आज भड़ली नवमी है, यह व्रत आषाढ़ मास की नवमी तिथि को रखा जाता है। इसे भड़रिया नवमी के नाम से जाना जाता है। इस तिथि को अक्षय तृतीया के समान पुण्य फलदायी माना जाता है। इस तिथि पर किए गए शुभ कार्यों में सफलता, समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
जानें भड़ली नवमी के बारे में रोचक बातें
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भड़ली नवमी कहा जाता है। भड़ली नवमी को भड़रिया नवमी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में भड़रिया नवमी का विशेष महत्व बताया गया है। भड़ली नवमी को अक्षय तृतीया के समान ही पुण्य फलदायी माना गया है। भड़ली नवमी का दिन इसलिए भी खास होता है क्योंकि इसके ठीक दो दिन बाद यानी 25 जुलाई 2026 से 'चातुर्मास' शुरू हो जाते हैं। इसके बाद चार महीनों के लिए सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है।
जानें भड़ली नवमी का शुभ मुहूर्त
हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की शुरुआत 22 जुलाई को सुबह में 5 बजकर 16 मिनट पर होगा। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 23 जुलाई को सुबह 7 बजकर 3 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि को देखते हुए भड़ली नवमी का व्रत 22 जुलाई को रखा जाएगा।
हिन्दू धर्म में भड़ली नवमी का है खास महत्व
धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस लोगों के विवाह के लिए कोई शुभ मुहूर्त नहीं निकलता है उनका विवाह इस दिन किया सकता है। भड़ली नवमी के बाद चातुमास लग जाता है जिसके बाद अगले 4-5 महीनें तक कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किए जाते है। ऐसा कहा जा सकता है कोई भी मांगलिक कार्य करने के लिए यह तीथि शुभ होता है। धार्मिक मान्यता है कि देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार माह की निद्रा के बाद जागृत होते हैं। तभी मांगलिक कार्य किए जाते है।
इसलिए खास है भड़ली नवमी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भड़ली नवमी को अबूझ मुहूर्त कहा जाता है। 'अबूझ मुहूर्त' का अर्थ ऐसे शुभ समय से है, जिसमें पूरे दिन में कभी भी किसी भी मुहूर्त में शुभ कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन ग्रह-नक्षत्रों का प्रभाव मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यों की शुरुआत इसी तिथि पर करना पसंद करते हैं। देवशयनी एकादशी से पहले आने वाली भडल्या नवमी को अबुझ मुहूर्त माना जाता है यानी इस दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या नए काम की शुरुआत जैसे शुभ काम बिना मुहूर्त देखे किया जा सकते हैं। अभी आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि चल रही है, इस नवरात्रि की अंतिम भड़ली नवमी रहती है। इस नवमी पर गणेश जी, शिव जी और देवी दुर्गा की विशेष पूजा करनी चाहिए। जरूरतमंद लोगों को धन, अनाज, छाता, जूते-चप्पल, कपड़े का दान करना चाहिए।
भड़ली नवमी से जुड़ी पौराणिक कथा भी है खास
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भड़ली नवमी का सम्बन्ध जगत के पालनकर्ता श्री विष्णु से है। भड़ली नवमी के ठीक दो दिन बाद यानी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। सनातन धर्म में, विवाह जैसे मांगलिक कार्य भगवान विष्णु की साक्षी और आशीर्वाद के बिना पूर्ण नहीं माने जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी के बाद चातुर्मास शुरू होने पर देवता सो जाते हैं और अगले 4 महीनों तक (देवउठनी एकादशी तक) कोई भी शादी-ब्याह या शुभ संस्कार संपन्न नहीं होते हैं। भड़ली नवमी वह आखिरी दिन होती है, जब भगवान विष्णु के शयन में जाने से पहले भक्त उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। इस दिन गुप्त नवरात्र का समापन भी होता है, इसलिए देवी दुर्गा और भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों को सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है। यह दिन उन लोगों के लिए विशेष वरदान समान है जिनके विवाह में कोई अड़चन आ रही हो या कोई अन्य शुभ मुहूर्त न मिल रहा हो।
शुभ कार्यों के लिए इसलिए चुनी जाती है भड़ली नवमी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भड़ली नवमी सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय का शुभारंभ, संपत्ति खरीदना, धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, नामकरण और अन्य मांगलिक कार्य करना शुभ माना जाता है। पंडितों के अनुसार इस दिन शुरू किए गए कार्यों में आने वाली बाधाएं कम होती हैं और सफलता की संभावना बढ़ती है।
भड़ली नवमी पर रखें इन बातों का ध्यान
पंडितों के अनुसार भड़ली नवमी का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन भगवान विष्णु और देवी दुर्गा की पूजा जरूरी करें। इस दिन परिवार में या दूर की रिश्तेदारी में भी शोक हो जाए, तो कोई भी शुभ काम टाल दें। भड़ली नवमी को अत्यंत शुभ तिथि मानी जाती है, फिर भी किसी बड़े धार्मिक या पारिवारिक आयोजन से पहले अपनी पारिवारिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं पर जरूर विचार कर लें।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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पूरी दुनिया में मौसम के तेजी से बिगड़ते मिजाज के कारण विभिन्न देशों में प्रकृति की मार अब स्पष्ट नजर आने लगी है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही परिणाम है कि अब हर साल देश के कई हिस्से भारी बारिश के कारण बाढ़ की वजह से त्राहि-त्राहि करते नजर आते हैं जबकि कई हिस्से मानसून के दौरान भी पर्याप्त बारिश के लिए तरसते रह जाते हैं। इस वर्ष भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। दुनिया के कई ठंडे इलाके अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण तपने लगे हैं तो कई सूखे इलाके बाढ़ से त्रस्त हैं, जंगल झुलस रहे हैं। बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन और मौसम चक्र में आते बदलाव के कारण पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के अलावा जीव-जंतुओं की कई प्रजातियों के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पर्यावरण के तेजी से बदलते इस दौर में वैश्विक स्तर पर लोगों का ध्यान इन समस्याओं की ओर आकृष्ट करने के लिए ही प्रतिवर्ष 28 जुलाई को ‘विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस’ मनाया जाता है, जिसके माध्यम से वातावरण में हो रहे व्यापक बदलावों के चलते लगातार विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही जीव जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। विश्वभर में आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को जागरूक करने के लिहाज से आज के समय में प्रकृति संरक्षण दिवस की महत्ता बढ़ गई है।
2020 में कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन के दौर में पूरी दुनिया ने पहली बार प्रकृति को खुलकर मुस्कराते देखा था क्योंकि तब औद्योगिक इकाईयां, हवाई व रेल यात्राएं, बस यात्रा तथा निजी वाहनों का आवागमन बंद होने से हर तरह के प्रदूषण का स्तर पूर्ण रूप से नियंत्रित हो गया था। गंगा, यमुना जैसी जो पवित्र नदियां कई जगहों पर गंदे नालों की भांति बहती दिखाई देती थी, उनमें जल की निर्मल धारा बहने लगी थी। जिन नदियों को साफ करने के लिए पिछले कुछ दशकों में अनेक योजनाएं और समितियां बनी तथा नदियों की स्वच्छता के नाम पर अरबों-खरबों रुपये खर्च हो गए, लॉकडाउन के दौरान वे स्वतः ही स्वच्छ और निर्मल हो गई थी। पहली बार देखा गया था कि किस प्रकार लॉकडाउन के चलते लोगों के घरों में बंद रहने और सभी प्रकार के व्यावसायिक कार्य बंद हो जाने से हवा इतनी शुद्ध हो गई थी कि सैंकड़ों किलोमीटर दूर स्थित पर्वतों की चोटियां भी स्पष्ट दिखाई दी थी। जिन नन्हीं चिड़ियों की चहचहाहट को हमारे कान तरस गए थे, ब्रह्म मुहूर्त में उनकी मधुर आवाज फिर से सुनाई देनी लगी थी। प्रकृति के उस साफ-सुथरे स्वरूप को देखकर हर कोई खुश था। दरअसल प्रकृति को स्वयं अपनी मरम्मत करने और खुद को सजाने-संवारने का सुअवसर मिला था लेकिन इंसानी गतिविधियां पुनः शुरू होते ही प्रकृति के साथ निर्मम खिलवाड़ का वही दौर पुनः शुरू हो गया, जिसका परिणाम इस समय दुनिया के तमाम देश भुगत रहे हैं।
लॉकडाउन के दौर ने पूरी दुनिया को यह समझने का बेहतरीन अवसर दिया था कि इंसानी गतिविधियों के कारण ही प्रकृति का जिस बड़े पैमाने पर दोहन किया जाता रहा है, उसी के कारण स्वर्ग से भी सुंदर हमारी धरती कराहती रही है। प्रकृति मनुष्य को ऐसा न करने के लिए बार-बार किसी न किसी बड़ी आपदा के रूप में चेतावनियां भी देती रही है लेकिन उन चेतावनियों को सदा दरकिनार किया जाता रहा है। प्रकृति के साथ मानवीय छेड़छाड़ का ही नतीजा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में मौसम चक्र में बदलाव स्पष्ट दिखाई दिया है। वर्ष दर वर्ष अब जिस प्रकार मौसम के बिगड़ते मिजाज के चलते समय-समय पर तबाही देखने को मिल रही है, ऐसे में हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मौसम चक्र के बदलाव के कारण प्रकृति संतुलन पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी अनदेखी के कितने भयावह परिणाम होंगे। प्रकृति बार-बार मौसम चक्र में बदलाव के संकेत, चेतावनी तथा संभलने का अवसर देती रही है लेकिन हम आदतन किसी बड़े खतरे के सामने आने तक ऐसे संकेतों या चेतावनियों को नजरअंदाज करते रहे हैं, जिसका नतीजा अक्सर भारी तबाही के रूप में सामने आता रहा है।
पिछले तीन दशकों से पर्यावरण प्रदूषण के कारण जिस प्रकार मौसम चक्र तीव्र गति से बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं का आकस्मिक सिलसिला तेज हुआ है, उसके बावजूद यदि हम नहीं संभलना चाहते तो इसमें भला प्रकृति का क्या दोष? प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय में भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह बताया है कि किस प्रकार पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के चलते लोग अब तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं। हमारे जो पर्वतीय स्थान कुछ सालों पहले तक शांत और स्वच्छ वातावरण के कारण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित किया करते थे, आज वहां भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और ठंडे इलाकों के रूप में विख्यात पहाड़ भी तपने लगने हैं, वहां भी जल संकट गहराने लगा है। दरअसल पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन, सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरे जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन खूबसूरत पहाड़ों की ठंडक अब लगातार कम हो रही है। पहाड़ों में बढ़ती इसी गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें भी सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है।
हालांकि प्रकृति बार-बार अपना रौद्र रूप दिखाकर स्पष्ट चेतावनी देती रही है कि यदि उसके साथ अंधाधुंध खिलवाड़ बंद नहीं हुआ तो उसके घातक परिणाम होंगे लेकिन विड़म्बना है कि लगातार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखते रहने के बावजूद प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज कर दुनिया अपने विनाश को आमंत्रित कर रही है। दरअसल हम समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम कंक्रीट के जो जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं है बल्कि विकास के नाम पर हम अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें बारम्बार चेतावनी देती रही है कि हम यदि इसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है। यदि हम अभी भी नहीं संभले और हमने प्रकृति से साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण विषयों के जानकार और ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)
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