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तुलसी ही नहीं, उसकी मंजरी में भी छिपे हैं सेहत के राज, सेवन से मिलते हैं जबरदस्त फायदे

नई दिल्ली, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। घर के आंगन में लगी तुलसी सिर्फ पूजा की थाली तक सीमित नहीं है, बल्कि पत्तियों के साथ तुलसी की मंजरी (फूलों के छोटे गुच्छे) भी स्वास्थ्य के लिए कमाल की औषधि है। आयुर्वेद में तुलसी की मंजरी को इम्युनिटी बढ़ाने, सर्दी-खांसी, पाचन सुधारने और तनाव कम करने का प्राकृतिक उपाय माना जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार, तुलसी की मंजरी सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति भी देती है। साथ ही घर में सुख-समृद्धि भी लाती है। धार्मिक रूप से भी इसे पवित्र माना जाता है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि सस्ती और आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक औषधि तुलसी की मंजरी के रोजाना सेवन करने से दवाइयों की जरूरत काफी हद तक कम हो जाती है। हालांकि, गंभीर बीमारी में आयुर्वेदिक विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

भारत सरकार का आयुष मंत्रालय भी तुलसी को प्रकृति का शक्तिशाली वरदान बताता है। तुलसी की मंजरी छोटे-छोटे फूलों का गुच्छा होती है जो पौधे पर उगती है। इसमें एंटीबायोटिक, एंटीवायरल, एंटीफंगल, और एंटीऑक्सीडेंट गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये गुण शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं और कई बीमारियों से बचाव करते हैं।

तुलसी मंजरी के नियमित सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। सर्दी, खांसी, बुखार और वायरल संक्रमण आसानी से नहीं होते। सर्दी-खांसी और गले की समस्या जैसे गले में खराश, बलगम और पुरानी खांसी में राहत मिलती है। अस्थमा और एलर्जी के मरीजों को भी फायदा होता है। पाचन तंत्र मजबूत कर गैस, अपच, एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याओं में आराम मिलता है।

यहीं नहीं तुलसी की खुशबू दिमाग को शांत कर तनाव कम करती है और अच्छी नींद लाती है। मुंह के छालों में राहत, चेहरे पर निखार और कील-मुंहासों में कमी आती है। साथ ही शरीर से विषाक्त तत्व निकलते हैं और खून साफ होता है।

तुलसी की मंजरी को कई आसान तरीकों से इस्तेमाल किया जा सकता है, सुबह खाली पेट 4-5 मंजरियां चबाएं। तुलसी की पत्तियों और मंजरी के साथ चाय बनाकर पिएं। शहद के साथ मंजरी का रस मिलाकर लें। अदरक, काली मिर्च और लौंग डालकर काढ़ा बनाकर पिएं, खासकर सर्दियों में यह बेहद फायदेमंद है।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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केंद्र सरकार ने फसल बोनस पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के दावे को खारिज किया

नई दिल्ली, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। वित्त मंत्रालय ने रविवार को स्पष्ट किया कि उसने राज्यों को एक एडवाइजरी भेजी थी, जिसमें उनसे अपनी बोनस नीति को दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं (पोषण सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत) के अनुरूप बनाने को कहा गया था और यह कोई निर्देश नहीं था, जैसा कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया था।

हाल ही में, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने एक भाषण में राज्य सरकारों की ओर से दिए जाने वाले बोनस के संबंध में मंत्रालय के व्यय विभाग की ओर से जारी एक पत्र का जिक्र किया था।

वित्त मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि मंत्रालय के व्यय विभाग के सचिव ने 9 जनवरी, 2026 को राज्यों के मुख्य सचिवों को एक डी.ओ. (अर्ध-सरकारी) पत्र जारी किया था। इस पत्र में राज्यों से कहा गया था कि वे अपनी बोनस नीति को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं (पोषण सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सतत कृषि) के अनुरूप बनाते हुए दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों को बढ़ावा दें। यह पत्र राज्यों के लिए एक सलाह थी, न कि कोई निर्देश था।

बयान में कहा गया कि यह पत्र इस उद्देश्य से लिखा गया था कि राज्य अपनी कृषि नीतियों को व्यापक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ संरेखित करें और उन्हें पूरा करने में सहायक बनें। ऐसे लक्ष्यों के साथ तालमेल बैठाना राज्यों पर कोई बोझ नहीं है यह एक साझा जिम्मेदारी है जो किसानों, उपभोक्ताओं और पूरे देश के हित में है।

बयान में कहा गया कि केंद्र सरकार किसानों की सहायता के लिए विभिन्न फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करती है। हालांकि कई राज्यों में, विशेषकर उत्तर भारत में फसल उत्पादन का झुकाव भारी मात्रा में गेहूं और धान की ओर ही बना हुआ है। जब राज्य सरकारें इन फसलों के लिए एमएसपी से ऊपर अतिरिक्त बोनस की घोषणा करती हैं, तो इससे इनकी खेती को और अधिक प्रोत्साहन मिलता है।

इसके परिणामस्वरूप, दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों के अंतर्गत आने वाला कृषि-क्षेत्र कम हो जाता है। पानी और उर्वरकों की अधिक खपत वाली खेती के कारण पर्यावरण पर दबाव बढ़ जाता है; और दालों तथा खाद्य तिलहनों जैसी आवश्यक फसलों के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ जाती है।

बयान में कहा गया कि इस प्रकार, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय हित में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर एक जिम्मेदार और दूरदर्शी रुख अपनाया है। इसका व्यापक उद्देश्य उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में गेहूं की और पूरे भारत के कई राज्यों में धान की एकल-फसल खेती को हतोत्साहित करना है।

इसके लिए राज्यों को ऐसी सतत कृषि पद्धतियों की ओर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जो किसानों के हितों और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की आवश्यकताओं की रक्षा करती हैं।

सरकार ने लगातार न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी को दालों और तिलहनों के पक्ष में रखा है, ताकि किसानों को कुछ ही फसलों पर अत्यधिक निर्भरता से हटकर दूसरी फसलों की ओर मुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में यह भी बताया गया है कि आयातित खाने के तेल पर निर्भरता 2015-16 के 63.2 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 56.25 प्रतिशत रह गई है, जो सही दिशा में हो रही प्रगति को दर्शाता है। 2014-15 से 2024-25 के बीच, तिलहनों की खेती का रकबा 18 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा, उत्पादन लगभग 55 प्रतिशत बढ़ा और उत्पादकता लगभग 31 प्रतिशत बढ़ी।

--आईएएनएस

एसडी/वीसी

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