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'ईरान के साथ शर्तों पर नहीं हो सकता फैसला, ये सीख ले अमेरिका', पूर्व ईरानी विदेश मंत्री जरीफ

तेहरान, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। ईरान और अमेरिका के बीच घंटों चली बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलने के बाद प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है। दोनों पक्षों के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर मुहर लगी थी, जिसके बाद पाकिस्तान में यह बैठक हुई। वहीं ईरान के पूर्व विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने कहा कि कोई भी बातचीत शर्तों के आधार पर सफल नहीं हो सकती है।

ईरान के पूर्व विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने पूछा: “जानना चाहते हैं कि बातचीत सफल क्यों नहीं हुई?”

ईरानी नेता ने अमेरिका उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस कथन को दोहराया, जिसमें उन्होंने कहा था, “उन्होंने (ईरान ने) हमारी शर्तें न मानने का फैसला किया है।”

जरीफ ने लिखा, “कोई भी बातचीत कम से कम ईरान के साथ ‘हमारी/आपकी शर्तों’ के आधार पर सफल नहीं होगी। अमेरिका को सीखना चाहिए: आप ईरान पर शर्तें थोप नहीं सकते। सीखने में अभी भी देर नहीं हुई है।”

सरकारी न्यूज एजेंसी एसएनएन के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने कथित “जासूसी” के मामले में कम से कम 50 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस समूह पर सर्विस सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर समेत सेंसिटिव जगहों को शेयर करके अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर काम करने का आरोप था। एसएनएन ने कहा कि अधिकारियों ने इलेक्ट्रॉनिक्स, सैटेलाइट इक्विपमेंट और हथियार भी जब्त किए हैं।

ईरान ने हाल के झगड़े के बीच जासूसी के आरोप में दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया है। पिछले साल अमेरिका और इजरायल के साथ 12 दिन की लड़ाई के बाद भी कई गिरफ्तारियां हुई थीं।

हाल ही में एक बेहतर जासूसी कानून के तहत जासूसी के आरोपी लोगों को मौत की सजा और प्रॉपर्टी जब्त करने का प्रावधान है।

आईआरएनए न्यूज एजेंसी के मुताबिक, ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई से पूछा गया कि क्या डिप्लोमेसी खत्म हो गई है, तो उन्होंने जवाब दिया, “डिप्लोमेसी कभी खत्म नहीं होती।”

बगाई ने ईरानी मीडिया से कहा, “डिप्लोमैटिक सिस्टम देश के हितों को सुरक्षित रखने, उनकी रक्षा करने और उन्हें बचाने का एक टूल है। ईरान, पाकिस्तान और दोस्त और पड़ोसी देशों के बीच बातचीत जारी रहेगी।”

--आईएएनएस

केके/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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US-Iran Talks: शांति वार्ता के नाम पर पाकिस्तान की दोहरी चाल? जानें इस्लामाबाद टॉक से पाकिस्तान ने क्या पाया और क्या खोया?

इस हॉट टॉपिक को आगे बढ़ाने से पहले सबसे जरूरी जानकारी जो साझा की जानी चाहिए वह है शांति वार्ता की आड़ में पाकिस्तान की सऊदी अरब के पूर्वी क्षेत्र (जो ईरान की सीमा के करीब है) में अपने सैनिको की तैनाती। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने लगभग 13,000 सैनिकों के साथ फाइटर स्क्वाड्रन, ड्रोन और अन्य सपोर्ट सिस्टम तैनात किए हैं, जिससे ईरान की संभावित प्रतिक्रिया से निपटा जा सके.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में एक न्यूट्रल मध्यस्थ था? इससे पाकिस्तान को क्या मिला?

शांति वार्ता आयोजित करने के बदले आर्थिक लाभ की बात सामने आ रही है और देने वाला कोई और नहीं बल्कि अमेरिका है। अमेरिकी ने एक तरफ दुनिया को दिखाया की वह शांति के पक्ष में है, सीजफायर कर बातचीत की मेज पर आया, प्रतिनिधि के रूप में पाकिस्तान को आगे किया और अब बातचीत को डिरेल कर अगले हमले की जमीन तैयार कर चुका है। यानी जो अमेरिका मिनाब स्कूल हमले और हॉर्मूज से बैक फूट पर था वह शांति वार्ता को डिरेल कर फिर से वॉर का ग्राउंड गेन कर रहा है।

इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को गुडविल और कूटनीतिक महत्व के प्रति खुद को “शांति समर्थक” दिखाने का मौका मिला. इस तरह एक आतंकी देश ने अपनी बखूबी PR की. पाकिस्तान का यह पीआर सबसे ज्यादा सफल इस मायने में है कि यह छवि भविष्य में भारत के खिलाफ गतिविधियों को ढकने का माध्यम भी बन सकती है।

आंतरिक राजनीति में मुनीर और शाहबाज के फायदे:

इस पूरे घटनाक्रम से जनरल असीम मुनीर और सैन्य प्रतिष्ठान को सबसे ज्यादा लाभ मिला है, वहीं इमरान खान और उनके समर्थकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है. इमरान और उनकी पार्टी PTI की लोकप्रियता को इस पीआर एक्सरसाइज से प्रभावित किया जाएगा. इस तरह पाकिस्तान में “हाइब्रिड रेजीम” यानी सैन्य + राजनीतिक व्यवस्था और मजबूत होता देखा जाएगा.

बड़ा रणनीतिक संकेत, पाकिस्तान की भूमिका

ज्योपोलिटक्स में सबसे पहले GEO आता है यानी ज्योग्राफी और उसके बाद पॉलिटिक्स. पाकिस्तान का भौगोलिक महत्व  सत्ता में बैठे उसके नेता और सैन्य नेतृत्व बखूबी जानते हैं. नेतृत्व के लिए यह सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि सत्ता बनाए रखने की रणनीति भी है। एक तरफ ईरान दूसरी तरफ अमेरिका और तीसरी तरफ सऊदी को साधते हुए पाकिस्तान ने अपने जियो लोकेशन का एक एक फिर शानदार इस्तेमाल किया है।

यह घटनाक्रम दिखाता है कि पाकिस्तान एक साथ कूटनीतिक मध्यस्थ और सैन्य खिलाड़ी दोनों की भूमिका निभा रहा है. “शांति” की छवि और “रणनीतिक तैनाती” साथ-साथ चल रही हैं.

 

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