाहिए। शुरुआती दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है, बच्चे के लिए बेहद पौष्टिक और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने वाला होता है। यह बच्चे की इम्युनिटी को मजबूत करता है और मां-बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध भी बनाता है।

आयुर्वेद यह भी कहता है कि मां को मानसिक रूप से भी शांत और खुश रहना चाहिए। तनाव, चिंता और गुस्सा इस समय शरीर पर बुरा असर डालते हैं और दूध की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए परिवार का सहयोग और भावनात्मक सहारा बहुत जरूरी होता है।

इसके साथ ही सफाई का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है। शरीर की स्वच्छता, सही देखभाल और हल्की दवाओं या हर्बल उपायों से संक्रमण से बचाव किया जाता है। आयुर्वेद में नीम, हल्दी जैसे प्राकृतिक तत्वों का उपयोग भी सुझाया गया है।

--आईएएनएस

पीआईएम/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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