अक्षय तृतीया को आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। भारतवर्ष में अक्षय तृतीया सनातन धर्म का एक अत्यंत पवित्र, शुभ और पुण्यदायी पर्व है और इस दिन को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है तो आइए हम आपको अक्षय तृतीया का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें अक्षय तृतीया के बारे में
सनातन परंपरा में अक्षय तृतीया उन पर्वों में से एक है जो जीवन-दर्शन का जीवंत संदेश देती हैं। अक्षय तृतीया को आखा तीज या अक्ती तीज के नाम से जाना जाता है। इस पर्व में अक्षय शब्द का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, अर्थात् जो सदा बना रहे, जो अनंत हो। इसलिए इस दिन किया गया जप, तप, दान, सेवा, हवन या कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल प्रदान करने वाला माना गया है। अक्षय तृतीया को हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और मंगलकारी पर्व माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन किया गया दान, जप, तप और खरीदारी कभी व्यर्थ नहीं जाती बल्कि उसका फल कई गुना बढ़कर मिलता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस दिन किए गए शुभ कार्यों का फल कभी समाप्त नहीं होता। यही कारण है कि इसे चिरंजीवी और सर्वसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया खासतौर पर सोना खरीदने की परंपरा इसलिए प्रचलित है क्योंकि सोना धन-समृद्धि और स्थायी संपत्ति का प्रतीक माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन खरीदा गया सोना परिवार में सुख-समृद्धि और आर्थिक मजबूती लेकर आता है।
अक्षय तृतीया का पौराणिक महत्व भी है खास
पौराणिक कथाओं के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन कई दिव्य घटनाओं से जुड़ा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने परशुराम अवतार लिया था, इसलिए इसे परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। त्रेतायुग का आरंभ भी इसी तिथि से माना जाता है, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। इस दिन चारधाम में से एक धाम श्रीबदरीनाथ के कपाट भी खुलते हैं। अक्षय शब्द का अर्थ होता है- जो कभी समाप्त न हो। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए दान, जप, तप और पुण्य कर्मों का फल कभी खत्म नहीं होता, बल्कि लगातार बढ़ता रहता है। इस दिन स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व होता है। खासकर जल, सत्तू, वस्त्र और अन्न का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। पितरों के लिए किए गए कर्म भी इस दिन अक्षय फल प्रदान करते हैं।
अक्षय तृतीया पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार अक्षय तृतीया का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन पुण्य के कार्य करें। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर समुद्र, गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि नदी में स्नान करना संभव न हो तो घर में ही स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की शांत मन से पूजा करनी चाहिए। इस दिन लक्ष्मी-नारायण की पूजा सफेद या पीले कमल अथवा गुलाब के पुष्पों से करना शुभ माना गया है। नैवेद्य में गेहूं, जौ, चने का सत्तू, मिश्री, नीम की कोपल, ककड़ी और भीगी हुई चने की दाल अर्पित की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सत्तू का सेवन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह शरीर को शीतलता प्रदान करता है और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है।
जानें अक्षय तृतीया का शुभ मुहूर्त
पंडितों के अनुसार तृतीया तिथि 19 अप्रैल को सुबह 10:49 बजे से शुरू होकर 20 अप्रैल सुबह 07:27 बजे तक रहेगी। चूंकि 20 अप्रैल को सूर्योदय के समय तृतीया तिथि विद्यमान है, इसलिए इसी दिन व्रत, दान और पूजा करना अधिक शुभ रहेगा।
पूजा और खरीदारी के शुभ समय का भी रखें ध्यान
अक्षय तृतीया पर खरीददारी के लिए ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:10 से 04:54 तक एवं पूजा मुहूर्त सुबह 05:25 से 07:27 तक है। सोना खरीदने के लिए सूर्योदय से 07:27 बजे तक का समय विशेष शुभ है, हालांकि अक्षय तृतीया का पूरा दिन मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल रहेगा।
अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य का है विशेष महत्व
अक्षय तृतीया के दिन गंगा स्नान, जप, तप, हवन और दान का विशेष महत्व है। बिहार में सत्तू, गुड़, मिट्टी का घड़ा, पंखा और फल दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल देता है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन किया गया दान जातक के संचित पापों का क्षय करता है।
अक्षय तृतीयायां दानं, पुण्यं च न क्षीयते।
अर्थात् अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान और अर्जित किया गया पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। सनातन परंपरा में ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान करने से धन का ह्रास नहीं होता बल्कि दान से धन-संपदा में वृद्धि होती है।
अक्षय तृतीया पर अन्न का दान का विशेष महत्व है। अन्नदानम् परं दानम् अर्थात् अन्न को धार्मिक ग्रंथों में परब्रह्म कहा गया है। अक्षय तृतीया पर किसी भूखे को भोजन कराना साक्षात नारायण की सेवा के समान है। ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होने के कारण इस दिन सत्तू, गुड़ और शीतल जल के दान का विशेष महत्व है। इस दिन जल दान का भी है खास महत्व । प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ी मानवता है। इस दिन मिट्टी के घड़े (कुंभ) में जल भरकर दान करने से पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है।
दान में अन्य सामग्रियों का भी है खास महत्व
पंडितों के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन निर्धनों को तन ढकने के लिए वस्त्र दान दें। ब्राह्मणों को गौदान करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इस तपती धूप में राहगीरों को जूते या चप्पल दान करना अत्यंत पुण्यकारी होता है।सअक्षय तृतीया पर दान केवल वस्तु का त्याग नहीं है, बल्कि अहंकार का विसर्जन है। यह आत्मा को निर्मल करता है और कर्मों की श्रृंखला में ऐसे बीज बोता है, जिनका फल जन्म-जन्मांतर तक अक्षय रहता है।
अक्षय तृतीया का पौराणिक उद्भव भी है रोचक
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि कालचक्र के परिवर्तन की साक्षी है। पौराणिक कथाओं और इतिहास के अनुसार इस दिन ये घटनाएं हुईं हैं।
युगादि तिथि: हिंदू समय गणना के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन ही सतयुग का समापन हुआ था और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था।
परशुराम जयंती: भगवान विष्णु के छठे अवतार, शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता भगवान परशुराम का प्राकट्य इसी तिथि को हुआ था।
गंगा अवतरण: भगीरथ की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा इसी दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, जिससे समस्त जीवों का उद्धार संभव हुआ।
अक्षय पात्र की प्राप्ति: महाभारत काल में पांडवों के वनवास के दौरान, सूर्यदेव ने उन्हें अक्षय पात्र प्रदान किया था, जिससे उन्हें कभी अन्न की कमी नहीं हुई।
सुदामा और कृष्ण का मिलन: द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र सुदामा की दरिद्रता का नाश इसी तिथि को किया था।
अक्षय तृतीया पर करें ये उपाय, होंगे लाभान्वित
पंडितों के अनुसार इस पावन दिवस पर ये धार्मिक कार्य विशेष रूप से किए जाते हैं, इन कार्यों को करने से भक्तों को बहुत लाभ होता है।
इस दिन श्री लक्ष्मीनारायण की विधिपूर्वक पूजा करें।
धन के देवता कुबेर की पूजा करें।
गंगा या अन्य पवित्र तीर्थों में स्नान करें।
हवन एवं वेद-स्वाध्याय करें।
स्वर्ण, आभूषण या सिक्कों का क्रय करें।
विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य करें।
ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को दान करें।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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भगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान परशुराम का जन्म वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रदोषकाल के समय हुआ था। पौरागिक ग्रंथों में बताया गया है कि पिता जमदग्नि और माता रेणुका ने तो अपने पांचवें पुत्र का नाम 'राम' ही रखा था, लेकिन तपस्या के बल पर भगवान शिव को प्रसन्न करके उनके दिव्य अस्त्र 'परशु' प्राप्त करने के कारण वे राम से परशुराम हो गए। भगवान परशुराम भगवान विष्णु के अवतार होने के साथ ही ब्राह्मण जाति के कुल गुरु भी हैं इसलिए इनकी जयंती देशभर में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है।
भगवान परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे, पिता की आज्ञा से इन्होंने अपनी माता का सिर काट डाला था, लेकिन पुनः पिता के आशीर्वाद से इनकी माता की स्थिति यथावत हो गई। दरअसल कथाओं के अनुसार हुआ यह था कि एक बार माता रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गईं, संयोग से वहीं पर राजा चित्ररथ भी स्नान करने आया था, राजा चित्ररथ सुंदर और आकर्षक था। राजा को देखकर रेणुका भी आसक्त हो गईं, किंतु ऋषि जमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया। उन्होंने आवेशित होकर अपने पांचों पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया। किंतु परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों ने मां के स्नेह के बंधकर वध करने से इंकार कर दिया, लेकिन परशुराम ने पिता के आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर अलग कर दिया।
क्रोधित ऋषि जमदग्नि ने आज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने का शाप दे दिया, वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ वर मांगा। जिसमें उन्होंने तीन वरदान मांगे– पहला, अपनी माता को फिर से जीवन देने और माता को मृत्यु की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा। दूसरा, अपने चारों चेतनाशून्य भाइयों की चेतना फिर से लौटाने का वरदान मांगा। तीसरा वरदान स्वयं के लिए मांगा जिसके अनुसार उनकी किसी भी शत्रु से या युद्ध में पराजय न हो और उनको लंबी आयु प्राप्त हो।
श्रीजमदग्नि जी के आश्रम में एक कामधेनु गौ थी, जिसकी अलौकिक ऐश्वर्य शक्ति को देखकर कार्तवीर्यार्जुन उसे प्राप्त करने के लिए दुराग्रह करने लगा था। अंत में उसने गौ को हासिल करने के लिए बल का प्रयोग किया और उसे माहिष्मती ले आया। किंतु जब परशुराम जी को यह बात विदित हुई तो उन्होंने कार्तवीर्यार्जुन तथा उसकी सारी सेना का विनाश कर डाला। जिस पर पिता ने परशुराम जी के इस चक्रवर्ती सम्राट के वध को ब्रह्म हत्या के समान बताते हुए उन्हें तीर्थ सेवन की आज्ञा दी। वे तीर्थ यात्रा पर चले गये, वापस आने पर माता−पिता ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
दूसरी ओर सहस्त्रार्जुन के वध से उसके पुत्रों के मन में प्रतिशोध की आग जल रही थी। एक दिन अवसर पाकर उन्होंने छद्म वेष में आश्रम आकर जमदग्नि का सिर काट डाला और उसे लेकर भाग निकले। जब परशुराम जी को यह समाचार ज्ञात हुआ तो वे अत्यन्त क्रोधावेश में आग बबूला हो उठे और पृथ्वी को क्षत्रिय हीन कर देने की प्रतिज्ञा कर ली तथा 21 बार घूम−घूमकर पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया। फिर पिता के सिर को धड़ से जोड़कर कुरुक्षेत्र में अन्त्येष्टि संस्कार किया। पितृगणों ने इन्हें आशीर्वाद दिया और उन्हीं की आज्ञा से इन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी प्रजापति कश्यपजी को दान में दे दी और महेन्द्राचल पर तपस्या करने चले गये।
सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव−धनुष भंग किये जाने पर वह महेन्द्राचल से शीघ्रतापूर्वक जनकपुर पहुंचे, किंतु इनका तेज श्रीराम में प्रविष्ट हो गया और ये अपना वैष्णव धनु उन्हें देकर पुनः तपस्या के लिए महेन्द्राचल वापस लौट गये। मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम के क्रोध का सामना गणेश जी को भी करना पड़ा था। दरअसल उन्होंने परशुराम जी को शिव दर्शन से रोक दिया था। क्रोधित परशुराम जी ने उन पर परशु से प्रहार किया तो उनका एक दांत नष्ट हो गया। इसी के बाद से गणेश जी एकदंत कहलाये।
भगवान परशुराम चिरजीवी हैं। ये अपने साधकों−उपासकों तथा अधिकारी महापुरुषों को दर्शन देते हैं। इनकी साधना−उपासना से भक्तों का कल्याण होता है। पौराणिक मान्यता है कि वे आज भी मन्दराचल पर्वत पर तपस्यारत हैं। ऋषि संतान परशुराम ने अपनी प्रभुता व श्रेष्ठवीरता की आर्य संस्कृति पर अमिट छाप छोड़ी। शैव दर्शन में उनका अद्भुत उल्लेख है जो सभी शैव सम्प्रदाय के साधकों में स्तुत्य व परम स्मरणीय है। देश में अनेक स्थानों पर भगवान जमदग्नि जी के तपस्या स्थल एवं आश्रम हैं, माता रेणुका जी के अनेक क्षत्र हैं, प्रायः रेणुका माता के मंदिर में अथवा स्वतंत्र रूप से परशुराम जी के अनेक मंदिर भारत भर में हैं, जहां उनकी शांत, मनोरम तथा उग्र रूप मूर्ति के दर्शन होते हैं।
परशुराम दरअसल 'राम' के रूप में सत्य के संस्करण हैं, इसलिए नैतिक-युक्ति का अवतरण हैं। भगवान परशुराम को उनके हठी स्वभाव, क्रोध और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने अपने जीवन के लिए अपने ही नियम बना रखे थे। परशुराम जयंती के शुभ दिन उनके चरित्र का स्मरण और अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। भगवान शिव, परशुराम जी के गुरु हैं। वह तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरुष हैं। न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे। उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता एवं रक्षा की है।
शुभा दुबे
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