कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्र सरकार द्वारा महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने के लिए उठाए जा रहे त्वरित कदमों पर कई सवाल उठाए हैं। विधेयक को शामिल करने का समर्थन करते हुए ब्रिटास ने तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सरकार के इस कदम के समय और उद्देश्यों पर सवाल उठाए।
सोमवार को बोलते हुए ब्रिटास ने कहा कि हम प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखने के लिए धन्यवाद देते हैं। मुझे भी उनका पत्र मिला है। हम महिलाओं के अधिकारों के लिए हमेशा से आवाज़ उठाते रहे हैं। दशकों से हम राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण चाहते रहे हैं। लेकिन कुछ मुद्दे सामने आ गए हैं। 16 अप्रैल से शुरू होने वाले लोकसभा सत्रों में पारित होने वाले संशोधनों पर सरकार का वास्तविक रुख क्या है? हमें इसकी कोई जानकारी नहीं है।
उन्होंने आगे बताया कि विपक्षी दलों ने बार-बार सर्वदलीय बैठक बुलाने का अनुरोध किया है और चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने तक विशेष सत्रों को स्थगित करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सभी विपक्षी दलों ने सरकार से औपचारिक रूप से अनुरोध किया था कि कृपया प्रस्ताव पर फिर से विचार करें और इस सत्र या विशेष सत्रों को विधानसभा सत्रों के समापन तक स्थगित कर दें, जो अभी चल रहे हैं। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के बीच सरकार इन संशोधनों को जल्दबाजी में पारित कराना चाहती है।
ब्रिटास ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में 50% की वृद्धि करने का इरादा रखती है, जिससे संघीय संतुलन बिगड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि तथाकथित महिला आरक्षण के अलावा, सरकार परिसीमन को भी इसमें शामिल करना चाहती है। सरकार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या में 50% की वृद्धि करने का इरादा रखती है। इसका सीधा मतलब है कि संघीय संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा। सरकार के इस इरादे से कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।
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सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कथित 'जमीन के बदले नौकरी' घोटाले में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के खिलाफ सीबीआई की एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने से इनकार कर दिया, जिससे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री को कानूनी झटका लगा। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में यादव और उनके परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ एफआईआर और संबंधित कार्यवाही रद्द करने की उनकी याचिका खारिज कर दी। हालांकि, न्यायालय ने उन्हें कार्यवाही के दौरान निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दे दी।
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हालांकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री यादव (77) को सुनवाई के दौरान निचली अदालत में पेश होने से छूट दे दी। सर्वोच्च अदालत ने यादव को इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की व्यावहरिकता का मुद्दा उठाने की अनुमति दी। इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने 24 मार्च को राजद प्रमुख को एक बड़ा झटका देते हुए उनके और उनके परिवार से जुड़े ‘‘जमीन के बदले नौकरी’’ मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया था।
अदालत ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद की इस दलील को खारिज कर दिया था कि एजेंसी की कार्रवाई कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं, क्योंकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी। अधिकारियों ने बताया कि जमीन के बदले नौकरी का यह कथित मामला लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहने के कार्यकाल (2004 से 2009) के दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर में भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में की गई ‘ग्रुप डी’ नियुक्तियों से संबंधित है।
अधिकारियों के अनुसार ये नियुक्तियां भर्ती किए गए लोगों द्वारा राजद प्रमुख के परिवार या सहयोगियों के नाम पर कथित तौर पर उपहार स्वरूप दी गई या हस्तांतरित की गई भूमि के बदले की गई थीं। यादव ने दलील दी थी कि इस मामले में जांच, प्राथमिकी, जांच की प्रक्रिया और बाद में दाखिल आरोपपत्र कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं, क्योंकि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरोने भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी नहीं ली थी।
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