Firing on Indian Tankers: होर्मुज स्ट्रेट में भारतीय टैंकरों पर फायरिंग, ईरानी राजदूत तलब
Firing on Indian Tankers: पश्चिम एशिया के संवेदनशील समुद्री मार्ग Strait of Hormuz में भारतीय तेल टैंकरों को कथित तौर पर इंटरसेप्ट किए जाने और फायरिंग/वॉर्निंग शॉट्स की घटना सामने आई है. शुरुआती इनपुट के मुताबिक Jag Arnab और वीएलसीसी Sanmar Herald इराकी कच्चा तेल लेकर गुजर रहे थे, तभी उन्हें चेतावनी दी गई और बाद में जहाजों को यू-टर्न लेने पर मजबूर होना पड़ा.
ईरान की Islamic Revolutionary Guard Corps Navy से जुड़े स्रोतों के हवाले से कहा जा रहा है कि जहाजों को स्ट्रेट से पश्चिम की ओर मुड़ने के लिए कहा गया. हालांकि कार्रवाई के पीछे की वजह पर आधिकारिक, विस्तृत स्पष्टीकरण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है.
चैनल पर की गई थी चेतावनी प्रसारित
समुद्री सुरक्षा निगरानी एजेंसी UK Maritime Trade Operations के इनपुट के अनुसार, VHF चैनल 16 पर चेतावनी प्रसारित की गई थी, जिसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हुई और फायरिंग की सूचना सामने आई. “वेरिफाइड मैरीटाइम ऑडियो” का भी हवाला दिया जा रहा है, लेकिन स्वतंत्र, बहु-स्रोत पुष्टि अभी सीमित है.
भारतीय जहाजों की सुरक्षा पर उठाए गंभीर सवाल
घटना पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. Ministry of External Affairs ने ईरानी राजदूत Dr. Mohammad Fathali को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और भारतीय जहाजों की सुरक्षा पर गंभीर चिंता जताई. रणनीतिक रूप से अहम इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा का असर वैश्विक तेल आपूर्ति और शिपिंग लागत पर पड़ सकता है. फिलहाल घटना के कारणों और नुकसान के आकलन को लेकर आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है, जबकि क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है.
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उल्कापिंड गड्ढा नहीं, लाखों साल पुरानी भूवैज्ञानिक गुंबद, नासा ने कैद की 'सहारा की आंख' की तस्वीर
नई दिल्ली, 18 अप्रैल (आईएएनएस)। सहारा रेगिस्तान के बीच स्थित एक रहस्यमयी गोलाकार संरचना ने दशकों से वैज्ञानिकों को हैरान कर रखा है। हाल ही में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा की अर्थ ऑब्जर्वेटरी ने उन्नत सैटेलाइट तकनीक से इस अनोखी भूवैज्ञानिक बनावट को स्पष्ट रूप से कैद किया है।
इसे रिचैट स्ट्रक्चर या सहारा की आंख के नाम से जाना जाता है। यह उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका के मॉरिटानिया देश में स्थित है। यह संरचना लगभग 40 किलोमीटर व्यास वाली है और ऊपर से देखने पर एक विशाल बैल की आंख या बटनहोल जैसी दिखाई देती है। पहले इसे गलती से किसी उल्कापिंड के टकराने से बने गड्ढे समझा जाता था, लेकिन बाद के शोधों ने साबित कर दिया कि यह एक प्राकृतिक भूवैज्ञानिक प्रक्रिया का नतीजा है।
हाल ही में नासा के लैंडसैट 8 और 9 उपग्रहों ने मार्च 2026 में ली गई तस्वीरों में इस संरचना को और स्पष्ट रूप से दिखाया है। आसपास रंग-बिरंगे रेत के टीले, गहरी घाटियां और सूखी नदी धाराएं भी दिखाई देती हैं। यह संरचना पृथ्वी की सतह को आकार देने वाली भूवैज्ञानिक शक्तियों—जैसे उठाव, कटाव और आग्नेय गतिविधि—का शानदार उदाहरण है। नासा की यह तस्वीर न केवल वैज्ञानिकों के लिए उपयोगी है, बल्कि आम लोगों को भी पृथ्वी के अद्भुत इतिहास से जोड़ती है।
वैज्ञानिक बताते हैं कि रिचैट संरचना एक उठे हुए जियोलॉजिकल डोम के रूप में बनी है। लाखों साल पहले जमीन के नीचे से आग्नेय पदार्थ ऊपर की ओर आया, जिससे चट्टानी परतें ऊपर की ओर उठ गईं। समय के साथ हवा, पानी और कटाव की प्रक्रिया ने इन परतों को अलग-अलग दर से घिसा। इससे केंद्र से बाहर की ओर फैली संकेंद्रित लकीरें बन गईं, जिन्हें ‘क्यूस्टा’ कहा जाता है। नारंगी, भूरा और अन्य रंग विभिन्न प्रकार की तलछटी व आग्नेय चट्टानों को दर्शाते हैं। केंद्र में पुरानी चट्टानें हैं, जबकि बाहरी छोर पर नई परतें दिखाई देती हैं। पूरी प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे। आज यह संरचना सहारा के विशाल रेगिस्तान में एक अनोखा नजारा पेश करती है।
रिचैट संरचना उत्तरी मॉरिटानिया के अद्रार पठार पर स्थित है। यह इलाका पुरापाषाण काल के पत्थर के औजारों, नवपाषाण काल की गुफा चित्रकारी और प्राचीन कारवां मार्गों के अवशेषों से भरा पड़ा है। जमीन से देखने पर यह संरचना ज्यादा स्पष्ट नहीं होती, लेकिन अंतरिक्ष से यह साफ दिखाई देती है।
1930 के दशक में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं ने इसे पहली बार रिचैट बटनहोल नाम दिया। नासा के एस्ट्रोनॉट्स एड व्हाइट और जेम्स मैकडिविट ने 1965 के जेमिनी IV मिशन के दौरान इसकी तस्वीरें खींचीं, जिसके बाद इसे सहारा की आंख के नाम से दुनिया भर में पहचाना जाने लगा।
--आईएएनएस
एमटी/डीकेपी
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