भारत की विदेश नीति में पूर्वी यूरोप का महत्व लगातार बढ़ रहा है और इसी दिशा में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की 19 से 25 जुलाई 2026 तक मोल्दोवा, उत्तर मैसेडोनिया और रोमानिया की राजकीय यात्रा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के रूप में सामने आई है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने आज राष्ट्रपति की तीन देशों की यात्रा की घोषणा की। यह यात्रा भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह यूरोप में अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक प्रभाव का विस्तार करना चाहता है। तीनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के निमंत्रण पर होने वाली यह यात्रा भारत के लिए इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि मोल्दोवा और उत्तर मैसेडोनिया की यह किसी भारतीय राष्ट्रपति की पहली यात्रा होगी, जबकि रोमानिया में तीन दशक से अधिक समय बाद किसी भारतीय राष्ट्रपति का दौरा हो रहा है।
राष्ट्रपति मुर्मु मोल्दोवा में राष्ट्रपति माइया सांडू के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगी, संसद अध्यक्ष इगोर ग्रोसू से मुलाकात करेंगी, मोल्दोवा-भारत संसदीय मैत्री समूह से संवाद करेंगी, भारत-मोल्दोवा बिजनेस फोरम को संबोधित करेंगी तथा भारतीय समुदाय से भी मिलेंगी। इसके बाद उत्तर मैसेडोनिया में राष्ट्रपति गोरदाना सिल्यानोव्स्का-दावकोवा, प्रधानमंत्री ह्रिस्टियान मिकोस्की और संसद नेतृत्व के साथ वार्ता होगी। राष्ट्रपति वहां संसद को भी संबोधित करेंगी और भारत-उत्तर मैसेडोनिया बिजनेस फोरम में भाग लेंगी। यात्रा के अंतिम चरण में रोमानिया में राष्ट्रपति निकुशोर दान, अंतरिम प्रधानमंत्री इलीए बोलोजान, सीनेट एवं प्रतिनिधि सभा के शीर्ष नेतृत्व तथा संसदीय मैत्री समूह के साथ बैठकें होंगी। राष्ट्रपति भारत-रोमानिया बिजनेस फोरम को भी संबोधित करेंगी और भारतीय समुदाय से संवाद करेंगी।
देखा जाये तो यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप वैश्विक भू-राजनीति का प्रमुख केंद्र बन गया है। भारत इस क्षेत्र में संतुलित और बहुआयामी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। मोल्दोवा और रोमानिया यूक्रेन के पड़ोसी देश हैं, जबकि उत्तर मैसेडोनिया बाल्कन क्षेत्र में यूरो-अटलांटिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इन देशों के साथ संबंधों का विस्तार भारत को यूरोप में अपनी रणनीतिक पहुंच मजबूत करने का अवसर देगा।
रोमानिया यूरोपीय संघ का प्रभावशाली सदस्य है और भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की दिशा में हो रही प्रगति के बीच उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दूसरी ओर, उत्तर मैसेडोनिया यूरोपीय संघ की सदस्यता का उम्मीदवार है और बाल्कन क्षेत्र में भारत के लिए प्रवेश द्वार की भूमिका निभा सकता है। मोल्दोवा कृषि, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संपर्क और डिजिटल परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए नई संभावनाएं प्रस्तुत करता है।
इस यात्रा का एक बड़ा रणनीतिक संदेश यह भी है कि भारत केवल पश्चिमी यूरोप तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि पूर्वी यूरोप के उभरते साझेदारों के साथ भी दीर्घकालिक संबंध स्थापित करने की नीति पर काम कर रहा है। रक्षा, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा, आपूर्ति श्रृंखला, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा मानव संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की संभावना है। इससे भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ आधारित विदेश नीति को भी नई मजबूती मिलेगी।
भारत-मोल्दोवा संबंध
भारत ने 1991 में मोल्दोवा को मान्यता दी और 1992 में राजनयिक संबंध स्थापित हुए। दोनों देशों के संबंध सदैव सौहार्दपूर्ण रहे हैं तथा बहुपक्षीय मंचों पर मोल्दोवा ने भारत का समर्थन किया है। वर्ष 1993 में छह महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें व्यापार, आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग शामिल हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ा है और भारतीय निर्यात में दवाइयां, रसायन, मशीनरी, मोबाइल उपकरण, वस्त्र और इंजीनियरिंग उत्पाद प्रमुख हैं। भारतीय कंपनियां ऊर्जा अवसंरचना परियोजनाओं में भी सक्रिय हैं। कोविड-19 महामारी, सूखा, बाढ़ तथा यूक्रेन संकट के दौरान भारत ने मानवीय सहायता प्रदान कर भरोसेमंद साझेदार होने का परिचय दिया। लगभग 900 भारतीय, जिनमें अधिकांश मेडिकल छात्र हैं, मोल्दोवा में रह रहे हैं। योग, हिंदी, भारतीय संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में भी सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। राष्ट्रपति की यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदलने की दिशा में मील का पत्थर मानी जा रही है।
भारत-उत्तर मैसेडोनिया संबंध
भारत और उत्तर मैसेडोनिया के संबंध मैत्रीपूर्ण रहे हैं तथा दोनों देशों के बीच कोई द्विपक्षीय विवाद नहीं है। भारत ने मैसेडोनिया की अंतरराष्ट्रीय मान्यता के शुरुआती दौर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय यात्राओं में तेजी आई है। 2023 में विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी और उत्तर मैसेडोनिया के विदेश मंत्री बुयार उस्मानी की यात्राओं ने संबंधों को नई गति दी। दोनों देशों के बीच व्यापार में रसायन, इस्पात, वस्त्र, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटो कंपोनेंट प्रमुख हैं। उत्तर मैसेडोनिया भारतीय निवेशकों के लिए कम कर व्यवस्था और यूरोपीय बाजार तक आसान पहुंच के कारण आकर्षक गंतव्य बनकर उभरा है। आईटीईसी, योग, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से दोनों देशों के संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। राष्ट्रपति की यात्रा आर्थिक सहयोग को नई दिशा देने के साथ-साथ बाल्कन क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को भी मजबूत करेगी।
भारत-रोमानिया संबंध
भारत और रोमानिया के बीच 1948 से राजनयिक संबंध हैं और 2023 में दोनों देशों ने 75 वर्ष पूरे किए। दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन करते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में विदेश मंत्रियों की नियमित मुलाकातों और व्यापक साझेदारी संबंधी संयुक्त घोषणा ने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई दी है। व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। भारत से पेट्रोलियम उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, दवाइयां, रसायन और वस्त्र निर्यात होते हैं, जबकि रोमानिया से मशीनरी, इस्पात, ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और औद्योगिक उत्पाद आयात किए जाते हैं। विप्रो, इंफोसिस, एचसीएल, सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज़ और जेनपैक जैसी भारतीय कंपनियां वहां सक्रिय हैं। लगभग नौ हजार भारतीय समुदाय, जिनमें बड़ी संख्या में श्रमिक शामिल हैं, रोमानिया में रह रहे हैं। सांस्कृतिक सहयोग, योग, आयुर्वेद, शिक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में रोमानिया की भागीदारी दोनों देशों की बढ़ती निकटता का प्रमाण है।
बहरहाल, स्पष्ट है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की यह तीन देशों की यात्रा केवल राजकीय शिष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती वैश्विक रणनीति, यूरोप में बढ़ते प्रभाव और नए आर्थिक-सामरिक साझेदारों की तलाश का सशक्त संकेत है। यदि प्रस्तावित सहयोग योजनाएं ठोस परिणामों में बदलती हैं, तो यह यात्रा पूर्वी यूरोप में भारत की दीर्घकालिक उपस्थिति को नई दिशा देने वाली ऐतिहासिक पहल सिद्ध हो सकती है।
-नीरज कुमार दुबे
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अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस (17 जुलाई) केवल न्याय की महत्ता का स्मरण कराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह स्वयं से एक कठिन प्रश्न पूछने का भी दिन है—क्या वर्षों बाद मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है? वाकई आज दुनिया के अनेक देशों की तरह भारत में भी करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। अनेक वादियों की पूरी उम्र अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते बीत जाती है। कई मामलों में निर्णय तब आता है जब पीड़ित या आरोपी इस दुनिया में ही नहीं रहते। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है और इस खास दिवस पर प्रासंगिक भी।
आखिर हमें यह समझना ही होगा कि 21वीं सदी के भारत की न्यायिक व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि उसने कितने ऐतिहासिक फैसले दिए, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि उसने आम नागरिक को कितनी जल्दी, कितनी निष्पक्षता से और कितनी कम लागत में न्याय उपलब्ध कराया। इसलिए भारत का आदर्श लक्ष्य केवल 'फास्ट जस्टिस' नहीं, बल्कि 'फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस' होना चाहिए। यही विकसित भारत की न्यायिक पहचान होगी।
कानूनी मामलों के जानकारों के मुताबिक, दीर्घसूत्री न्याय के पीछे न्यायाधीशों की कमी, बार-बार स्थगन, जटिल कानूनी प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त न्यायिक ढांचा और बढ़ते मुकदमों जैसी कई वजहें हैं। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विलंबित न्याय केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी बन जाता है। इससे आम नागरिक का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है और कई बार लोग वैकल्पिक तथा गैर-कानूनी रास्तों की ओर भी आकर्षित हो सकते हैं।
इस अवसर पर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है—क्या न्याय केवल सही निर्णय देने का नाम है, या सही समय पर सही निर्णय देना ही वास्तविक न्याय है? यदि न्याय समय पर नहीं मिलता, तो उसका नैतिक और व्यावहारिक महत्व दोनों कम हो जाते हैं। इसलिए न्यायिक सुधार, तकनीक का बेहतर उपयोग, न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) को बढ़ावा और अनावश्यक स्थगनों पर नियंत्रण जैसी पहलें अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं।
लिहाजा, अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि न्याय केवल निष्पक्ष ही नहीं, त्वरित, सुलभ और प्रभावी भी होना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत केवल कानून के शासन में नहीं, बल्कि समय पर मिलने वाले न्याय में निहित होती है।
# सवाल है कि अपना भारत इस कसौटी पर कहां खड़ा है?
भारत की स्थिति मिश्रित है। एक ओर भारतीय न्यायपालिका विश्व की सबसे स्वतंत्र और सम्मानित न्याय प्रणालियों में गिनी जाती है, जिसने अनेक ऐतिहासिक फैसलों से संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा की है। दूसरी ओर, त्वरित न्याय के पैमाने पर भारत अब भी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुधांशु चौधरी के अनुसार, मुख्य तस्वीर इस प्रकार है:
एक, लंबित मुकदमे: देशभर की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। इनमें बड़ी संख्या जिला न्यायालयों में है, जबकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबित मामलों का बोझ बना हुआ है।
दो, न्याय मिलने में लंबा समय: भूमि विवाद, दीवानी मुकदमे, पारिवारिक विवाद और कई आपराधिक मामलों में अंतिम निर्णय आने में वर्षों, कभी-कभी दशकों तक लग जाते हैं।
तीन, अंडरट्रायल कैदी: भारतीय जेलों में बड़ी संख्या ऐसे कैदियों की है जिनका मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है। यह "शीघ्र न्याय" की कसौटी पर एक गंभीर चुनौती है।
चार, सुधार के प्रयास: ई-कोर्ट परियोजना, वर्चुअल सुनवाई, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG), फास्ट ट्रैक कोर्ट, लोक अदालतें और मध्यस्थता (Mediation) जैसे कदम उठाए गए हैं, जिनसे कुछ क्षेत्रों में सुधार भी हुआ है।
इसलिए सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या भारत में न्यायालयों का उद्देश्य केवल न्याय देना है, या समय पर न्याय देना भी उतना ही आवश्यक है? जब एक पीढ़ी मुकदमा दायर करे और दूसरी पीढ़ी फैसला सुने, तो लोकतंत्र में न्याय की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
# सुलगता सवाल: न्याय में गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए न्याय की गति कैसे बढ़ाई जाए?
आज अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि "न्याय में गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए न्याय की गति कैसे बढ़ाई जाए?" यही वह कसौटी है, जिस पर आने वाले वर्षों में भारतीय न्यायपालिका की सफलता का वास्तविक आकलन होगा।
चूंकि, यह भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सुधारात्मक प्रश्न है। इसलिए इसका उत्तर केवल अधिक न्यायाधीश नियुक्त करने में नहीं, बल्कि व्यापक न्यायिक सुधारों में निहित है।
पहला, न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या बढ़े: जनसंख्या और मुकदमों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त न्यायाधीश तथा आधुनिक न्यायालय स्थापित किए जाएँ।
दूसरा, समयबद्ध सुनवाई की संस्कृति विकसित हो: अनावश्यक स्थगनों (Adjournments) पर अंकुश लगे और प्रत्येक मुकदमे के लिए यथासंभव समय-सीमा निर्धारित की जाए।
तीसरा, तकनीक का व्यापक उपयोग: ई-फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, एआई आधारित केस मैनेजमेंट और वर्चुअल सुनवाई का विस्तार किया जाए ताकि प्रशासनिक देरी कम हो।
चौथा, वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा: लोक अदालत, मध्यस्थता (Mediation) और पंचाट (Arbitration) के माध्यम से छोटे और दीवानी विवाद अदालतों के बाहर ही सुलझाए जाएँ।
पांचवां, रिक्त पदों की शीघ्र नियुक्ति: उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबे समय तक रिक्त रहने वाले न्यायिक पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए।
छठा, न्याय की गुणवत्ता से समझौता नहीं: त्वरित न्याय का अर्थ जल्दबाजी में निर्णय नहीं होना चाहिए। प्रत्येक पक्ष को सुनने, साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच और कारणयुक्त निर्णय की परंपरा बनी रहनी चाहिए।
सातवां, पुलिस और अभियोजन तंत्र में सुधार: यदि जांच समयबद्ध, वैज्ञानिक और निष्पक्ष होगी, तो अदालतों में मुकदमों का निपटारा भी अधिक प्रभावी होगा।
निष्कर्षतः यह कहा जाना चाहिए कि भारत के लिए आदर्श लक्ष्य केवल "फास्ट जस्टिस" नहीं, बल्कि "फेयर, फास्ट और अफोर्डेबल जस्टिस" होना चाहिए। इसी संदर्भ में एक विचारोत्तेजक प्रश्न उठता है— "क्या लोकतंत्र में न्यायालयों की सफलता का पैमाना केवल ऐतिहासिक फैसले हैं, या यह भी कि एक सामान्य नागरिक को उसके जीवनकाल में समय पर न्याय मिल जाए?" यदि इसका उत्तर "हाँ" है, तो न्यायिक सुधार अब भविष्य का एजेंडा नहीं, बल्कि वर्तमान की अनिवार्य आवश्यकता है।
चूंकि यह विचार एक नीति-वाक्य (Policy Statement) है, इसलिए इसे और अधिक प्रभावशाली ढंग से लागू करने की दरकार है। निःसन्देह "भारत का लक्ष्य केवल 'फास्ट जस्टिस' (शीघ्र न्याय) नहीं, बल्कि 'फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस' (निष्पक्ष, त्वरित और सुलभ न्याय) होना चाहिए। क्योंकि न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर मिले, सभी के लिए समान हो और उसकी लागत इतनी न हो कि एक सामान्य नागरिक न्याय मांगने से ही पीछे हट जाए।"
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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