कनाडा का एंटी-हेट बिल, क्या भारतीय प्रवासियों को खालिस्तानी उग्रवाद से दिलाएगा सुरक्षा?
ओटावा, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। कनाडा के हालिया कानून, बिल सी-9, जिसे कॉम्बैटिंग हेट एक्ट (नफरत का मुकाबला करने वाला कानून) कहा जाता है, ने सीधे तौर पर उन घटनाओं पर फोकस किया है जिन्हें खालिस्तानी चरमपंथी बढ़ावा देते हैं। इन घटनाओं ने भारतीय प्रवासी समुदायों के बीच चिंता पैदा कर दी थी।
सोमवार को आई एक रिपोर्ट के अनुसार, इस कानून के तहत उन लोगों को डराना-धमकाना या उनके रास्ते में रुकावट डालना अब एक अपराध माना जाएगा, जो धार्मिक या सांस्कृतिक स्थलों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
इंडिया नैरेटिव के लिए लिखे लेख में वर्मा ने कहा कि हाल के वर्षों में कनाडा में भारतीय प्रवासी एक ऐसे माहौल का सामना कर रहे हैं, जो “तनावपूर्ण, दिखावटी और कई बार खुलकर शत्रुतापूर्ण” हो गया है। इसके पीछे उन्होंने कनाडा-स्थित खालिस्तानी उग्रवाद को प्रमुख कारण बताया।
वर्मा के अनुसार, जो गतिविधियां पहले राजनीतिक अभिव्यक्ति के सीमित दायरे में दिखाई देती थीं, वे अब कई मामलों में डराने-धमकाने, हिंसा के उकसावे और हेट स्पीच तक पहुंच चुकी हैं। यह न केवल भारत के प्रतीकों, बल्कि भारतीय राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले शख्सियतों को भी निशाना बना रही हैं।
उन्होंने लिखा कि हाल तक कनाडा की कानूनी व्यवस्था ऐसे मामलों में निर्णायक कार्रवाई करने में संघर्ष करती रही, क्योंकि यह प्रणाली मुख्यतः तब हस्तक्षेप करती है जब किसी बयान या कृत्य से स्पष्ट और प्रत्यक्ष नुकसान साबित होता है। लेकिन 2022 के बाद के घटनाक्रम बताते हैं कि आधुनिक दौर में डराने-धमकाने के तरीके हमेशा पारंपरिक कानूनी परिभाषाओं में फिट नहीं बैठते।
वर्मा ने बताया कि धमकी भरे पोस्टर, टारगेट प्रदर्शनों और धार्मिक स्थलों तक पहुंच में बाधा जैसे कृत्य एक “ग्रे जोन” बनाते हैं, जो असुरक्षा और दबाव का माहौल तो पैदा करते हैं, लेकिन कई बार कानूनी कार्रवाई के मानकों को पूरा नहीं करते।
इसी संदर्भ में उन्होंने बिल सी-9 को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, यह कानून केवल मौजूदा ढांचे का विस्तार नहीं, बल्कि इस बात की स्वीकारोक्ति है कि नुकसान की प्रकृति बदल चुकी है और कानून को भी उसके अनुसार विकसित होना होगा।
उन्होंने कहा कि यह कानून पूजा स्थलों तक पहुंच में बाधा को अपराध की श्रेणी में लाता है और प्रतीकात्मक घृणा (सिंबॉलिक हेट) को भी असुरक्षा पैदा करने वाले तत्व के रूप में मान्यता देता है। इससे यह संदेश जाता है कि सुरक्षा केवल शारीरिक हिंसा से बचाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बिना डर के सामुदायिक जीवन में भाग लेने का हक भी शामिल है।
हालांकि, वर्मा ने संतुलन की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कनाडा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मजबूत परंपरा है और प्रशासन के सामने चुनौती यह होगी कि वह कानून का इस्तेमाल सटीक तरीके से करे, ताकि वास्तविक घृणा के मामलों पर ही कार्रवाई हो और अनावश्यक रूप से व्यापक दायरा न बने।
खालिस्तानी उग्रवाद के बढ़ते खतरे का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ऐसे कई मामले देखे, जहां विरोध प्रदर्शन हिंसा और डराने-धमकाने की सीमा तक पहुंच गए। उन्होंने टोरंटो में एक नगर कीर्तन के दौरान इंदिरा गांधी की हत्या को दर्शाने वाले दृश्य को भी “चिंताजनक” बताया, जिसे इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रदर्शन के रूप में पेश किया गया।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारतीय उच्चायुक्त की तस्वीर पर नकली गोलियों के निशान वाले पोस्टर, भारतीय नेतृत्व के पुतलों का अपमानजनक प्रदर्शन और दूतावासों के पास आक्रामक प्रदर्शन एक ऐसे पैटर्न का हिस्सा हैं, जो सामान्य असहमति से आगे बढ़ चुका है।
वर्मा ने कहा कि इन घटनाओं का समग्र प्रभाव भारतीय प्रवासियों में असुरक्षा की भावना के रूप में सामने आया है। मंदिरों पर उग्रवादी संदेशों के साथ तोड़फोड़ की घटनाएं भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य उकसाना और दबाव बनाना है।
उन्होंने कहा कि कानून की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की जाए। उन्होंने चेतावनी दी, “ऐसा कानून जो सुरक्षा का वादा करे लेकिन उसे लागू न कर पाए, वह समुदाय की चिंता को कम करने के बजाय और बढ़ा सकता है।”
--आईएएनएस
केआर/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
गर्मियों में गुणकारी 'खसखस': ठंडक, ताजगी और एनर्जी ही नहीं पोषक तत्वों का भी खजाना
नई दिल्ली, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। गर्मियों में जब तेज धूप और लू शरीर को थका देती है, तब एक पुराना और असरदार घरेलू उपाय खसखस का शरबत याद आता है। छोटे-छोटे सफेद दानों से बना यह पेय न सिर्फ ठंडक पहुंचाता है, बल्कि ताकत और ताजगी भी देता है। दादी-नानी की रसोई में हमेशा मौजूद खसखस वाकई गर्मी के लिए अमृत समान है।
खसखस, जिसे वैज्ञानिक भाषा में पैपावर सोम्नीफेरम कहते हैं, हजारों सालों से हमारे खान-पान और आयुर्वेद में इस्तेमाल होता आ रहा है। आयुर्वेद में इसे पित्त दोष शांत करने वाली जड़ी-बूटी माना गया है। इसकी ठंडी प्रकृति शरीर की अतिरिक्त गर्मी को कम करती है।
आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार, गर्मी में बढ़े पित्त के कारण होने वाली पेट की जलन, पैरों में जलन और त्वचा की परेशानियों में खसखस का दूध या शरबत तुरंत आराम देता है। यह मन को शांत रखने में भी मदद करता है। खसखस पोषक तत्वों से भरपूर है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक और आयरन जैसे पोषक व महत्वपूर्ण तत्व अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे गर्मियों में अच्छी नींद आती है। यह मौसमी बीमारियों से बचाव करता है, हृदय के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद और फ्री रैडिकल्स के नुकसान से भी बचाता है।
गर्मियों में खसखस सबसे ज्यादा उपयोगी इसलिए है क्योंकि इसकी ठंडी तासीर शरीर का तापमान नियंत्रित रखती है और डिहाइड्रेशन से बचाती है। खसखस का पानी पेट के एसिड को संतुलित करता है, जिससे एसिडिटी और जलन जैसी समस्याएं कम होती हैं। फाइबर से भरपूर होने के कारण यह पाचन सुधारता है और कब्ज की शिकायत दूर करता है।
यही नहीं, खसखस का तेल जोड़ों के दर्द और सूजन कम करने में भी कारगर है। इसे दूध के साथ पीसकर लगाने से गर्मी की वजह से होने वाले मुंहासे और जलन में राहत मिलती है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण त्वचा की सूजन को शांत करते हैं। आधुनिक शोध भी खसखस के इन पारंपरिक फायदों की पुष्टि करते हैं। यह शरीर से विषाक्त पदार्थ निकालने में मदद करता है, रक्त को शुद्ध रखता है और मानसिक तनाव घटाता है।
गर्मियों में रोजाना खसखस का सेवन शरीर को ठंडा, स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखता है। हालांकि, खसखस का सेवन सीमित मात्रा में करें। किसी तरह की एलर्जी की शिकायत हो तो पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
--आईएएनएस
एमटी/एबीएम
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