अमेरिका के 60 मेडिकल संस्थानों में ‘पाक-कला’ कोर्स में:सिर्फ डाइट नहीं बदलेंगे डॉक्टर, खाना बनाने का तरीका बताकर भी बीमारी दूर करेंगे
लॉरेन एस्टेस के हाथ बहुत सधे हुए हैं। टफ्ट्स मेडिकल स्कूल की यह छात्रा जब सुआ की पत्तियों को काटती है, तो एकाग्रता वैसी ही होती है जैसी सर्जन की ऑपरेशन थिएटर में। लॉरेन का सपना एक दिन बच्चों की सुरक्षित डिलीवरी कराना है, पर अभी प्राथमिकता कुछ और है... बेहतरीन ‘छोले’ बनाना। लॉरेन अकेली नहीं है। साथ में 14 और छात्र-जो भविष्य के डॉक्टर, डेंटिस्ट व डाइटिशियन हैं, इन दिनों रसोई में पसीना बहा रहे हैं। यह आम कुकिंग क्लास नहीं है, बल्कि टफ्ट्स यूनिवर्सिटी का ‘कलिनरी मेडिसिन’ कोर्स है। अमेरिका के 60 से ज्यादा मेडिकल संस्थानों में यह पाठ्यक्रम अपनाया जा रहा है, जहां डॉक्टरों को किताबी पोषण ही नहीं, बल्कि रसोई साक्षरता भी सिखाई जा रही है। इसका मुख्य विचार ‘फूड इज मेडिसिन’ (भोजन ही औषधि है) अभियान को बढ़ावा देना है, ताकि डॉक्टर सिर्फ डाइट बदलने की सलाह ही न दें, बल्कि उन्हें यह भी समझा सकें कि स्वस्थ भोजन कैसे बनाएं। यानी सिर्फ ये बताना काफी नहीं है कि खाना सेहत के लिए अच्छा है। उन्हें सीखना होगा कि डायबिटीज, किडनी व दिल के रोगों में कौन सी सब्जी दवा की तरह काम कर सकती है। रिटायर्ड पुलिस अफसर चक सेल्फ इस बदलाव के बड़े गवाह हैं। 4 साल पहले उन्हें डायबिटीज व दिल की बीमारी ने इस कदर जकड़ा था कि पैर काटने तक की नौबत आ गई थी। इंसुलिन इंजेक्शन जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे। डॉक्टर ने दवाइयों के साथ-साथ ‘मेडिकली टेलर्ड भोजन’ का पर्चा लिखा। चक बताते हैं,‘डॉक्टर्स ने मुझे वह खिलाया जो हमारे पूर्वज खाते थे- बीन्स, दालें, मोटा अनाज।’ नतीजे चमत्कारिक थे। चक का वजन घटा, शुगर लेवल सुधरा और दवाइयां कम हो गई। वे कहते हैं, भोजन ने मुझे फिर से जीना सिखाया।’ यह बदलाव डॉक्टरों को भी बदल रहा है। शेफ मिशेल निशन कहते हैं,‘कई डॉक्टर ‘टॉप शेफ’ जैसे कुकिंग शो के दीवाने हो गए हैं।’ जब एक डॉक्टर करछुल थामता है, तो वह इलाज की नई परिभाषा लिखता है, जहां स्वास्थ्य की नींव अस्पताल के बेड पर नहीं, बल्कि रसोई में रखी जाती है। यह पहल ऐसी मेडिकल व्यवस्था की शुरुआत है, जहां डॉक्टर सिर्फ,‘बीमारी का इलाज’ नहीं, बल्कि ‘पूर्ण स्वास्थ्य का निर्माण’ करेंगे। जैसे इन दिनों लॉरेन प्रोजेक्ट के लिए हैती की गर्भवती महिला के लिए भिंडी और मसूर की दाल मिलाकर कुछ नया रच रही हैं जो उसकी सांस्कृतिक पसंद के करीब हो और साथ ही भ्रूण के विकास के लिए जरूरी तत्वों से भरपूर भी हो। शोध भी यही बताते हैं कि यदि डॉक्टर खुद खाना पकाने के बारे में जानते हैं, तो वे इलाज में भोजन को प्रभावी उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने को लेकर आश्वस्त होते हैं। सलाह काफी नहीं, पूरी जानकारी होना जरूरी कलिनरी मेडिसिन कोर्स की डायरेक्टर नादिन तासाबेजी कहती हैं,‘मरीज को प्रोटीन खाने की सलाह देना काफी नहीं है। डॉक्टर को उस वस्तु के दाम, पकाने में लगने वाला समय और वह मरीज के स्वाद व परंपरा की अनुसार हैं भी या नहीं... पता होना चाहिए।’
दृष्टिहीनों के साथ भारत घूमने वाले जर्नलिस्ट के अनुभव:नजारे नहीं, एहसास... देखने वालों के लिए सफर ‘फिल्म’ है, पर अंधेरों के लिए ‘खुलती किताब’
‘हम में से ज्यादातर लोगों के लिए यात्रा का मतलब ‘नजारे देखना’ होता है। हम दर्शनीय स्थलों पर जाते हैं, तस्वीरें खींचते हैं और ऐसे होटल ढूंढ़ते हैं जहां से बाहर की खूबसूरती दिखे। लेकिन आपने कभी सोचा है कि दृष्टिहीन यात्री के लिए दुनिया कैसी होगी? इसी का जवाब खोजने के लिए मैं उत्तर भारत के ‘गोल्डन ट्रायंगल’ की 10 दिनों की यात्रा पर निकला। यह मौका ब्रिटिश कंपनी ट्रैवलआइज ने दिया था, जो सामान्य लोगों को दृष्टिहीनों के साथ सफर की पहल करती है। सूर्योदय के समय मैं ल्यूक के साथ ताजमहल में था। उसका हाथ मेरी बांह पर था और सफेद छड़ी से वह जमीन को टटोल रहा था। जैसे ही आगे बढ़े, पैरों के नीचे का अहसास बदल गया- खुरदरे बलुआ पत्थर से ठंडे, चिकने संगमरमर तक। मैंने उसका हाथ दीवारों पर रखा, जहां उसकी अंगुलियां नक्काशी व कीमती पत्थरों को महसूस कर रही थीं। ल्यूक ने 18 साल की उम्र में बीमारी के कारण दृष्टि खो दी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा,‘मुझे कुछ बहुत भव्य और शानदार होने का अहसास हो रहा है।’ गुंबद के नीचे पर्यटकों की आवाजें मधुर गूंज में बदल गईं। ल्यूक ने सिर ऊपर उठाकर कहा,‘जैसे हम किसी बड़े स्पीकर के अंदर खड़े हों।’ उस पल मैंने भी आंखें बंद कीं और पहली बार उस शांति व गूंज को सुना, जिसे मैं अक्सर अनदेखा कर देता था। इस यात्रा का उद्देश्य दृश्य देखना नहीं, बल्कि ‘अनुभूति’ था। पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में मेरा साथ डेनियल ने दिया। मसालों, डीजल की तेज गंध के बीच डेनियल ने बताया कि दृष्टिहीन आवाजों व हवा के बहाव से दुनिया का नक्शा बुनते हैं। जब एक इंद्रिय कम होती है, तो बाकी इंद्रियां उसकी भरपाई और तीव्रता से करने लगती हैं। यह अनुभव अद्भुत था, जहां अभाव ही दृष्टि बन गया। छोटी-छोटी चीजें शब्दों के जरिए स्मृति में बसने लगीं... सफर में मेरी अगली साथी सिएटल की कैंडी थीं। उन्हें नजारों से ज्यादा भारत को समझना पसंद था। मैंने उन्हें बताया कि सड़क किनारे नाई कैसे काम करते हैं, लोग फुटपाथ पर कैसे सोते हैं और दुकानों पर स्नैक्स कैसे सजे रहते हैं। इस दौरान मेरी अवलोकन क्षमता भी बढ़ी। मैंने घड़ी की दिशा से उन्हें थाली में रखे खाने की स्थिति समझाई। छोटी-छोटी चीजें अब शब्दों के जरिए स्मृति में बसने लगीं। रणथंभौर में बाघ नहीं दिखा, लेकिन कैंडी के लिए जंगल का अनुभव ही काफी था। बूंदी में आंखें बंद कर ऑटो की सवारी ने एहसास बदल दिया। इस पहल की शुरुआत अमर लतीफ ने की, जिन्होंने बताया- दृष्टिहीनों के लिए सफर किताब, और देखने वालों के लिए फिल्म जैसा होता है।
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