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पीपीएफ, एससीएसएस और सुकन्या समृद्धि योजना…कौन-सी सरकारी बचत योजना आपके लिए बेहतर?

वर्तमान समय में, जब दुनिया भर में जारी भू-राजनीतिक तनावों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के साथ-साथ वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को भी प्रभावित किया है, जिसके चलते आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है और देश-दुनिया में तेल एवं गैस की कीमतों पर भी दबाव देखने को मिला है, तो ऐसे माहौल में सरकार समर्थित बचत योजनाएं (सेविग स्कीम्स) देश के परिवारों के लिए वित्तीय नियोजन का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई हैं. इन योजनाओं में अपेक्षाकृत कम जोखिम, निर्धारित ब्याज दर, अनुमानित रिटर्न और कर संबंधी लाभ मिलते हैं. हालांकि, कर लाभ संबंधित मौजूदा नियमों और शर्तों के अनुसार ही लागू होते हैं. 

इसी को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ), वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (एससीएसएस) और सुकन्या समृद्धि योजना (एसएसवाई) तीन प्रमुख सरकारी बचत योजनाएं हैं, जिन्हें अलग-अलग वित्तीय लक्ष्यों के लिए बनाया गया है. पीपीएफ का उद्देश्य लंबे समय में बचत और संपत्ति निर्माण करना है, एससीएसएस सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आय की योजना बनाने में मदद करती है, जबकि सुकन्या समृद्धि योजना बेटी के भविष्य के लिए वित्तीय कोष तैयार करने पर केंद्रित है.

ब्याज की बात करें तो, शनिवार यानी 8 अगस्त 2026 तक पीपीएफ पर 7.1 प्रतिशत वार्षिक, एससीएसएस पर 8.2 प्रतिशत वार्षिक और सुकन्या समृद्धि योजना पर 8.2 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिल रहा है. हालांकि, किसी योजना का चुनाव केवल ब्याज दर के आधार पर नहीं करना चाहिए. निवेश की अवधि, पात्रता, निकासी की सुविधा, कर व्यवस्था और पैसे की जरूरत जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है.

सार्वजनिक भविष्य निधि यानी पीपीएफ उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है, जो लंबे समय तक सुरक्षित निवेश के माध्यम से बड़ा कोष तैयार करना चाहते हैं. इसका खाता निवासी भारतीय व्यक्ति खोल सकता है. इसकी मूल अवधि 15 वर्ष है और इसके बाद इसे पांच-पांच वर्ष के ब्लॉक में आगे बढ़ाया जा सकता है.

पीपीएफ में न्यूनतम 500 रुपए प्रति वर्ष और अधिकतम 1.5 लाख रुपए प्रति वर्ष जमा किए जा सकते हैं. इसमें ब्याज सालाना चक्रवृद्धि आधार पर जुड़ता है. नियमों के अनुसार इसमें ऋण और आंशिक निकासी की सुविधा भी उपलब्ध है. कर व्यवस्था की बात करें तो पीपीएफ को ईईई श्रेणी में रखा जाता है. लागू कानूनों के अनुसार इसमें किए गए निवेश, अर्जित ब्याज और परिपक्वता राशि पर कर संबंधी लाभ उपलब्ध होते हैं. इसलिए लंबी अवधि की बचत और सेवानिवृत्ति के लिए कोष तैयार करने वाले लोगों के लिए पीपीएफ एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है.

वहीं, वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (एससीएसएस) मुख्य रूप से सेवानिवृत्ति के बाद नियमित और अनुमानित आय की जरूरत वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाई गई है. सामान्यतः 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिक इसके लिए पात्र होते हैं, हालांकि लागू नियमों के अनुसार कुछ विशेष प्रावधान भी मौजूद हैं. एससीएसएस की मूल अवधि 5 वर्ष है और निर्धारित नियमों के तहत इसे 3 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है. इसमें न्यूनतम 1,000 रुपए और अधिकतम 30 लाख रुपए निवेश किए जा सकते हैं. इस योजना में ब्याज का भुगतान हर तिमाही किया जाता है, जिससे सेवानिवृत्त लोगों को नियमित आय प्राप्त करने में मदद मिल सकती है.

एससीएसएस में निवेश पर लागू सीमा के भीतर आयकर अधिनियम की धारा 80सी के तहत कर लाभ मिल सकता है, जबकि अर्जित ब्याज पर मौजूदा कर नियमों के अनुसार कर लागू हो सकता है. इसलिए नियमित सेवानिवृत्ति आय चाहने वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह योजना उपयोगी विकल्प हो सकती है.

वहीं, सुकन्या समृद्धि योजना विशेष रूप से बालिकाओं के भविष्य के लिए बचत करने के उद्देश्य से शुरू की गई सरकारी योजना है. माता-पिता या अभिभावक 10 वर्ष से कम उम्र की बेटी के नाम पर खाता खोल सकते हैं. इस योजना में न्यूनतम 250 रुपए प्रति वर्ष और अधिकतम 1.5 लाख रुपए प्रति वर्ष जमा किए जा सकते हैं. खाते की अवधि खाता खोलने की तारीख से 21 वर्ष होती है. ब्याज सालाना चक्रवृद्धि आधार पर जुड़ता है.

नियमों के अनुसार, बेटी की उच्च शिक्षा के लिए आंशिक निकासी की सुविधा भी उपलब्ध है. पीपीएफ की तरह सुकन्या समृद्धि योजना भी लागू कानूनों के अनुसार ईईई कर व्यवस्था का लाभ देती है. बेटी की उच्च शिक्षा और भविष्य के लिए लंबे समय में कोष तैयार करने वाले परिवारों के लिए यह योजना विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है.

अब इनमें अंतर की बात करें तो पीपीएफ, एससीएसएस और सुकन्या समृद्धि योजना तीनों ही सरकार समर्थित और अपेक्षाकृत कम जोखिम वाली बचत योजनाएं हैं, लेकिन इनके उद्देश्य अलग-अलग हैं. पीपीएफ मुख्य रूप से लंबे समय की बचत, संपत्ति निर्माण और सेवानिवृत्ति की तैयारी के लिए है. इसमें 15 वर्ष की मूल अवधि होती है और इसे पांच-पांच वर्ष के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है. इसमें सालाना न्यूनतम 500 रुपए और अधिकतम 1.5 लाख रुपए जमा किए जा सकते हैं तथा ब्याज सालाना चक्रवृद्धि के आधार पर जुड़ता है.

एससीएसएस का मुख्य उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आय उपलब्ध कराना है. इसकी अवधि पांच वर्ष होती है और इसे नियमों के अनुसार तीन वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है. इसमें न्यूनतम 1,000 रुपए और अधिकतम 30 लाख रुपए निवेश किए जा सकते हैं तथा ब्याज का भुगतान तिमाही आधार पर किया जाता है. हालांकि, एससीएसएस में अर्जित ब्याज पर लागू कर नियमों के अनुसार कर देना पड़ सकता है.

वहीं, सुकन्या समृद्धि योजना विशेष रूप से बेटी के भविष्य के लिए बनाई गई है. इसमें 10 वर्ष से कम उम्र की बालिका के नाम पर माता-पिता या अभिभावक खाता खोल सकते हैं. इसमें सालाना न्यूनतम 250 रुपए और अधिकतम 1.5 लाख रुपए जमा किए जा सकते हैं. इसकी अवधि खाता खोलने की तारीख से 21 वर्ष होती है और उच्च शिक्षा जैसे निर्धारित उद्देश्यों के लिए नियमों के तहत आंशिक निकासी की सुविधा उपलब्ध है.

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आपका मुख्य उद्देश्य लंबी अवधि में सुरक्षित तरीके से पैसा जमा करना और भविष्य के लिए बड़ा कोष तैयार करना है, तो पीपीएफ पर विचार किया जा सकता है. यदि आप वरिष्ठ नागरिक हैं और सेवानिवृत्ति के बाद नियमित आय चाहते हैं, तो एससीएसएस आपकी जरूरत के अधिक अनुकूल हो सकती है. वहीं, यदि आपका लक्ष्य बेटी की उच्च शिक्षा और भविष्य के लिए वित्तीय कोष तैयार करना है, तो सुकन्या समृद्धि योजना अधिक उपयुक्त विकल्प हो सकती है.

इन तीनों योजनाओं में बाजार से सीधे जुड़ा जोखिम नहीं होता और ये सरकार समर्थित बचत विकल्प हैं. हालांकि, निवेश करने से पहले अपनी आय, वित्तीय लक्ष्य, निवेश अवधि, धन की जरूरत, निकासी संबंधी नियम और लागू कर प्रावधानों को ध्यान में रखना जरूरी है. ध्यान रखने वाली बात है कि ब्याज दरें और योजना के नियम समय-समय पर सरकार द्वारा बदले जा सकते हैं. इसलिए निवेश का अंतिम निर्णय लेने से पहले संबंधित सरकारी योजना की नवीनतम आधिकारिक जानकारी और लागू नियमों की जांच करना उचित रहेगा.

--आईएएनएस

DISCLAIMER: हेडिंग के अलावा, पूरी खबर IANS न्यूज फीड से ली गई है. न्यूजनेशन खबर में किए गए किसी भी डेटा और फैक्ट्स की पुष्टि नहीं करता है.

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Explainer: ईरान को शिपिंग का कंट्रोल देने वाली होर्मुज डील का क्या मतलब होगा?

Explainer: मध्य पूर्व में जारी तनाव का असर पूरी दुनिया में देखने को मिला है. इस तनाव में अब सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाना हो गया है. जिसके लिए ईरान और ओमान के बीच बातचीत चल रही है. ईरान और ओमान के बीच प्रस्तावित समझौते से ईरान को खाड़ी में आने वाले जहाजों पर नियंत्रण मिल सकता है. हालांकि वाशिंगटन ने कहा है कि वह इस बड़ी रियायत को स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि होर्मुज पर जहाजों के निकलने पर शुक्ल और एक्सेस से जुड़े मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं.

ट्रंप नहीं चाहते ईरान का हो होर्मुज पर कब्जा

अगर किसी डील से ईरान को इस होर्मूज जलडमरूमध्य से होने वाली शिपिंग पर काफी कंट्रोल मिलता है, तो ऑयल मार्केट इसे मिले-जुले संकेत के तौर पर देख सकते हैं. इससे तुरंत युद्ध का खतरा तो कम होगा, लेकिन टैंकरों के आने-जाने के लिए फीस और एक्सेस की शर्तों से जुड़ा एक नया और कम जाना-पहचाना खतरा भी पैदा हो सकता है. ऐसी खबरें हैं कि इलाके के सूत्र ट्रंप के जल्द डील होने के दावे का विरोध कर रहे हैं; इससे पता चलता है कि मार्केट को मामले के सुलझने की उम्मीद करने के बजाय, फिर से रास्ता खुलने की बात को सावधानी से लेना चाहिए.

होर्मुज पर नियंत्रण पर शुल्क वसूल सकता है ईरान

अगर ईरान को होर्मुज पर कब्जा मिला तो ईरान के कार्गो की कीमत पर 5 से 7 फीसदी शुल्क वसूलने की संभावना है, जो ओमान की लगभग 3 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है. ऐसे में तनाव कम होने के बाद भी गल्फ शिपिंग की लागत बढ़ सकती है. अमेरिका के हमले रोकने के बाद पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल की कीमतें गिरी हैं लेकिन पिछले दो दिनों से इनमें थोड़ा सा उछाल भी आया है. वहीं अगर बातचीत रुकती है तो बाजार में फिर से उतार-चढ़ाव आ सकता है. होर्मुज समझौते की चर्चा के पीछे एक बहुत मुश्किल सवाल है ये है कि क्या वॉशिंगटन इस बात को मंजूर करेगा कि दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग (चोकपॉइंट) का कंट्रोल ईरान के पास हो?

होर्मुज पर ईरान का कब्जा अब तक की सबसे बड़ी राहत

मीडिया रिपोर्ट्रस के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच पांच महीने से चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए एक प्रस्तावित समझौते के तहत तेहरान को होर्मुज जलडमरूमध्य से फारस की खाड़ी में प्रवेश करने वाले जहाजों पर नियंत्रण मिल सकता है. यह इस संघर्ष से ईरान को मिलने वाली अब तक की सबसे महत्वपूर्ण रियायतों में से एक होगी. इसे समझने के लिए वैश्विक ऊर्जा बाजारों में इस जलडमरूमध्य की भूमिका और किसी समझौते तक पहुंचने के लिए दोनों पक्षों द्वारा अपनाई जा रही कूटनीतिक सावधानी को समझना आवश्यक है.

क्यों सभी के लिए अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?

बता दें कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक संकरा जलमार्ग है जो खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ता है, और युद्ध से पहले यह सभी जहाजों के लिए बिना किसी शुल्क के खुला रहता था. यह वैश्विक ऊर्जा व्यापार के केंद्र में स्थित है और खाड़ी के उत्पादकों से तेल और गैस के निर्यात के लिए मुख्य मार्ग के रूप में कार्य करता है. इसलिए, इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों का निरीक्षण करने, उनसे शुल्क लेने या अन्यथा उन्हें नियंत्रित करने का अधिकार हमेशा केवल एक लॉजिस्टिकल विवरण से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहा है. यह वास्तव में विश्व अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण धमनी पर नियंत्रण है.

ईरान को मिल सकता है होर्मुज पर नियंत्रण

ईरानी सूत्र और क्षेत्रीय अधिकारियों के मुताबिक, ईरान और ओमान के बीच चर्चा के तहत एक समझौते के मसौदे में ईरान को खाड़ी में जाने वाले जहाजों पर अधिकार मिल सकता है; ये दोनों देश क्रमशः जलडमरूमध्य के उत्तरी और दक्षिणी चैनलों को नियंत्रित करते हैं. ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने न्यूज एजेंसी IRNA को बताया कि ओमान के साथ बातचीत "बुनियादी समझ" तक पहुंच गई है और इस व्यवस्था को इस तरह से तैयार किया गया है कि वाणिज्यिक जहाज आने और जाने, दोनों समय ईरानी क्षेत्रीय जल से गुजरेंगे. उन्होंने कहा कि प्रगति "अंतिम रूप दिए जाने के कगार पर" है.

हालांकि ये सब अमेरिका के रुख के साथ मेल नहीं खाता है. क्योंकि वाशिंगटन बार-बार कहता रहा है कि वह कभी भी इस बात से सहमत नहीं होगा कि ईरान जलडमरूमध्य तक पहुंच को नियंत्रित करे. हालांकि अमेरिका की ओर से अभी तक कोई टिप्पणी नहीं आई है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने कुछ दिन पहले कहा था कि समझौता जल्द ही होने वाला है, लेकिन क्षेत्रीय और ईरानी सूत्रों ने चेतावनी दी है कि महत्वपूर्ण विवरण अभी भी अनसुलझे हैं और इस विचार का खंडन किया कि समझौता निकट है. एक क्षेत्रीय सूत्र ने बताया कि ईरानी नियंत्रण के किसी न किसी रूप पर रियायत पहले ही दी जा चुकी है, लेकिन उस नियंत्रण की सटीक परिभाषा पर अभी भी बातचीत चल रही है, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या क्षेत्रीय देश जहाज निरीक्षण की निगरानी करेंगे और क्या कोई शुल्क स्वैच्छिक होगा.

ईरान के लिए पैसा एक अहम मुद्दा

ईरान के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि तेहरान इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों के कार्गो की कीमत का 5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत हिस्सा फीस के तौर पर चाहता है, जबकि ओमान लगभग 3 प्रतिशथ की कम दर पर बातचीत कर रहा है. वहीं, वॉशिंगटन चाहता है कि होर्जमु से गुजरने वाले जहाजों से कोई शुल्क न लिया जाए. 

इसके दांव-पेच सिर्फ शिपिंग की अर्थव्यवस्था से कहीं ज़्यादा बड़े हैं. अगर ईरान को इस जलडमरूमध्य पर काफी अधिकार देने वाला कोई समझौता होता है, तो यह क्षेत्र में शक्ति संतुलन को तेहरान के पक्ष में काफी हद तक बदल देगा, खासकर इसलिए क्योंकि यह युद्ध फरवरी के आखिर में अमेरिका और इज़राइल ने शुरू किया था.

अब तक 3400 लोगों की जा चुकी है जान

संघर्ष शुरू होने के बाद से ईरान में 3,400 से ज्यादा मौतें हुई हैं, जबकि अमेरिका के 18 सैनिक मारे गए हैं. साथ ही, ईरान ने क्षेत्र में अमेरिकी सहयोगियों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले जारी रखे हैं और बिना इजाजत जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों को भी निशाना बनाया है. तेहरान ने खाड़ी देशों को अलग से चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी सेना ईरानी इलाके पर दोबारा हमला करती है, तो वे क्षेत्र के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर जवाबी हमला करेंगे; खाड़ी क्षेत्र के एक सूत्र ने बताया कि यह चेतावनी बिल्कुल साफ और दो-टूक थी.

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