Gold Silver Prices: अमेरिका-ईरान में समझौता न होने का सोने-चांदी पर क्या होगा असर, जानिए एक्सपर्ट्स से
Gold Silver Prices: अमेरिका-ईरान बातचीत फेल होने से सोना-चांदी में हलचल बढ़ सकती है। ग्लोबल तनाव, महंगाई और चीन के आंकड़े अब कीमतों की दिशा तय करेंगे। अब सवाल है कि क्या यह तेजी जारी रहेगी या बाजार में और उतार-चढ़ाव बढ़ेगा।
क्या मुस्लिम वोटों के कटने से बिगड़ेगा TMC का खेल? बहरामपुर से देखिए 'बड़े मियां किधर चले' की Exclusive रिपोर्ट
Bengal Assembly Elections: पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुर्शिदाबाद जिले का बहरामपुर इलाका हमेशा से ही चर्चा का केंद्र रहा है. दिल्ली के लंबे सफर के बाद जब 'बड़े मियां किधर चले' की टीम बंगाल के बहरामपुर पहुंची, तो वहां की हवाओं में चुनावी गर्माहट साफ महसूस की गई. बहरामपुर विधानसभा सीट हमेशा से राज्य की राजनीति में एक खास स्थान रखती है. करीब ढाई लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर इस बार का मुकाबला पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण हो गया है. यहां की गलियों और चौराहों पर केवल एक ही चर्चा है कि आखिर इस बार जनता का ऊंट किस करवट बैठेगा. मुस्लिम समुदाय की बड़ी आबादी वाली यह सीट किसी भी दल के लिए सत्ता तक पहुंचने की चाबी मानी जाती है.
वोटों के कटने पर मचा सियासी बवाल
इस चुनाव में सबसे बड़ी चर्चा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर को लेकर हो रही है. खबर है कि इस प्रक्रिया के दौरान करीब 8 से 10 हजार वोट मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं. स्थानीय लोगों और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हटाए गए नामों में बड़ी संख्या मुस्लिम वोटरों की है. चूंकि इस सीट पर 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी है, इसलिए इतने बड़े पैमाने पर वोटों का कम होना किसी भी उम्मीदवार की जीत का गणित बिगाड़ सकता है. विपक्षी दल इसे लेकर प्रशासन और सत्ता पक्ष पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि आम जनता के बीच इसे लेकर भारी असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
पश्चिम बंगाल के बहरामपुर विधानसभा सीट पर बड़े मिया किधर चले की Exclusive रिपोर्ट
— News Nation (@NewsNationTV) April 12, 2026
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टीएमसी का इतिहास रचने का दावा
ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस ने इस बार फिर से नारू गोपाल मुखर्जी को अपना उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारा है. टीएमसी का मानना है कि राज्य सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के दम पर वह इस बार बहरामपुर में इतिहास रचेगी. पार्टी के कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों को यह समझाने में जुटे हैं कि विकास के लिए टीएमसी का जीतना जरूरी है. हालांकि, टीएमसी के लिए चुनौती कम नहीं है क्योंकि इस इलाके में वक्फ और अन्य राजनीतिक विवादों को लेकर पार्टी पर दबाव बना हुआ है. पार्टी को उम्मीद है कि मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा उनके साथ खड़ा रहेगा.
बीजेपी की साख और कांग्रेस का वजूद
दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने अपने मौजूदा विधायक सुब्रता मैत्रा पर एक बार फिर भरोसा जताया है. साल 2021 के चुनाव में सुब्रता मैत्रा ने 89 हजार से ज्यादा वोट पाकर एक बड़ी जीत दर्ज की थी और कांग्रेस के इस पुराने किले को ढहा दिया था. बीजेपी इस बार भी अपने उसी प्रदर्शन को दोहराने की पुरजोर कोशिश कर रही है. वहीं, कांग्रेस पार्टी के लिए यह सीट प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है. साल 2011 और 2016 में यहां कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन पिछले चुनाव में वह तीसरे नंबर पर खिसक गई थी. कांग्रेस इस बार अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है.
क्या होगा बहरामपुर का अंतिम फैसला?
राज्य की राजनीति में जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या अधिक होती है, वहां आमतौर पर टीएमसी मजबूत रही है. लेकिन बहरामपुर की कहानी इस बार थोड़ी अलग नजर आती है. यहां त्रिकोणीय मुकाबला होने की वजह से वोटों का बिखराव तय माना जा रहा है. अगर मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगती है या वोटों के कटने का असर पड़ता है, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है. वहीं अगर टीएमसी अपने आधार को बचाने में कामयाब रही, तो वह पहली बार यहां जीत का खाता खोल सकती है. बहरामपुर की जनता अब खामोशी से देख रही है कि कौन सा दल उनकी उम्मीदों पर खरा उतरता है. इसका असली फैसला तो मतदान के दिन ही होगा, लेकिन फिलहाल यहां की सियासी जंग पूरी तरह से चरम पर है.
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