धर्मग्रंथों में प्राप्त आशा दशमी के माहात्म्य से यह सिद्ध होता है कि दुर्लभ से दुर्लभ मनोरथों की पूर्ति के लिए आशा दशमी व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए। यह व्रत विशेष रूप से स्त्रियों के लिए अत्यंत फलदायी, आरोग्यप्रद और श्रेयस्कर माना गया है।
जानें आशा दशमी व्रत के बारे में
हिंदू धर्म में व्रत और त्यौहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये जीवन में सकारात्मकता, आशा और उमंग का संचार करते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत कल्याणकारी पर्व है 'आशा दशमी व्रत' (Asha Dashami Vrat)। मान्यता है कि इस व्रत को सच्चे मन से करने से व्यक्ति की अधूरी आशाएं पूरी होती हैं और जीवन में कभी निराशा का सामना नहीं करना पड़ता। सनातन परंपरा में आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है क्योंकि इसी पावन तिथि पर आशा दशमी व्रत रखा जाता है. अपने नाम के अनुरूप इस व्रत को आशाओं या फिर कामनाओं की पूर्ति की लिए विशेष रूप से रखा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन 10 आशा देवियों की विशेष रूप से साधना-आराधना और व्रत किया जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हुए माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना करती है।
सनातन धर्म की विशाल आध्यात्मिक विरासत में 'आशा दशमी' का व्रत एक ऐसा प्रकाशपुंज है जो मनुष्य को घोर हताशा, अवसाद और संकट के अंधकार से बाहर निकालकर 'उम्मीद' की नई ऊर्जा से भर देता है। 'आशा' शब्द का अर्थ केवल इच्छा नहीं, बल्कि वह अटूट विश्वास है जो असंभव को संभव बनाने की शक्ति रखता है। 'दशमी' तिथि पूर्णता का प्रतीक है, जो यह सुनिश्चित करती है कि साधक को दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, आग्नेय, आकाश और पाताल) से शुभ फल प्राप्त हों। यह महापर्व मूलतः जगदंबा माता पार्वती और दसों दिशाओं की अधिष्ठात्री 'आशा देवियों' की आराधना का संगम है।
आशा दशमी व्रत का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार जिस आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि पर दसों दिशाओं की देवियों की पूजा पूजा और आशा दशमी व्रत रखा जाता है, वह 23 जुलाई 2026, बृहस्पतिवार को प्रात:काल 7:03 बजे प्रारंभ होकर अगले दिन 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को प्रात:काल 09:12 बजे समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार आशा दशमी का व्रत 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।
आशा दशमी व्रत 2026
आशा दशमी व्रत हिंदू धर्म में श्रद्धा, विश्वास और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। "आशा" का अर्थ है उम्मीद, विश्वास और सकारात्मक अपेक्षा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
आशा दशमी व्रत का धार्मिक महत्व
आशा दशमी व्रत सकारात्मक सोच, धैर्य और ईश्वर में अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा और व्रत करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है।
इस दिन पूजा करने से मान्यता है कि—
- मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
- परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है।
- मानसिक तनाव कम होता है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
आशा दशमी व्रत कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में एक धर्मपरायण परिवार अनेक कठिनाइयों से गुजर रहा था। उन्होंने श्रद्धा और विश्वास के साथ आशा दशमी व्रत रखा और भगवान की आराधना की। उनकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके सभी संकट दूर किए तथा उन्हें सुख, समृद्धि और संतोष का आशीर्वाद दिया।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और सकारात्मक विश्वास से कठिन परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।
आशा दशमी व्रत पूजा विधि
यदि आप आशा दशमी का व्रत कर रहे हैं, तो यह पूजा विधि अपनाएं—
- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।
- भगवान विष्णु या अपने इष्ट देव की प्रतिमा स्थापित करें।
- दीपक और धूप जलाएं।
- फल, फूल, तुलसी और नैवेद्य अर्पित करें।
- विष्णु सहस्रनाम या अपने इष्ट मंत्र का जाप करें।
- व्रत कथा का पाठ करें।
- आरती कर परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
आशा दशमी व्रत के नियम
- सात्विक भोजन करें या फलाहार रखें।
- क्रोध, झूठ और विवाद से बचें।
- मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का त्याग करें।
- जरूरतमंदों की सहायता करें।
- दिनभर भगवान का स्मरण करें।
आशा दशमी पर क्या करें?
- भगवान की विधि-विधान से पूजा करें।
- गरीबों को भोजन और वस्त्र दान करें।
- धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें।
- परिवार के साथ भजन-कीर्तन करें।
- सकारात्मक विचार रखें।
क्या नहीं करना चाहिए?
- किसी का अपमान न करें।
- क्रोध और नकारात्मकता से बचें।
- असत्य और छल-कपट से दूर रहें।
- नशे और तामसिक भोजन का सेवन न करें।
आशा दशमी व्रत के नियम
हिंदू मान्यता के अनुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाले आशा दशमी व्रत को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष से प्रारंभ करके कम से कम 6 महीने या फिर 1 या 2 साल तक रखना चाहिए. यदि आप किसी कारणवश आषाढ़ मास में इस व्रत को न प्रारंभ कर पाएं तो आप इसे किसी भी मास के शुक्लपक्ष से प्रारंभ कर सकते हैं. व्रत के पूर्ण होने पर विधि-विधान से उद्यापन करें और सुहागिन स्त्रियों के साथ मिलकर रात्रि जागरण करें. व्रत के पूर्ण होने पर अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी मंदिर के पुजारी को अन्न, वस्त्र और धन आदि का दान करना चाहिए।
आशा दशमी से जुड़ी पौराणिक कथा
1. सती दमयंती और राजा नल की गाथा: बिछोह से मिलन तक
प्राचीन काल में निषध देश के धर्मात्मा राजा नल अपने भाई से द्यूत (जुए) में सर्वस्व हार गए। विपत्ति के समय वे अपनी पत्नी दमयंती के साथ निर्जन वनों में भटकने लगे। एक समय ऐसा आया जब राजा नल के पास स्वयं को ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र भी नहीं रहे। घोर मानसिक पीड़ा और लज्जा के वश में, राजा नल अपनी सोती हुई पत्नी दमयंती को अकेले वन में छोड़कर चले गए।
जब दमयंती की आँख खुली, तो अपने प्रियतम को न पाकर वह विलाप करने लगी। भटकते हुए वह चेदि देश की राजमाता की शरण में पहुँची। वहाँ एक तपस्वी ब्राह्मण ने उसे 'आशा दशमी' व्रत की महिमा बताई। दमयंती ने पूर्ण निष्ठा और अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह व्रत किया। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से राजा नल के हृदय में अपनी पत्नी के प्रति विरह और कर्तव्य बोध जागा। अंततः दोनों का पुनर्मिलन हुआ और खोया हुआ राज्य व वैभव पुनः प्राप्त हुआ। यह कथा सिखाती है कि यह व्रत टूटे हुए रिश्तों और खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लाने में सक्षम है।
आशा दशमी व्रत के लाभ
हिंदू मान्यता के अनुसार जिस आशा दशमी का व्रत महाभारत काल से होता चला आ रहा है, उसे करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं और उसे सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मान्यता यह भी है कि जिस स्त्री का पति रूठ कर चला गया हो या फिर विदेश में फंसा हो तो वह इस व्रत के पुण्य प्रभाव से शीघ्र ही उसके पास वापस लौट आता है। आशा देवी के आशीर्वाद से उसे सुखी दांपत्य जीवन का सुख प्राप्त होता है।
- प्रज्ञा पांडेय
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'अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस' को मनाने का मुख्य मकसद विश्व भर में तेजी से घटती बाघों की आबादी को रोकने एवं उनके संरक्षण के प्रति समूची दुनिया को जागरूक करना होता है। आज का दिन जंगल की शान कहे जाने वाले बाघों के लिए समर्पित है। सालाना ये दिन 29 जुलाई को पूरे संसार में मनाया जाता है। शुरुआत रूस स्थित ‘पीटरर्सबर्ग टाइगर संरक्षण शिखर सम्मेलन’ के दौरान वर्ष-2010 में की गई थी। विश्व में बाघों की संख्या करीब 78 फीसदी तक घट चुकी है। गनीमत है कि भारत बाघों के मामले में अभी भी टाॅप पर है। वैश्विक स्तर के आंकड़ों पर गौर करें, तो अनुमानित, बाघों की संख्या पूरे विश्व में लगभग 5,500 के बीच है। इनमें से 72 प्रतिशत आबादी अकेले हिंदुस्तान में ही है। 2022 बाघ जनगणना में भारतीय जंगलों और टाइगर रिजर्व में 3,682 जंगली बाघ थे, इनमें पिछले दो वर्षों में इजाफा ठीक ठाक हुआ। 'ग्लोबल टागईर दिवस-2025' की थीम थी, 'हमारे हाथों में हैं बाघों का संरक्षण'।
बाघ आबादी में भारत के अलावा दूसरे पायदान पर रूस है। अखिल भारतीय बाघ जनगणना-2022 में बाघों की जितनी संख्या बताई गई थी, उनमें अब 12 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। हालांकि, संपूर्ण संख्या अगली गणना में ही सामने आएगी। बाघ संरक्षण की दिशा में बीते कुछ वर्षों से सराहनीय प्रयास हुए हैं। बाघों का सर्वेक्षण आधुनिक तकनीकों से किया जाने लगा है। प्रत्येक टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में कैमरे लगवाए गए हैं, ताकि उनकी मुकम्मल आबादी का पता चल सके और उनकी चहलकदमी पर नजर रखी जा सके। पिछली बाघ जनगणना के दौरान मध्यप्रदेश के शिवपुरी में एकाध बाघ दिखे, तो केंद्र सरकार ने 9 मार्च 2025 को उस जगह को 58 वां टाइगर रिजर्व स्थापित कर दिया जिसका नाम ‘माधव राष्ट्रीय उधान’ रखा गया। यह प्रदेश का 9वां टाइगर रिजर्व है।
गौरतलब है कि भारत में बाघों की गणना प्रत्येक 5 साल बाद की जाती है पिछली गणना 2022 में हुई थी, अगली गणना मार्च-2027 में करवाने का प्रस्ताव पारित है। बाघों की आबादी जितनी होनी चाहिए, उतनी है नहीं? बाघ संरक्षण पर केंद्र सरकार सालाना करीब 250 से 290 करोड़ रूपए खर्च करती है। वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में रखे गए प्रत्येक बाघ पर साल में 20 लाख से ज्यादा खर्च होता है। आजादी से पूर्व 100 साल पहले यानी 1926 के आसपास में हिंदुस्तान बाघों की आबादी सर्वाधिक एक लाख से भी अधिक हुआ करती थी, जो घटती-घटती आज कुछ हजारों तक ही सिमट गई। उत्तराखंड स्थित सिर्फ जिम कॉर्बेट में ही हजारों बाघ पाए जाते थे। हालांकि, सर्वाधिक संख्या आज भी वहीं है। पिछली गणना में 231 बाघ बताए गए थे। इस समय मध्यप्रदेश में 785, कर्नाटक में 524, बाघ हैं।
बाघों के लुप्त होते कारणों में आवासों की कमी, वन-विखंडन, अवैध शिकार, मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे मुख्य वजहें हैं। अगर ये रूक जाएं, तो बाघों की संख्या एकाएक बढ़ जाएगी। एशिया के कुछ देश ऐसे हैं जहां बाघ पूरी तरह से विलुप्त हो गए हैं उनमें, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम शामिल हैं। कुछ मुल्क विलुप्ति की कगार पर हैं। बाघों का अवैध शिकार समूचे संसार में तेजी से जारी है। होता क्यों है? ये भी जानना जरूरी है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बाघों के अंगों की सदैव से भारी डिमांड रही है जिनमें एशियाई बाघों की सबसे ज्यादा। बाघ संरक्षण क्षेत्रों में और सख्तियां बरतने की जरूरत है। कानूनों को कठोर और जुर्माने का भारी भरकम प्रावधान किए जाने की दरकार है। ताकि, कोई भी नुकसान पहुंचाने से पहले सौ बार सोचे। पिछले एक वर्ष में विभिन्न राज्यों में करीब 75 लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई, कईयों को जेल भी हुई। नरसिंहपुर, बालाघाट और बांधवगढ़ में बाघों के अवैध शिकार व अंगों की तस्करी मामलों मार्च 2025 में एक साथ दर्जनों शिकारियों की अरेस्टिंग हुई थी। आरोपियों पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 के तहत कार्रवाही की जाती है जिसमें 3 से 7 साल की कैद का प्रावधान है। इसे रिफाॅर्म किए जाने की अब जरूरत है।
मालूम हो, कि जंगली बाघ हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के सामंजस्य को बनाए रखने में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। भारत में टाइगरों के संरक्षण के लिए केंद्रीय और राज्य स्तरों पर विभिन्न अभियान बीते एकाध दशकों से जारी हैं। इन अभियानों के निरंतर चलते रहने से ही भारत में इस समय 58 टाइगर रिजर्व स्थापित हैं। ये बाघ रिजर्व 19 राज्यों में फैले हैं। सर्वाधिक टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में हैं। करीब 30 पहले भारत में बाघों की आबादी अचानक से घटनी शुरू हुई, तो सरकार ने ‘टाइगर टास्क फोर्स’ का गठन किया। जिसकी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 1 जुलाई 1973 को ‘प्रोजेक्टर टाइगर’ आरंभ करके घटती बाघों की आबादी को किसी तरह रोकना शुरू किया। इस प्रयोग से जबरदस्त फायदा भी हुआ।
बाघ संरक्षण निर्भर प्रजाति है। बाघों के संरक्षण में उनके रहने के निवास यानी अभयारण्यी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पर, इन जगहों पर लगातार बढ़ती शिकारियों की आमदगी ने उनकी शांत जिंदगी में खलल पहुंचा दिया है। शिकारी ज्यादातर बाघ अभयारण्यों के ईद-गिर्द घात लगाए बैठे होते हैं। बाघ को देखते ही उसका शिकार कर देते हैं। कई बार खबरें ऐसी भी आई कि शिकारियों का साथ वन्य कर्मी भी देते है। ऐसे गंभीर आरोप में कर्नाटक के कई वन्य कर्मी पकड़े भी गऐ। इस सिंडिकेट को किसी भी तरह से रोके जाने की दरकार है। अगर नहीं रोका गया हुआ, तो भारत वैश्विक स्तर पर बाघ आबादी का पहला पायदान खो देगा।
- डॉ. रमेश ठाकुर
सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!
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