केंद्र सरकार ने फसल बोनस पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के दावे को खारिज किया
नई दिल्ली, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। वित्त मंत्रालय ने रविवार को स्पष्ट किया कि उसने राज्यों को एक एडवाइजरी भेजी थी, जिसमें उनसे अपनी बोनस नीति को दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं (पोषण सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत) के अनुरूप बनाने को कहा गया था और यह कोई निर्देश नहीं था, जैसा कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया था।
हाल ही में, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने एक भाषण में राज्य सरकारों की ओर से दिए जाने वाले बोनस के संबंध में मंत्रालय के व्यय विभाग की ओर से जारी एक पत्र का जिक्र किया था।
वित्त मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि मंत्रालय के व्यय विभाग के सचिव ने 9 जनवरी, 2026 को राज्यों के मुख्य सचिवों को एक डी.ओ. (अर्ध-सरकारी) पत्र जारी किया था। इस पत्र में राज्यों से कहा गया था कि वे अपनी बोनस नीति को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं (पोषण सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सतत कृषि) के अनुरूप बनाते हुए दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों को बढ़ावा दें। यह पत्र राज्यों के लिए एक सलाह थी, न कि कोई निर्देश था।
बयान में कहा गया कि यह पत्र इस उद्देश्य से लिखा गया था कि राज्य अपनी कृषि नीतियों को व्यापक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ संरेखित करें और उन्हें पूरा करने में सहायक बनें। ऐसे लक्ष्यों के साथ तालमेल बैठाना राज्यों पर कोई बोझ नहीं है यह एक साझा जिम्मेदारी है जो किसानों, उपभोक्ताओं और पूरे देश के हित में है।
बयान में कहा गया कि केंद्र सरकार किसानों की सहायता के लिए विभिन्न फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करती है। हालांकि कई राज्यों में, विशेषकर उत्तर भारत में फसल उत्पादन का झुकाव भारी मात्रा में गेहूं और धान की ओर ही बना हुआ है। जब राज्य सरकारें इन फसलों के लिए एमएसपी से ऊपर अतिरिक्त बोनस की घोषणा करती हैं, तो इससे इनकी खेती को और अधिक प्रोत्साहन मिलता है।
इसके परिणामस्वरूप, दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों के अंतर्गत आने वाला कृषि-क्षेत्र कम हो जाता है। पानी और उर्वरकों की अधिक खपत वाली खेती के कारण पर्यावरण पर दबाव बढ़ जाता है; और दालों तथा खाद्य तिलहनों जैसी आवश्यक फसलों के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ जाती है।
बयान में कहा गया कि इस प्रकार, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय हित में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर एक जिम्मेदार और दूरदर्शी रुख अपनाया है। इसका व्यापक उद्देश्य उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में गेहूं की और पूरे भारत के कई राज्यों में धान की एकल-फसल खेती को हतोत्साहित करना है।
इसके लिए राज्यों को ऐसी सतत कृषि पद्धतियों की ओर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जो किसानों के हितों और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की आवश्यकताओं की रक्षा करती हैं।
सरकार ने लगातार न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी को दालों और तिलहनों के पक्ष में रखा है, ताकि किसानों को कुछ ही फसलों पर अत्यधिक निर्भरता से हटकर दूसरी फसलों की ओर मुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यह भी बताया गया है कि आयातित खाने के तेल पर निर्भरता 2015-16 के 63.2 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 56.25 प्रतिशत रह गई है, जो सही दिशा में हो रही प्रगति को दर्शाता है। 2014-15 से 2024-25 के बीच, तिलहनों की खेती का रकबा 18 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा, उत्पादन लगभग 55 प्रतिशत बढ़ा और उत्पादकता लगभग 31 प्रतिशत बढ़ी।
--आईएएनएस
एसडी/वीसी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
ऑनलाइन प्रभाव अभियान से आयरलैंड को निशाना बनाए जाने का दावा : रिपोर्ट
डबलिन, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। आयरलैंड में काम करने वाले इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग के लिए किए गए एक विश्लेषण में यह पाया गया है कि ईरान से जुड़ा एक सूचना अभियान संभवतः आयरलैंड को निशाना बना रहा है।
इस विश्लेषण के दौरान कुछ नकली सोशल मीडिया अकाउंट्स मिले, जो ईरान, रूस और चीन से जुड़े बताए जा रहे हैं और वे आयरलैंड के बारे में पोस्ट कर रहे थे।
यह भी सामने आया है कि ये अकाउंट्स संभवतः “स्टॉर्म-2035” नाम के एक गुप्त प्रभाव अभियान का हिस्सा हो सकते हैं, जो ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) से जुड़ा बताया जाता है। यह बात द आयरिश टाइम्स में पत्रकार और रिसर्चर सियारन ओ’कॉनर ने कही।
इन अकाउंट्स की प्रोफाइल लोकेशन डाटा से पता चला कि इन्हें ईरान से एक्सेस किया जा रहा था।
इसके अलावा यह भी सामने आया कि एआई प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल अमेरिका-इजरायल की आलोचना करने और ईरान-फिलिस्तीन के समर्थन में कंटेंट बनाने के लिए किया गया था।
ओ’कॉनर ने कहा कि पिछले कुछ सालों में यूके और उत्तर अमेरिका के कुछ सार्वजनिक लोग आयरलैंड पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। उन्होंने आयरलैंड के एक दैनिक अखबार में कहा, “वे आयरलैंड की घटनाओं को गलत और डर पैदा करने वाले तरीके से पेश करके अपने एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं, हमारे सार्वजनिक संस्थानों को निशाना बनाते हैं और आयरलैंड को एक सख्त पुलिस राज्य की तरह दिखाते हैं।”
ओ’कॉनर ने बताया कि पिछले साल चार एक्स अकाउंट्स मिले थे जो आयरिश लोगों की तरह बनकर चलाए जा रहे थे। उन्होंने कहा कि इनमें से किसी के भी असली होने का कोई सबूत नहीं मिला।
इन अकाउंट्स को चलाने वाले लोग खुद को हाल ही में इस्लाम अपनाने वाला बताते थे और यह दावा करते थे कि वे “एकजुट आयरलैंड” का सपना देखते हैं।
ओ’कॉनर ने यह भी बताया कि रूस से जुड़ी गतिविधियां “बहुत फैली हुई” थीं। वहां एक ऐसा नेटवर्क है जो राज्य मीडिया की सामग्री को आगे फैलाने में मदद करता है, जिसमें अक्सर यूरोपीय संघ की ओर से प्रतिबंधित मीडिया भी शामिल होती है।
यह सामग्री फिर ऐसे आउटलेट्स और वेबसाइट्स के जरिए फैलती है जो खुद को असली न्यूज साइट्स की तरह दिखाते हैं, लेकिन वे असल में ऐसे नहीं होते और उन पर प्रतिबंध भी नहीं लगा होता।
इसके अलावा, विश्लेषण में यह भी सामने आया कि आयरलैंड में माइग्रेशन को कई राज्य-समर्थित समूहों ने एक पृष्ठभूमि की तरह इस्तेमाल किया। इसके जरिए वे यह दावा करने की कोशिश करते हैं कि पश्चिमी सरकारें कमजोर हैं, यूरोपीय संघ की संप्रभुता घट रही है, और लोकतांत्रिक संस्थाएं विफल हो रही हैं। इस शोध में सबसे दिलचस्प गतिविधि चीन से जुड़ी पाई गई।
--आईएएनएस
एवाई/एबीएम
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