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हाथ में क्यों बांधा जाता है कलावा? जानें इसे बांधने का सही नियम और धार्मिक महत्व

Kalava bandhne ka mahatva: हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-अनुष्ठान, हवन या मांगलिक कार्य की शुरुआत से पहले हाथ में कलावा यानी मौली बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसे रक्षा सूत्र भी कहा जाता है और मान्यता है कि यह धागा व्यक्ति की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है और उसे संकल्प के प्रति सजग रखता है। यही कारण है कि पंडित जी किसी भी शुभ कार्य से पहले सबसे पहले यजमान के हाथ में कलावा बांधते हैं।

कलावा बांधने से जुड़ी पौराणिक मान्यता
धार्मिक कथाओं के अनुसार, कलावा बांधने की परंपरा का संबंध रक्षाबंधन और असुरों पर देवताओं की विजय से भी जोड़ा जाता है। एक कथा के अनुसार, जब देवराज इंद्र असुरों से युद्ध करने जा रहे थे, तब इंद्राणी ने उनकी विजय और सुरक्षा की कामना से उनकी कलाई पर एक पवित्र धागा बांधा था। मान्यता है कि इसी परंपरा से आगे चलकर कलावा बांधने की रीति की शुरुआत हुई, जो आज भी हर शुभ कार्य में निभाई जाती है।

इसके अलावा यह भी माना जाता है कि कलावा बांधते समय व्यक्ति के मन में जो भी संकल्प होता है, वह इस धागे के माध्यम से मजबूत होता है और कार्य में सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

किस हाथ में बांधना चाहिए कलावा?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, कलावा बांधने को लेकर भी एक निश्चित नियम बताया गया है। मान्यता है कि विवाहित पुरुषों और अविवाहित लड़के-लड़कियों को दाहिने हाथ में कलावा बांधना चाहिए, जबकि विवाहित महिलाओं को बाएं हाथ में कलावा बांधने की परंपरा है। इसके पीछे यह मान्यता है कि दायां हाथ कर्म और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जबकि बायां हाथ भावनाओं और घर-परिवार की सुरक्षा से जुड़ा माना जाता है।

कलावा बांधते समय रखें इन बातों का ध्यान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलावा बांधते समय व्यक्ति को मुट्ठी बंद रखनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर रखना चाहिए, साथ ही मन में भगवान का ध्यान करना भी शुभ माना जाता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि कलावा बांधने से पहले इसे कम से कम तीन या पांच बार हाथ में लपेटना चाहिए, क्योंकि इसे शुभ संख्या माना जाता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, पुराना कलावा जब खराब या मैला हो जाए, तो उसे कहीं भी फेंकने के बजाय किसी पवित्र नदी में प्रवाहित करना चाहिए या पीपल के पेड़ के नीचे रख देना चाहिए।

आधुनिक जीवन में भी बरकरार है यह परंपरा
समय के साथ भले ही जीवनशैली में कई बदलाव आए हों, लेकिन कलावा बांधने की यह परंपरा आज भी हिंदू घरों में उतनी ही श्रद्धा से निभाई जाती है। चाहे घर में कोई छोटी पूजा हो या बड़ा धार्मिक अनुष्ठान, कलावा बांधे बिना कार्य की शुरुआत अधूरी मानी जाती है। यही वजह है कि आज भी यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती जा रही है।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय, व्रत या धार्मिक कर्मकांड को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान या पंडित से सलाह अवश्य लें।

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पूजा में शंख बजाने का क्या है रहस्य? जानें इसका धार्मिक महत्व और सही तरीका

Shankh bajane ka mahatva: हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ, आरती या धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत में शंख बजाने की परंपरा बेहद प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि शंख की ध्वनि से वातावरण पवित्र होता है और देवी-देवताओं का आह्वान होता है। यही कारण है कि लगभग हर मंदिर और घर की पूजा में आरती के समय शंख जरूर बजाया जाता है।

भगवान विष्णु से जुड़ी है शंख की पौराणिक कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शंख को भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय और पवित्र प्रतीक माना जाता है। भगवान विष्णु के चार हाथों में से एक हाथ में हमेशा शंख देखा जाता है, जिसे "पांचजन्य" के नाम से जाना जाता है। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि समुद्र मंथन के दौरान शंख की उत्पत्ति हुई थी, इसी वजह से इसे देवताओं और असुरों के बीच हुए इस महान मंथन से निकला एक दिव्य रत्न भी माना जाता है।

इसके अलावा महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण के शंख "पांचजन्य" का उल्लेख भी मिलता है, जिसकी ध्वनि से युद्धभूमि में विपक्षी सेना के मन में भय उत्पन्न हो जाता था।

शंख बजाने के पीछे की धार्मिक मान्यता
मान्यता है कि शंख की ध्वनि से घर और आसपास के वातावरण में मौजूद नकारात्मक शक्तियां और बुरी आत्माएं दूर भागती हैं। इसके साथ ही यह भी कहा जाता है कि नियमित रूप से शंख बजाने से घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। इसी वजह से पूजा और आरती के समय शंखनाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

कुछ मान्यताओं के अनुसार, दिवाली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा के समय शंख बजाना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है, क्योंकि इससे घर में धन और समृद्धि का आगमन होता है।

किन दिनों में नहीं बजाना चाहिए शंख?
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, कुछ विशेष अवसरों पर शंख बजाने की मनाही होती है। मान्यता है कि सूतक और पातक के समय, यानी परिवार में जन्म या मृत्यु होने की स्थिति में शंख नहीं बजाना चाहिए। इसके अलावा शाम के समय एक बार से ज्यादा शंख बजाने से भी बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसे अशुभ माना जाता है।

घर में शंख रखने का भी है खास महत्व
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वास्तु शास्त्र में भी शंख को घर के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है। कहा जाता है कि घर के पूजा स्थान में शंख रखने से घर का वातावरण सकारात्मक बना रहता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। हालांकि यह भी सलाह दी जाती है कि पूजा में इस्तेमाल होने वाले शंख को नियमित रूप से साफ रखा जाए और उसे स्वच्छ स्थान पर ही रखा जाए।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय, व्रत या धार्मिक कर्मकांड को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान या पंडित से सलाह अवश्य लें।

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  Sports

Bumrah और Hardik Pandya की चोट पर बोले VVS Laxman, कहा- खिलाड़ी मशीन नहीं, COE और Team India के बीच है शानदार तालमेल

भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) का पुरजोर तरीके से बचाव करते हुए इसके प्रमुख वीवीएस लक्ष्मण ने रविवार को कहा कि खिलाड़ियों की चोट से उबरने की धीमी प्रक्रिया के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि क्रिकेटर कोई ‘मशीन’ नहीं हैं, जिनकी फिटनेस हर बार तय समयसीमा के भीतर लौट आए। लक्ष्मण ने यह भी स्पष्ट किया कि सीओई और टीम प्रबंधन के बीच बेहतरीन और निर्बाध समन्वय है।

फिलहाल तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह, हरफनमौला हर्षित राणा, हार्दिक पांड्या, वॉशिंगटन सुंदर और शीर्ष क्रम के बल्लेबाज बी. साई सुदर्शन अपनी-अपनी चोटों से उबरने के लिए सीओई में हैं। लक्ष्मण ने सीओई में चुनिंदा मीडिया से बातचीत में कहा, ‘‘सीओई सिर्फ चोट से उबरने और फिटनेस हासिल करने का केंद्र नहीं है। क्रिकेटरों को उत्कृष्टता हासिल करने में मदद करने के लिए इसकी भूमिका इससे कहीं बड़ी है। इसलिए हम चोटों के मामले में ‘दोष’ शब्द का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते। ऐसा करने पर किसी एक व्यक्ति को बलि का बकरा बनाया जाता है।”

उन्होंने कहा, ‘‘पुरुष और महिला, दोनों टीमों के सीओई, टीम प्रबंधन और ‘एसएसएम स्टाफ’ के बीच शानदार तालमेल है। इसलिए बिना रूकावट के संवाद लगातार होता रहता है।” लक्ष्मण ने कहा कि कड़े फिटनेस मानकों और मानव शरीर की प्रकृति को देखते हुए किसी खिलाड़ी का एक निश्चित समयसीमा में पूरी तरह फिट हो जाना हमेशा संभव नहीं होता। उन्होंने कहा, ‘‘यह समझना बहुत जरूरी है कि दिशानिर्देश और समयसीमा हमारी अपेक्षाओं के आधार पर तय की जाती हैं। लेकिन यह मानव शरीर है, मशीन नहीं कि हर बार तय समयसीमा के भीतर ही रिकवरी हो जाए।’’

उन्होंने बताया, ‘‘ खिलाड़ी की प्रगति की लगातार निगरानी की जाती है और उसके अनुसार प्रशिक्षण का भार बढ़ाया जाता है। चोट के उबरने से लेकर फिट घोषित होने और खिलाड़ी के सीओई छोड़ने तक यही प्रक्रिया जारी रहती है।’’ लक्ष्मण ने अपनी बात समझाने के लिए जसप्रीत बुमराह और साई सुदर्शन का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि चयनकर्ता सीओई से खिलाड़ियों की फिटनेस स्थिति की रिपोर्ट मांगते हैं।

इसके बाद रिपोर्ट चयन समिति के अध्यक्ष और दोनों टीमों के मुख्य कोच और बीसीसीआई को भेजी जाती है। उन्होंने कहा, ‘‘बुमराह और सुदर्शन के नाम के आगे हमेशा एक तारांकित निशान रहता है, जिसका अर्थ है ‘फिटनेस के अधीन’। इसलिए श्रीलंका के खिलाफ टीम के लिए उनका चयन फिटनेस क्लीयरेंस मिलने की शर्त पर होना था।’’ लक्ष्मण के मुताबिक, ‘‘सीओई में खिलाड़ियों का आकलन कर उन्हें एक चरण से दूसरे चरण में आगे बढ़ाया जाता है। उनकी प्रगति धीमी होती है तो चयन समिति के अध्यक्ष और मुख्य कोच को इसकी जानकारी दी जाती है।

उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और सभी संबंधित लोग समझते हैं कि खिलाड़ी अभी अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला में हिस्सा लेने के लिए तैयार नहीं है।’’ जब लक्ष्मण से पूछा गया कि बड़ी संख्या में खिलाड़ियों के लगातार चोटिल होने को लेकर क्या यह चिंता का विषय है, तो पूर्व भारतीय क्रिकेटर ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी। उन्होंने कहा कि चोट खेल करियर का हिस्सा है। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि यह चिंता का कारण है। लेकिन जब कोई खिलाड़ी शीर्ष स्तर पर खेलता है तो उससे अपना सर्वश्रेष्ठ देने की उम्मीद होती है।

चोट किसी भी खिलाड़ी के करियर का हिस्सा है। अगर आप चोट से बचने के बारे में सोचते रहेंगे तो अपनी पूरी क्षमता के साथ नहीं खेल पाएंगे।’’ उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि खिलाड़ियों की चोट को देखने का नजरिया बदलना चाहिए। उनके अनुसार, चोट को हमेशा नकारात्मक चीज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे खेल का स्वाभाविक हिस्सा समझना चाहिए। बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने भी श्रृंखला से पहले टीम चयन की प्रक्रिया को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि आम तौर पर टीम के रवाना होने से कम से कम तीन से चार सप्ताह पहले चयन बैठक होती है।

सैकिया ने कहा, ‘‘उस समय हमें खिलाड़ी की फिटनेस की वास्तविक स्थिति का पता नहीं होता। इसलिए उसके नाम के आगे ‘फिटनेस के अधीन’ का उल्लेख किया जाता है, क्योंकि वह खिलाड़ी उस समयचोट की उबरने की प्रक्रिया से जुड़े कार्यक्रम से गुजर रहा होता है।’’

उन्होंने कहा कि अगर खिलाड़ी 21 या 28 दिनों की उस अवधि में फिट हो जाता है, तो उसे टीम में शामिल किया जा सकता है। इसीलिए ऐसे खिलाड़ी को सीधे तौर पर चयन से बाहर नहीं किया जाता है। सैकिया के अनुसार, ‘‘टीम के यात्रा पर रवाना होने या मैच खेलने तक जरूरी फिटनेस हासिल करने के लिए खिलाड़ी के पास पर्याप्त समय रहता है। इस तरह अंतिम फैसला खिलाड़ी की वास्तविक फिटनेस स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है।

Sun, 09 Aug 2026 17:50:33 +0530

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