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Prabhasakshi NewsRoom: 12 साल में पहली बार मोदी के विधेयक की संसद में हार, अब आगे क्या करेगी सरकार?

लोकसभा में शुक्रवार को घटा घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज किया जाएगा। मोदी सरकार द्वारा लाया गया संविधान संशोधन विधेयक, जो परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों को जोड़ता था, अंततः लोक सभा में गिर गया। यह सिर्फ एक सामान्य विधायी हार नहीं, बल्कि एक मील का पत्थर इसलिए भी है क्योंकि वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के किसी विधेयक को पहली बार संसद में वोटिंग के दौरान पराजय का सामना करना पड़ा है। इससे पहले भूमि अधिग्रहण कानून और कृषि कानूनों जैसे मुद्दों पर सरकार को चुनौतियां जरूर मिली थीं, लेकिन वह परिस्थितियां अलग थीं और इस तरह सीधे सदन में वोट के जरिए पराजय नहीं हुई थी।

हम आपको बता दें कि वोटिंग से पहले ही माहौल गरम हो चुका था। सत्ता पक्ष और विपक्ष के कुछ नेताओं के बीच पर्दे के पीछे गहन बातचीत चल रही थी। शीर्ष नेताओं की लगातार बैठकें हो रही थीं और सदन के भीतर जोरदार विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिला। विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भाषण को लेकर सत्ता पक्ष की तीखी प्रतिक्रिया ने माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया। हालांकि शाम को जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बोलने के लिए खड़े हुए, तब तक यह लगभग स्पष्ट हो चुका था कि विधेयक का क्या हश्र होने वाला है, लेकिन सरकार इसे वोटिंग तक ले जाने के लिए दृढ़ नजर आई।

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संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 की यह हार मोदी सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक असहजता के रूप में देखी जा रही है। साथ ही यह घटना न केवल एकजुट विपक्ष की ताकत का संकेत देती है, बल्कि संविधान जैसे गंभीर विषयों पर व्यापक और गंभीर संवाद की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। इस पराजय ने यह भी स्पष्ट किया कि संसद में केवल संख्याबल ही नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

हम आपको बता दें कि विधेयक की प्रस्तुति और उसकी संरचना ने भी कई सवाल खड़े किए। सबसे अधिक विवाद इस बात को लेकर हुआ कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे दो अलग विषयों को एक साथ क्यों जोड़ा गया। विपक्ष ने इसे एक रणनीतिक चाल बताया, जिसका उद्देश्य एक मुद्दे की आड़ में दूसरे को आगे बढ़ाना था। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव समेत कई नेताओं ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कदम पारदर्शिता के विपरीत है।

वहीं सरकार के भीतर भी इस विधेयक को लेकर अलग अलग आकलन सामने आए। हालांकि सत्तारुढ़ गठबंधन के सभी घटक इस मुद्दे पर एकजुट रहे। भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह विधेयक इसलिए लाये क्योंकि इससे महिला मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ और मजबूत हो सकती थी। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के बीच भाजपा के समर्थन में वृद्धि देखी गई है और यह विधेयक उस समर्थन को और मजबूत करने का एक प्रयास माना गया। हालांकि विधेयक पारित नहीं हो सका, लेकिन इसने यह जरूर स्पष्ट कर दिया कि कौन दल महिला आरक्षण के पक्ष में हैं और कौन नहीं।

इस घटनाक्रम को समझने के लिए इतिहास के कुछ उदाहरण भी महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करते हैं। देखा जाये तो भारत की संसदीय परंपरा में ऐसे अवसर कम ही आए हैं जब केंद्र सरकार को अपने विधेयकों को पारित कराने में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ा हो। वर्ष 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून इसका एक प्रमुख उदाहरण है। यह विधेयक राज्य सभा में पारित नहीं हो सका था, लेकिन बाद में संयुक्त सत्र बुलाकर इसे कानून का रूप दिया गया। इसी प्रकार राजीव गांधी के नेतृत्व में लाया गया चौंसठवां संविधान संशोधन, जिसका उद्देश्य पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देना था, राज्य सभा में असफल रहा था। बाद में यही पहल 1992 में नरसिंह राव सरकार के दौरान तिहत्तरवें संशोधन के रूप में सफलतापूर्वक लागू हुई। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया अक्सर जटिल और बहुस्तरीय होती है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिला आरक्षण कानून की स्थिति भी इसी तरह की जटिलताओं से घिरी हुई है। वर्ष 2023 में पारित कानून के तहत लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसे लागू करने के लिए जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया को अनिवार्य शर्त बनाया गया। केंद्र सरकार ने हाल ही में एक नया संशोधन लाकर इस व्यवस्था में बदलाव करने का प्रयास किया, जिसमें लोक सभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर आठ सौ पचास करने और महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ तुरंत लागू करने का प्रस्ताव शामिल था। हालांकि यह संशोधन लोक सभा में पारित नहीं हो सका, जिसके परिणामस्वरूप 2023 का मूल कानून अपनी वर्तमान स्थिति में ही बना रहेगा।

इस पूरे विवाद में राजनीतिक मतभेद भी स्पष्ट रूप से सामने आए। विपक्ष ने जहां 2023 के महिला आरक्षण कानून का समर्थन किया था, वहीं उसने परिसीमन और आरक्षण के संबंध को बदलने वाले नए संशोधन का विरोध किया। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि सरकार पहले से पारित महिला आरक्षण कानून को लागू करती है, तो पूरा विपक्ष बिना किसी अपवाद के उसका समर्थन करेगा। दूसरी ओर गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि उनके रुख के कारण महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिल पाएगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यह मुद्दा भविष्य के चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकता है और इसका असर व्यापक स्तर पर देखने को मिलेगा।

बहरहाल, अब नजर इस बात पर टिकेगी कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा किस तरह राजनीतिक रंग लेता है और भाजपा इसे चुनाव प्रचार में किस रणनीति के साथ उठाती है। संकेत तो मिल ही चुके हैं कि पार्टी इस पर आक्रामक रुख अपनाने वाली है। आज विभिन्न समाचारपत्रों में जारी विज्ञापनों के माध्यम से भाजपा ने स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि वह महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में है और इसी उद्देश्य से उसने विधेयक पेश किया था, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन ने इसे पारित नहीं होने दिया और महिलाओं को उनके अधिकार से वंचित कर दिया। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी मैदान में यह मुद्दा कितना प्रभाव डालता है और क्या यह वास्तव में मतदाताओं की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर पाता है?

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बंगाल की वो सीट जहां बोलती है बीजेपी की तूती, ममता भी सामने से नहीं लड़तीं

दार्जिलिंग अपनी सुंदरता के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी काफी अहम है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के दबदबे के बावजूद, दार्जिलिंग में बीजेपी का मजबूत गढ़ है.दार्जिलिंग के पहाड़ी और मैदानी दोनों इलाकों में बीजेपी का दबदबा है. ऐसे में जानते हैं इसके पीछे की वजह क्या है, आखिर क्यों यहां बीजेपी की तूती बोलती है ममता भी सामने से चुनावी मैदान में उतरतीं.

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  Sports

SRH vs CSK Pitch Report: हैदराबाद में कैसा होगा पिच का मिजाज? बल्लेबाज मचाएंगे धमाल या गेंदबाजों को मिलेगी मदद

आज शनिवार, 18 अप्रैल को आईपीएल 2026 में डबल हेडर यानी दो मैच हैं। दिन का दूसरा मैच सनराइजर्स हैदराबाद और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच खेला जाना है। ये मौजूदा सीजन का 27वां मुकाबला है जो हैदराबाद के राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में आयोजित होगी। दोनों टीमें शाम साढ़े सात बजे टकराएंगी। 

फिलहाल, एसआरएच ने अब तक पांच मैचों से दो जीते हैं और अंक तालिका में पांचवें स्थान पर है। गायकवाड़ की अगुवाई वाली चेन्नई ने भी पांच मैचों से दो जीते हैं लेकिन आठवें नंबर पर है। हैदराबाद टीम का नेट रनरेट सीएसके से बेहतर है। 

पिच रिपोर्ट
एसआरएच जारी सीजन में राजवी गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में तीसरा मैच खेलने उतरेगी। एसआरएच ने यहां पिछले दो मैचों में से जीत हासिल की है। हैदराबाद ने राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ 216/6 का स्कोर खड़ा करने के बाद 57 रनों से विजयी परचम फहराया। इस मैच में डेब्यूटेंट प्रफुल्ल हिंगे और साकिब हुसैन ने कातिलाना गेंदबाजी की थी। हैदराबाद का मैदान आईपीएल में हाई स्कोर खड़ा करने वाली जगहों में से एक है। यहां शनिवार को भी बल्लेबाजों के धमाल मचाने की उम्मीद है। हैदराबाद में टीमें टॉस जीतकर चेज करना पसंद करती हैं। यहां कुल 85 मैच खेले गए हैं जिसमें से लक्ष्य का पीछा करते हुए 48 बार जीत दर्ज की गई। पहले बल्लेबाजी करते हुए 36 मैच जीते गए हैं। यहां पहले बल्लेबाजी करते हुए 163.49 औसत स्कोर है। प्रति ओवर औसत रन 8.33 हैं। 

राजवी गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम आईपीएल रिकॉर्ड
खेले गए मैच- 85
पहले बल्लेबाजे करते हुए जीते गए मैच- 36
 लक्ष्य का पीछा करते हुए जीते गए मैच- 48
टॉस जीतकर जीते गए मैच- 32
 टॉस हारकर जीते गए मैच-51
बेनतीजा मैच- 1
हाईएस्ट स्कोर- 286/6
लोएस्ट स्कोर- 80
 हाईएस्ट स्कोर इन चेज- 160/3
प्रति विकेट औसत रन- 27.33
प्रति ओवर औसत रन- 8.33
पहले बल्लेबाजी करते हुए औसत स्कोर- 163.49

SRH vs CSK हेड टू हेड रिकॉर्ड
सनराइजर्स हैदराबाद और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच आईपीएल में कुल 22 मैच खेले गए हैं। चेन्नई का इस दौरान पलड़ा भारी रहा है। सीएसके ने 15 मैचों में जीत दर्ज की है। जबकि एसआरएच ने सिर्फ सात बार जीत का स्वाद चखा। प्रफुल्ल हिंगे और साकिब हुसैन जैसे होनहार तेज गेंदबाजों के डेब्यू के बाद संतुलित नजर आ रही हैदराबाद टीम शनिवार को सीएसके के खिलाफ नए आत्मविश्वास के साथ मैदान पर उतरेगी। इन दोनों युवा गेंदबाजों के शानदार प्रदर्शन से सनराइजर्स के तेज गेंदबाजी आक्रमण को मजबूती मिली है। इससे उस टीम को बेहतर संतुलन मिला है जो अभिषेक शर्मा, ट्रेविस हेड, ईशान किशन और हेनरिक क्लासेन जैसे बल्लेबाजों पर बहुत अधिक निर्भर थी।
Sat, 18 Apr 2026 13:16:21 +0530

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