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अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर दीर्घसूत्री न्याय की विडंबना का यक्ष प्रश्न

अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस (17 जुलाई) केवल न्याय की महत्ता का स्मरण कराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह स्वयं से एक कठिन प्रश्न पूछने का भी दिन है—क्या वर्षों बाद मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है? वाकई आज दुनिया के अनेक देशों की तरह भारत में भी करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। अनेक वादियों की पूरी उम्र अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते बीत जाती है। कई मामलों में निर्णय तब आता है जब पीड़ित या आरोपी इस दुनिया में ही नहीं रहते। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है और इस खास दिवस पर प्रासंगिक भी।

आखिर हमें यह समझना ही होगा कि 21वीं सदी के भारत की न्यायिक व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि उसने कितने ऐतिहासिक फैसले दिए, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि उसने आम नागरिक को कितनी जल्दी, कितनी निष्पक्षता से और कितनी कम लागत में न्याय उपलब्ध कराया। इसलिए भारत का आदर्श लक्ष्य केवल 'फास्ट जस्टिस' नहीं, बल्कि 'फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस' होना चाहिए। यही विकसित भारत की न्यायिक पहचान होगी।

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कानूनी मामलों के जानकारों के मुताबिक, दीर्घसूत्री न्याय के पीछे न्यायाधीशों की कमी, बार-बार स्थगन, जटिल कानूनी प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त न्यायिक ढांचा और बढ़ते मुकदमों जैसी कई वजहें हैं। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विलंबित न्याय केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी बन जाता है। इससे आम नागरिक का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है और कई बार लोग वैकल्पिक तथा गैर-कानूनी रास्तों की ओर भी आकर्षित हो सकते हैं।

इस अवसर पर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है—क्या न्याय केवल सही निर्णय देने का नाम है, या सही समय पर सही निर्णय देना ही वास्तविक न्याय है? यदि न्याय समय पर नहीं मिलता, तो उसका नैतिक और व्यावहारिक महत्व दोनों कम हो जाते हैं। इसलिए न्यायिक सुधार, तकनीक का बेहतर उपयोग, न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) को बढ़ावा और अनावश्यक स्थगनों पर नियंत्रण जैसी पहलें अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं।

लिहाजा, अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि न्याय केवल निष्पक्ष ही नहीं, त्वरित, सुलभ और प्रभावी भी होना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत केवल कानून के शासन में नहीं, बल्कि समय पर मिलने वाले न्याय में निहित होती है।

# सवाल है कि अपना भारत इस कसौटी पर कहां खड़ा है?
भारत की स्थिति मिश्रित है। एक ओर भारतीय न्यायपालिका विश्व की सबसे स्वतंत्र और सम्मानित न्याय प्रणालियों में गिनी जाती है, जिसने अनेक ऐतिहासिक फैसलों से संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा की है। दूसरी ओर, त्वरित न्याय के पैमाने पर भारत अब भी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुधांशु चौधरी के अनुसार, मुख्य तस्वीर इस प्रकार है:

एक, लंबित मुकदमे: देशभर की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। इनमें बड़ी संख्या जिला न्यायालयों में है, जबकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबित मामलों का बोझ बना हुआ है।

दो, न्याय मिलने में लंबा समय: भूमि विवाद, दीवानी मुकदमे, पारिवारिक विवाद और कई आपराधिक मामलों में अंतिम निर्णय आने में वर्षों, कभी-कभी दशकों तक लग जाते हैं।

तीन, अंडरट्रायल कैदी: भारतीय जेलों में बड़ी संख्या ऐसे कैदियों की है जिनका मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है। यह "शीघ्र न्याय" की कसौटी पर एक गंभीर चुनौती है।

चार, सुधार के प्रयास: ई-कोर्ट परियोजना, वर्चुअल सुनवाई, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG), फास्ट ट्रैक कोर्ट, लोक अदालतें और मध्यस्थता (Mediation) जैसे कदम उठाए गए हैं, जिनसे कुछ क्षेत्रों में सुधार भी हुआ है।

इसलिए सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या भारत में न्यायालयों का उद्देश्य केवल न्याय देना है, या समय पर न्याय देना भी उतना ही आवश्यक है? जब एक पीढ़ी मुकदमा दायर करे और दूसरी पीढ़ी फैसला सुने, तो लोकतंत्र में न्याय की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। 

# सुलगता सवाल: न्याय में गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए न्याय की गति कैसे बढ़ाई जाए?

आज अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि "न्याय में गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए न्याय की गति कैसे बढ़ाई जाए?" यही वह कसौटी है, जिस पर आने वाले वर्षों में भारतीय न्यायपालिका की सफलता का वास्तविक आकलन होगा।
चूंकि, यह भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सुधारात्मक प्रश्न है। इसलिए इसका उत्तर केवल अधिक न्यायाधीश नियुक्त करने में नहीं, बल्कि व्यापक न्यायिक सुधारों में निहित है।

पहला, न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या बढ़े: जनसंख्या और मुकदमों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त न्यायाधीश तथा आधुनिक न्यायालय स्थापित किए जाएँ।

दूसरा, समयबद्ध सुनवाई की संस्कृति विकसित हो: अनावश्यक स्थगनों (Adjournments) पर अंकुश लगे और प्रत्येक मुकदमे के लिए यथासंभव समय-सीमा निर्धारित की जाए।

तीसरा, तकनीक का व्यापक उपयोग: ई-फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, एआई आधारित केस मैनेजमेंट और वर्चुअल सुनवाई का विस्तार किया जाए ताकि प्रशासनिक देरी कम हो।

चौथा, वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा: लोक अदालत, मध्यस्थता (Mediation) और पंचाट (Arbitration) के माध्यम से छोटे और दीवानी विवाद अदालतों के बाहर ही सुलझाए जाएँ।

पांचवां, रिक्त पदों की शीघ्र नियुक्ति: उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबे समय तक रिक्त रहने वाले न्यायिक पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए।

छठा, न्याय की गुणवत्ता से समझौता नहीं: त्वरित न्याय का अर्थ जल्दबाजी में निर्णय नहीं होना चाहिए। प्रत्येक पक्ष को सुनने, साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच और कारणयुक्त निर्णय की परंपरा बनी रहनी चाहिए।

सातवां, पुलिस और अभियोजन तंत्र में सुधार: यदि जांच समयबद्ध, वैज्ञानिक और निष्पक्ष होगी, तो अदालतों में मुकदमों का निपटारा भी अधिक प्रभावी होगा।

निष्कर्षतः यह कहा जाना चाहिए कि भारत के लिए आदर्श लक्ष्य केवल "फास्ट जस्टिस" नहीं, बल्कि "फेयर, फास्ट और अफोर्डेबल जस्टिस" होना चाहिए। इसी संदर्भ में एक विचारोत्तेजक प्रश्न उठता है— "क्या लोकतंत्र में न्यायालयों की सफलता का पैमाना केवल ऐतिहासिक फैसले हैं, या यह भी कि एक सामान्य नागरिक को उसके जीवनकाल में समय पर न्याय मिल जाए?" यदि इसका उत्तर "हाँ" है, तो न्यायिक सुधार अब भविष्य का एजेंडा नहीं, बल्कि वर्तमान की अनिवार्य आवश्यकता है।

चूंकि यह विचार एक नीति-वाक्य (Policy Statement) है,  इसलिए इसे और अधिक प्रभावशाली ढंग से लागू करने की दरकार है। निःसन्देह "भारत का लक्ष्य केवल 'फास्ट जस्टिस' (शीघ्र न्याय) नहीं, बल्कि 'फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस' (निष्पक्ष, त्वरित और सुलभ न्याय) होना चाहिए। क्योंकि न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर मिले, सभी के लिए समान हो और उसकी लागत इतनी न हो कि एक सामान्य नागरिक न्याय मांगने से ही पीछे हट जाए।"

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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