एक ओर जहां मध्य पूर्व में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने वैश्विक शांति को खतरे में डाल दिया है, वहीं दूसरी ओर दुनिया की दिग्गज तेल और गैस कंपनियों के लिए यह युद्ध 'कुबेर के खजाने' जैसा साबित हो रहा है. 'द गार्जियन' के एक नवीनतम विश्लेषण के अनुसार, 28 फरवरी को शुरू हुए इस युद्ध के पहले महीने में ही दुनिया की शीर्ष 100 ऊर्जा कंपनियों ने अप्रत्याशित लाभ के रूप में प्रति घंटे 30 मिलियन डॉलर (करीब 250 करोड़ रुपये) से अधिक की कमाई की है.
मार्च में बरसे अरबों डॉलर, 100 डॉलर प्रति बैरल का 'टॉर्चर'
एनर्जी इंटेलिजेंस प्रदाता राइस्टैड एनर्जी और ग्लोबल विटनेस के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट से पता चला है कि मार्च महीने में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं. इस मूल्य वृद्धि के कारण ऊर्जा कंपनियों को अकेले मार्च में 23 अरब डॉलर का अतिरिक्त मुनाफा हुआ. विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि कीमतें इसी स्तर पर बनी रहीं, तो साल के अंत तक यह आंकड़ा 234 अरब डॉलर को पार कर सकता है.
कौन हैं इस मुनाफे के सबसे बड़े खिलाड़ी?
इस अप्रत्याशित कमाई की रेस में सऊदी अरब, रूस और अमेरिका की कंपनियां सबसे आगे हैं...
1. सऊदी अरामको
दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको को 2026 के अंत तक युद्ध से संबंधित 25.5 अरब डॉलर का अतिरिक्त लाभ होने का अनुमान है. बता दें कि अरामको ने 2016 से 2023 के बीच पहले ही प्रतिदिन औसतन 250 मिलियन डॉलर की कमाई की है.
2. रूसी उत्पादक (Gazprom, Rosneft, Lukoil)
पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस की इन कंपनियों को साल के अंत तक 23.9 अरब डॉलर का विंडफॉल प्रॉफिट होने की उम्मीद है. यह मुनाफा मॉस्को की युद्ध अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूती दे रहा है.
3. अमेरिकी दिग्गज भी रेस में (ExxonMobil & Chevron)
मौजूदा कीमतों के आधार पर एक्सॉनमोबिल को 11 अरब डॉलर और शेवरॉन को 9.2 अरब डॉलर का अतिरिक्त लाभ हो सकता है. युद्ध शुरू होने के बाद से एक्सॉनमोबिल के बाजार मूल्य में 118 अरब डॉलर की जबरदस्त वृद्धि हुई है.
4. यूरोपीय कंपनियां
शेल (Shell) नाम की यूरोपियन कंपनी भी तेल के खेल में मोटी कमाई कर रही है. इस कंपनी को भी इस संकट के बीच 6.8 अरब डॉलर की अतिरिक्त आय होने की संभावना जताई जा रही है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, सप्लाई का डर और कीमतों में उबाल
दरअसल तेल बाजार में इस भीषण तेजी की मुख्य वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव है. यह समुद्री रास्ता दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की 'लाइफलाइन' है. ईरान और अमेरिका के बीच टकराव के कारण इस रूट के बंद होने की आशंका ने कच्चे तेल की कीमतों को $100 के पार पहुंचा दिया था.
विंडफॉल टैक्स की मांग ने पकड़ा जोर
जब आम जनता महंगाई और बढ़ती ऊर्जा लागत से जूझ रही है, तब कंपनियों के इस विशाल मुनाफे ने नैतिक और आर्थिक सवाल खड़े कर दिए हैं. यूरोपीय आयोग अब जर्मनी, स्पेन, इटली और ऑस्ट्रिया जैसे देशों के प्रस्तावों की समीक्षा कर रहा है, जिनमें इन कंपनियों के अतिरिक्त मुनाफे पर 'विंडफॉल टैक्स' लगाकर परिवारों को राहत देने की मांग की गई है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक ने भी ऊर्जा संकट से निपटने के लिए समन्वित कार्रवाई का आग्रह किया है.
क्या है तेल की मौजूदा स्थिति
हालांकि, आज यानी गुरुवार को तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी देखी गई है. ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमत 0.5% गिरकर 94.49 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है. इसका मुख्य कारण ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास जहाजों को गुजरने देने की संभावना जताना है, जिससे सप्लाई बाधित होने का डर थोड़ा कम हुआ है.
बहरहाल यह रिपोर्ट साफ करती है कि युद्ध जहां आम जनता के लिए तबाही लाता है, वहीं तेल बाजार की बड़ी शक्तियों के लिए यह मुनाफे का सबसे बड़ा अवसर बन जाता है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वैश्विक सरकारें इन कंपनियों पर नकेल कसकर आम आदमी को महंगाई से राहत दिला पाती हैं या नहीं.
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कुछ दिन पहले जब ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर सटीक मिसाइल हमले किए थे। अमेरिका के सैन्य ठिकानों को कई जगह निशाना बनाया था। उस वक्त पूरी दुनिया दंग रह गई थी और सवाल उठा कि आखिर ईरान के पास इतनी सटीक लोकेशन कहां से आई? आज एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने इस राज से पर्दा उठा दिया है। इस रिपोर्ट के आने के बाद से सिर्फ ईरान ही नहीं एक और देश है जो अब अमेरिका के निशाने पर आ गया है। दरअसल फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने कुछ साल पहले चाइना से एक सेटेलाइट ली थी। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में ऐसा छापा गया है कि ईरान ने 2024 के अंत में चाइना से गुपचुप तरीके से एक स्पाई सेटेलाइट खरीदी थी जिसका नाम TE01 भी है। इसे बनाया और ल्च किया गया चाइना की एक कंपनी अर्थ आई द्वारा। कागजों पर तो यह कमर्शियल डील दिखती है, लेकिन इसके पीछे का सच कुछ और है। लीक हुए कुछ डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक इस सेटेलाइट का कंट्रोल ईरान की सिविलियन स्पेस एजेंसी के पास नहीं बल्कि सीधे आईआरजीसी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स के पास था। इस खबर के बाहर आते ही अपने आप में एक बहुत बड़ी चर्चा शुरू हो गई। आखिरकार ईरान ने जो हमले किए अब उसके पीछे चाइनीस सेटेलाइट्स का हाथ बताया जा रहा है।
दरअसल इसका असर कुछ ऐसे हुआ कि मार्च 2026 के महीने में जब ईरान ने अमेरिका के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर हमला किया तो उसके ठीक 24 घंटे पहले ही सटीक तस्वीरें इसी सेटेलाइट ने ईरान को भेजी थी। हमला खत्म होने के बाद नुकसान कितना हुआ इसकी जानकारी भी इसी सेटेलाइट ने दी। यानी चाइना की तकनीक ईरान के लिए आंख और कान का काम कर रही थी। तो कुल मिलाकर देखा जाए तो अमेरिका पर जो हमले ईरान ने किए उसमें कहीं ना कहीं इस चाइनीस सेटेलाइट का भी एक बड़ा रोल था और यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि इस हमले में अमेरिका को नुकसान कितना हुआ। समझना बहुत जरूरी है क्योंकि अमेरिका ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि इस जंग में उनके फाइटर जेट्स को नुकसान पहुंचा है। लेकिन लिस्ट बहुत लंबी है। इस जंग में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ और कहीं ना कहीं इसके पीछे इस चाइनीस सेटेलाइट का भी एक बड़ा रोल रहा है। इस जंग में ईरान को तो नुकसान हुआ लेकिन अमेरिका ने उम्मीद नहीं की होगी कि उसे इतना भारी नुकसान झेलना पड़ेगा। सबसे पहले अमेरिका का F-15 ई स्ट्राइक ईगल गिराया गया।
A10 थंडरब्ट टू गिराया गया। MQ9 रिपर ड्रोन कम से कम 20 से 24 ड्रोंस ऐसे गिराए गए। इसके अलावा चीनूक हेलीकॉप्टर यहां तक कि ब्लैक हॉक के डैमेज होने की भी रिपोर्ट्स थी। ईरान ने तो यह तक दावा किया था कि उसने एक अमेरिकी F-35 तक गिरा दिया है। और इसके साथ ही साथ कई सैन्य ठिकानों पर भी ईरान ने हमला किया। हालांकि इस नुकसान की पुष्टि भारत तक नहीं करता है। देखिए आमतौर पर जंग के दौरान दोनों तरफ नुकसान पहुंचता है। ईरान को भी नुकसान हुआ, अमेरिका को भी नुकसान हुआ। लेकिन अमेरिका को जो नुकसान हुआ वो इसलिए चर्चा में आया क्योंकि अमेरिका ने जिस तरह से बयानबाजी की थी और हमले की तैयारी की थी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ईरान अमेरिका को इतना भारी भरकम नुकसान पहुंचा पाएगा। और अब जब फाइनेंसियल टाइम्स की ये रिपोर्ट सामने आई है तो चाइनीस सेटेलाइट को भी इसके पीछे जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। देखिए हथियारों की अगर बात करें जो अमेरिकी विमान गिराए गए उसमें तो मान लीजिए जंग का वक्त है। दोनों तरफ से हमले हुए कोई भी नुकसान हो सकता है। लेकिन जो सटीक हमले अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर किए गए उसके पीछे चाइनीस सेटेलाइट्स का हाथ हो सकता है। देखिए जो रिपोर्ट्स सामने आई हैं उसके मुताबिक इस सेटेलाइट ने सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस की 13, 14 और 15 मार्च की तस्वीरें ली।
14 मार्च को ट्रंप ने खुद माना था कि इस बेस पर मौजूद अमेरिकी विमानों को नुकसान हुआ था। इसके अलावा इस सेटेलाइट ने जॉर्डन के मुआफक साल्टी एयरबेस पर भी नजर रखी। साथ ही बहरीन में अमेरिकी नौसेना के यूएस फिफ्थ फ्लट के बेस और इराक के एरेबल एयरपोर्ट के आसपास के इलाकों को भी मॉनिटर किया गया। यही नहीं कुवैत, जिबूती, ओमान और यूएई में मौजूद अमेरिकी ठिकानों के कोऑर्डिनेट्स की पूरी लिस्ट इस चाइनीस सेटेलाइट के पास थी। ये अमेरिका की इंटेलिजेंस के लिए एक बहुत बड़ा फेलोर माना जा रहा है। रिपोर्ट्स कहती है कि ईरान ने इस सेटेलाइट की मदद से अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर नजर रखा और उसी हिसाब से हमलों की तैयारी की। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं की गई है।
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