राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बंगाल दौरे के दौरान जो कुछ हुआ, उस पर उनकी तीखी नाराजगी, मालदा की शर्मनाक घटना पर उच्चतम न्यायालय की कड़ी और असहज कर देने वाली टिप्पणियां और कूच बिहार की जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रचंड प्रहार यह साबित करने के लिए काफी है कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। देखा जाये तो हालात इतने बदतर हैं कि देश की संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति और न्याय के सर्वोच्च मंदिर उच्चतम न्यायालय की चिंता एक ही दिशा में इशारा कर रही है कि पश्चिम बंगाल आज अराजकता और भय के माहौल में जी रहा है।
हम आपको याद दिला दें कि पिछले माह बंगाल में कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की नाराजगी केवल एक प्रोटोकॉल का मुद्दा नहीं थी, बल्कि यह उस प्रशासनिक अव्यवस्था का प्रतीक थी जो राज्य में गहराई तक पैठ बना चुकी है। उस घटना ने दर्शाया था कि शासन तंत्र किस हद तक असंवेदनशील और मनमानी का शिकार हो चुका है। जब देश की प्रथम नागरिक के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो आम नागरिक की सुरक्षा और सम्मान की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
वहीं मालदा की घटना ने तो इस अराजकता को और भी भयावह रूप में उजागर कर दिया। सात न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक घेर कर रखना, उन्हें भोजन और पानी तक नहीं मिलने देना और प्रशासन का पूरी तरह निष्क्रिय बने रहना, यह पूरे सिस्टम के पतन की कहानी है। उच्चतम न्यायालय ने इसे राज्य प्रशासन की पूर्ण विफलता बताया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह न्यायिक व्यवस्था को डराने का सुनियोजित प्रयास है। न्यायालय ने सीबीआई या एनआईए से जांच कराने का निर्देश देकर यह साबित कर दिया कि राज्य सरकार पर भरोसा करने की स्थिति नहीं बची है।
उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कूच बिहार की रैली में इस घटना को तृणमूल कांग्रेस का महा जंगलराज करार देते हुए बिल्कुल सही तस्वीर सामने रखी। उन्होंने साफ कहा कि यह चुनाव भय और भरोसे के बीच की लड़ाई है। एक तरफ वह सरकार है जिसने बंगाल को हिंसा, भ्रष्टाचार और असुरक्षा में धकेल दिया है, और दूसरी तरफ वह संकल्प है जो कानून का राज स्थापित करने की बात करता है। प्रधानमंत्री का यह आश्वासन कि इस बार भय भागेगा और हर अपराध का हिसाब होगा, बंगाल की जनता के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरा है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने भी इस बिगड़ती स्थिति को गंभीरता से लेते हुए अभूतपूर्व कदम उठाए हैं। केंद्रीय बलों की भारी तैनाती, संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा का कड़ा बंदोबस्त, न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और यहां तक कि चुनाव के बाद भी केंद्रीय बलों को तैनात रखने का निर्णय यह दर्शाता है कि आयोग किसी भी कीमत पर निष्पक्ष और भयमुक्त चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है। लगभग दो हजार से ढाई हजार कंपनियों की तैनाती, ईवीएम और मतगणना केंद्रों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त बल और आपराधिक तत्वों पर सख्त कार्रवाई, यह सब इस बात का प्रमाण है कि इस बार का चुनाव लोकतंत्र की असली परीक्षा है।
इतना ही नहीं, निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों को दी जा रही पुलिस सुरक्षा की समीक्षा के आदेश देकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि सत्ता का दुरुपयोग अब नहीं चलेगा। अपराधियों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई, यहां तक कि थाना प्रभारी का निलंबन, यह दिखाता है कि अब जवाबदेही तय होगी और हर गलती का हिसाब लिया जाएगा।
देखा जाये तो आज बंगाल की जनता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां उसे तय करना है कि वह भय और हिंसा के इस चक्र को जारी रखेगी या बदलाव का रास्ता चुनेगी। यह चुनाव केवल सरकार बदलने का नहीं बल्कि व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का अवसर है। हर मतदाता का वोट इस अराजकता के खिलाफ एक मजबूत हथियार बन सकता है।
समय आ गया है कि बंगाल अपनी खोई हुई पहचान को वापस हासिल करे। वह बंगाल जो कभी विकास, संस्कृति और प्रगति का प्रतीक था, आज भय और असुरक्षा का पर्याय बन गया है। लेकिन बदलाव संभव है, और वह बदलाव जनता के एकजुट संकल्प से ही आएगा।
प्रधानमंत्री का यह वादा कि चुनाव परिणाम के बाद कानून अपना काम करेगा और हर गुनाह का हिसाब होगा, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि एक मजबूत संदेश है कि अब अन्याय का अंत होगा। बंगाल की जनता को इस अवसर को पहचानना होगा और अपने मताधिकार का उपयोग कर उस बदलाव की नींव रखनी होगी जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बनाए।
कुल मिलाकर देखें तो यह चुनाव बंगाल के आत्मसम्मान की लड़ाई है, यह लोकतंत्र की प्रतिष्ठा की लड़ाई है और यह उस विश्वास की लड़ाई है जो हर नागरिक को एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज में जीने का अधिकार देता है। अब फैसला जनता के हाथ में है कि वह भय के साथ जीना चाहती है या भरोसे के साथ आगे बढ़ना चाहती है।
-नीरज कुमार दुबे
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