यूपी का ये जिला बनेगा बड़ा औद्योगिक केंद्र, चिन्हित की गई 112 एकड़ जमीन
UP News: योगी सरकार राज्य के लोगों को रोजगार देने के साथ-साथ उद्योगों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है. जिसके लिए कई शहरों में औद्योगिक क्षेत्र का विकास किया जा रहा है. अब योगी सरकार यूपी के बरेली जिले को भी राज्य में बड़ा औद्योगिक केंद्र बनाने जा रही है. दरअसल, यूपी के बरेली जिले के नवाबगंज में प्रशासन जल्द बड़ा औद्योगिक केंद्र विकसित करने जा रहा है.
इस योजना के तहत किया जा रहा विस्तार
जिसका विस्तार सरदार वल्लभ भाई पटेल औद्योगिक एवं रोजगार क्षेत्र योजना के तहत किया जाएगा. जिसके लिए प्रशासन ने नवाबगंज में औद्योगिक केंद्र विकसित करने के लिए करीब 112 एकड़ जमीन चिह्नित कर ली है. बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने बताया कि औद्योगिक केंद्र का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया गया है और उसका प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है. उन्होंने कहा कि इससे न सिर्फ नवाबगंज तहसील, बल्कि जिले और आसपास के लोगों को भी रोजगार के अवसर पैदा होंगे.
स्थानीय विधायक ने की थी शासन से मांग
बता दें कि इलाके में औद्योगिक क्षेत्र के विस्तार के लिए नवाबगंज के विधायक डॉ. एमपी आर्य ने बीते माह शासन को पत्र भेजकर औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की मांग की गई थी. उन्होंने अपने पत्र में नेशनल हाईवे-74 (नया एनएच-30) के किनारे स्थित जमीन को उपयुक्त बताते हुए प्रस्ताव भेजने को कहा था. इसके बाद जिलाधिकारी के निर्देशन में औद्योगिक केंद्र के लिए जमीन चयन की कवायद शुरू की गई.
अधिकारियों ने जांच के बाद गांव बहोर नगला और रिछोला किफायतुल्ला और ग्रेम में करीब 112 एकड़ जमीन को औद्योगिक केंद्र के विकास के लिए उपयुक्त माना. बता दें कि ये जगह मुख्यालय से करीब 20 किमी दूरी पर है. जो हाइवे किनारे है. हाईवे से सीधे जुड़े होने की वजह से औद्योगिक दृष्टि से इस जमीन को अहम माना जा रहा है.
परिवहन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण
इसके साथ ही नेशनल हाईवे-30 से सटा होने की वजह से प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र तक परिवहन की सुविधा भी आसानी से मिल जाएगी. इससे इस औद्योगिक क्षेत्र में माल की ढुलाई और सामान की सप्लाई आसान हो जाएगी. इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद नवाबगंज क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियां तेज हो जाएंगी. जिससे स्थानीय युवाओं के साथ-साथ लोगों को भी बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा. यही नहीं आसपास के क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों को विस्तार मिलेगा.
ये है जमीन का विवरण
जिला प्रशासन ने औद्योगिक क्षेत्र के लिए जिस जमीन को चिन्हिंत किया है उसमें रिछोला किफायतुल्ला में 7.7470 हेक्टेयर भूमि राजकीय कृषि फार्म के नाम दर्ज है, जो श्रेणी-1 की भूमि है. इसके अलावा बहोर नगला में 40.6590 हेक्टेयर भूमि है. जो सरकारी अभिलेखों में सीर, खुदकाश्त, आबादी और सड़क के रूप में दर्ज है. जांच में पता चला है कि गांव ग्रेम में वर्तमान खतौनी के अनुसार कृषि विभाग के नाम कोई भूमि दर्ज नहीं है.
आशा भोसले को कभी खराब आवाज बताकर स्टूडियो से निकाला:12,000 गानों के साथ गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया; लता के साये से निकलकर बनाई पहचान
भारतीय संगीत जगत की सबसे वर्सेटाइल सिंगर आशा भोसले का 92 साल की उम्र में निधन हो गया है। उन्होंने अपनी आवाज से सात दशकों तक फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया। लेकिन9 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद अपना करियर शुरू करने वाली आशा ताई को शुरुआती दौर में भारी संघर्ष करना पड़ा। 1947 में एक रिकॉर्डिस्ट ने उन्हें 'खराब गला' कहकर रिजेक्ट कर दिया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने 20 भाषाओं में 12,000 से ज्यादा गाने गाए और अपना नाम 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में दर्ज कराया। आशा जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की 'आदर्श' छवि के बीच खुद को साबित करना था। उन्होंने चतुराई से अपनी आवाज में वेस्टर्न टच और मॉड्यूलेशन को पिरोया, जो उन्हें दूसरों से अलग बनाता था। जब लोगों को लगा कि वे सिर्फ कैबरे गा सकती हैं, तब उन्होंने 'उमराव जान' की गजलें गाकर अपनी गायिकी को साबित किया। आशा भोसले ने शास्त्रीय संगीत से लेकर कैबरे, पॉप और गजल तक हर शैली में अपनी महारत साबित की। महाराष्ट्र के सांगली में जन्म, पिता शास्त्रीय गायक रहे आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। वह प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और थिएटर कलाकार पंडित दीनानाथ मंगेशकर की बेटी थीं। घर में संगीत का माहौल शुरू से ही था। उनके भाई-बहन लता मंगेशकर, मीना खडीकर, उषा मंगेशकर और हृदयनाथ मंगेशकर भी संगीत की दुनिया से ही जुड़े रहे। जब आशा सिर्फ 9 साल की थीं, तब 1942 में उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर का निधन हो गया। पिता के जाने के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आ गया। परिवार को सहारा देने के लिए लता और आशा ने बहुत कम उम्र में गाना और फिल्मों में छोटी भूमिकाएं निभाना शुरू कर दिया था। मराठी फिल्म से बॉलीवुड तक का सफर आशा भोसले ने अपने सिंगिंग करियर की शुरुआत 1943 में एक मराठी फिल्म 'माझा बाळ' के गाने ‘चला चला नव बाड़ा’ से की थी। हिंदी सिनेमा में उन्हें पहला मौका 1948 में फिल्म 'चुनरिया' के गाने 'सावन आया' से मिला। शुरुआती दौर में आशा को वे गाने मिलते थे जिन्हें प्रमुख गायिकाएं जैसे लता मंगेशकर, शमशाद बेगम या गीता दत्त छोड़ देती थीं। उस समय उन्हें अक्सर फिल्मों में विलेन, डांसर या साइड किरदारों के लिए गाने के लिए बुलाया जाता था। आवाज को खराब बताया, स्टूडियो से रिजेक्शन मिला आज जो आवाज दुनिया भर में पहचानी जाती है, एक समय उसे भी नकारा गया था। 1947 में, जब आशा अपने करियर के शुरुआती दौर में थीं, तब फिल्म ‘जान पहचान' (संगीतकार: खेमचंद प्रकाश) के एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए वे किशोर कुमार के साथ फेमस स्टूडियो गई थीं। वहां के रिकॉर्डिस्ट रॉबिन चटर्जी ने उनकी आवाज सुनने के बाद कहा था, "यह आवाज नहीं चलेगी, इनका गला खराब है, किसी और को बुलाओ।" उस समय आशा को यह कहकर स्टूडियो से बाहर कर दिया गया था कि उनकी आवाज अच्छी नहीं है। इस घटना से किशोर कुमार काफी दुखी हुए थे। रात के 2 बज चुके थे और दोनों महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन पर उदास बैठे थे। तब आशा ने ही किशोर दा को ढांढस बंधाते हुए कहा था कि उनकी आवाज को कोई नहीं रोक सकता। इस रिजेक्शन ने आशा को तोड़ा नहीं, बल्कि और बेहतर बनने की प्रेरणा दी। आरडी बर्मन रहे करियर के बड़े टर्निंग पॉइंट्स 50 और 60 के दशक में बॉलीवुड में लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और गीता दत्त का दबदबा था। शमशाद बेगम अपनी खनकदार आवाज और गीता दत्त अपने दर्द भरे और वेस्टर्न अंदाज वाले गानों के लिए मशहूर थीं। जब गीता दत्त अपनी निजी जिंदगी की परेशानियों के चलते रिकॉर्डिंग से दूर होने लगीं, तब ओ.पी. नैयर और एस.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों ने आशा भोसले की तरफ रुख किया। 1950 के दशक में नैयर ने आशा की आवाज की खनक को पहचाना। 1954 में फिल्म 'मंगू' से शुरू हुआ उनका साथ 'सीआईडी' (1956) और 'नया दौर' (1957) तक आते-आते ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। नया दौर का गाना 'मांग के साथ तुम्हारा' और 'उड़े जब जब जुल्फें तुम्हारी' ने उन्हें मुख्यधारा की टॉप सिंगर्स में शामिल कर दिया। इसके बाद 1960 और 70 के दशक में संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत की परिभाषा बदल दी। पंचम दा ने आशा से 'दम मारो दम' (हरे रामा हरे कृष्णा) और 'पिया तू अब तो आजा' (कारवां) जैसे वेस्टर्न और जैज स्टाइल के गाने गवाए, जिन्होंने आशा को 'क्वीन ऑफ इंडिपॉप' बना दिया। जब लता के साये से बाहर आईं आशा आशा भोसले के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही बहन लता मंगेशकर के साथ कॉम्पिटिशन करना था। उस दौर में लता जी की आवाज को 'आदर्श' माना जाता था। आशा ने चतुराई से अपनी आवाज के साथ प्रयोग किए। उन्होंने महसूस किया कि अगर वह लता जैसी ही शैली अपनाएंगी, तो वह कभी अपनी पहचान नहीं बना पाएंगी। उन्होंने वेस्टर्न टच, मॉड्यूलेशन को अपनी आवाज में पिरोया, जो उस समय किसी अन्य सिंगर के पास नहीं था। उन्होंने गीता दत्त और शमशाद बेगम जैसे सिंगर्स को उनके ही दौर में कड़ी टक्कर दी और बाद में अलका याग्निक, कविता कृष्णमूर्ति और सुनिधि चौहान जैसी पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बनीं। जब लोगों को लगा कि वे सिर्फ कैबरे गा सकती हैं, तब 1981 में फिल्म 'उमराव जान' आई। संगीतकार खय्याम के निर्देशन में आशा ने 'दिल चीज क्या है' और 'इन आंखों की मस्ती के' जैसी बेहतरीन गजलें गाकर क्लासिकल गायिकी में भी लता मंगेशकर के बराबर अपनी जगह पक्की कर ली। आशा भोसले का पहला बड़ा सम्मान और वर्ल्ड रिकॉर्ड आशा भोसले के करियर के सबसे हिट गाने सिंगिंग के अलावा कुकिंग और सफल रेस्तरां बिजनेस आशा भोसले केवल एक महान गायिका ही नहीं, बल्कि एक शानदार कुक भी थीं। वह अक्सर कहती थीं कि अगर वह सिंगर न होतीं, तो एक रसोइया होतीं। उनके हाथ के बने 'कढ़ाई गोश्त' और 'बिरयानी' के मुरीद राज कपूर से लेकर ऋषि कपूर तक रहे। अपने इसी शौक को उन्होंने बिजनेस में बदला। उन्होंने 'Asha's' नाम से रेस्तरां की एक ग्लोबल चैन शुरू की। उनका पहला रेस्तरां दुबई में खुला, जिसके बाद कुवैत, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और अबू धाबी जैसे शहरों में भी इसे विस्तार मिला। वह अपने रेस्तरां के शेफ्स को खुद ट्रेनिंग देती थीं। ब्रिटिश बैंड के साथ गाया आखिरी गाना आशा भोसले की आवाज सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं थी, बल्कि इंटरनेशनल म्यूजिक वर्ल्ड में भी उनका उतना ही सम्मान था। मार्च 2026 में रिलीज हुई मशहूर ब्रिटिश वर्चुअल बैंड ‘गोरिल्लाज’ की नौवीं एल्बम ‘द माउंटेन’ (पर्वत) में उनका गाना शामिल है। "द शैडोई लाइट" नाम के इस ट्रैक को अब उनके शानदार करियर के आखिरी अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। इसमें उन्होंने ब्रिटिश आर्टिस्ट ग्रफ राइस और सरोद उस्ताद अमान-अयान अली बंगश के साथ काम किया था। गोरिल्लाज बैंड बनाने वाले डेमन अलबर्न असल में 70 के दशक के बॉलीवुड संगीत और आरडी बर्मन के बहुत बड़े फैन हैं। उन्होंने कई इंटरव्यू में आशा भोसले की आवाज को 'साइकडेलिक' और 'एक्सपेरिमेंटल' बताया था। यही वजह थी कि उन्होंने अपनी इस नई एल्बम को भारत में रिकॉर्ड किया। इस एल्बम में आशा ताई के अलावा अनुष्का शंकर ने भी साथ काम किया है। वहीं आशा अपने अंतिम वर्षों में म्यूजिक रियलिटी शोज में जज के रूप में और लाइव कॉन्सर्ट्स में सक्रिय रहीं। 2023 में भी उन्होंने अपने 90वें जन्मदिन पर दुबई में परफॉर्म किया था। उनकी आवाज में जो ताजगी 1950 में थी, वही 92 साल की उम्र तक बरकरार रही।
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