सावन मास की शुरुआत होते ही हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक, गंगा गंगोत्री से लेकर रामेश्वरम तक सम्पूर्ण भारत शिवमय हो उठता है। सावन मास में शिवभक्तों की विशाल पदयात्राएं जो कांवड़ यात्रा के नाम से जानी जाती है, भारतीय संस्कृति की जीवंतता का अनुपम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। कंधों पर सुसज्जित कांवड़, मुख पर "बोल बम" का उद्घोष, हृदय में भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति। यही है कांवड़ यात्रा का वास्तविक स्वरूप।
कांवड़ यात्रा केवल एक सामान्य यात्रा नहीं है, बल्कि ये तपस्या, भक्ति और श्रद्धा की वह गाथा है जो शताब्दियों से चली आ रही है। धर्मशास्त्रों के अनुसार जब कांवड़ से जुड़े दोनों पात्र जिन्हें ब्रह्मघट और विष्णुघट कहा जाता है, पवित्र जल से भर लिए जाते है, तो उन्हें एक बांस की डण्डी के सहारे सजा-धजा कर और पूजित कर, स्थापित कर दिया जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार रूद्र अर्थात् शिव बांस में समाहित हैं। कांवड़िया कांवड़ के माध्यम से साक्षात ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तीनों की कृपा एक साथ प्राप्त करते हैं।
भारत में दो कांवड़ यात्राएं होती हैं, दिल्ली से उत्तराखंड-गंगोत्री, ऋषिकेश या हरिद्वार तक की कांवड़ यात्रा और बिहार और झारखंड में सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवड़ यात्रा। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से सैकड़ों-हजारों लोग, युवा से लेकर बुजुर्ग तक, जिनमें महिलाएं और कभी-कभी बच्चे भी कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं। कंधों पर लटका पवित्र जल भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें अक्सर भोला या भोले बाबा कहकर पुकारा जाता है। भोले का अर्थ भोलेनाथ, यानी भगवान शिव भी हो सकता है। इसलिए, तीर्थयात्री भोला और भोले हैं!
वर्तमान में, कांवड़ यात्रा विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक पदयात्राओं में मानी जाती है। आधुनिक समय में इसकी भव्यता अत्यधिक बढ़ी है, किंतु इसकी आध्यात्मिक जड़ें वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं में गहराई तक समाई हुई हैं। प्राचीन ग्रंथों में कांवड़ यात्रा का उल्लेख प्राय: किया जाता है। यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है कि "कांवड़ यात्रा" का उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है? इसका उत्तर थोड़ा सूक्ष्म है। "कांवड़" शब्द अपने वर्तमान अर्थ में पुराणों में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता। किंतु पवित्र नदी से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा का वर्णन अनेक पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलता है। वर्तमान कांवड़ यात्रा उसी प्राचीन शिवाभिषेक परंपरा का आधुनिक स्वरूप मानी जाती है। अर्थात् कांवड़ यात्रा का भाव पुराण सम्मत है, जबकि "कांवड़" शब्द अपेक्षाकृत उत्तरकालीन लोक प्रचलित नाम है। "कंवार" शब्द की व्युत्पत्ति, जिसका अर्थ "कंधा" है।
कांवड़ में दूर-दूर से पवित्र नदियों, खासकर गंगा का जल भरकर लाते हैं। इसे पैदल यात्रा करते हुए शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। इस संकल्प यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण होता है कांवड़ को अपने कंधे पर उठाकर ले जाना। यह कोई साधारण परंपरा नहीं है। इसके पीछे गहराई से जुड़ी हुई पौराणिक मान्यताएं छुपी हुई हैं।
वाकई में कांवड़ यात्रा का जिक्र किसी पौराणिक ग्रंथ में सीधे तौर पर नहीं मिलता है। इसका भी स्पष्ट रूप से कोई जिक्र नहीं है कि किसने पहली बार कांवड़ यात्रा शुरू की थी, लेकिन लोक व्यवहार में महाबली रावण, महाविष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम, अगस्त्य ऋषि, महर्षि मार्कंडेय, महारथी कर्ण और 61 नयनार संतों में से एक संत कनप्पा जैसे कई नाम शामिल हैं, जिन्होंने महादेव शिव को बड़ी सरल-सहज और आसान विधि से पूजन कर प्रसन्न किया था। रावण और भगवान परशुराम द्वारा तो शिवजी के लिए कांवड़ लाकर भी उनका जलाभिषेक करने का प्रसंग लोक कथाओं में मिलता है, हालांकि पुराणों में हर जगह इनके द्वारा की गई विधिवत पूजा का ही वर्णन मिलता है, जिसमें पंचोपचार पूजन से लेकर, षोडशोपचार पूजन तक का वर्णन मिलता है, फिर भी कांवड़ द्वारा जल लाकर शिवजी के अभिषेक का वर्णन नहीं मिलता है।
हालांकि कांवड़ शब्द का जिक्र रामायण में मिलता है। जहां राजा दशरथ द्वारा गलती से श्रवण कुमार की हत्या हो जाती है। इस प्रसंग में जब श्रवण कुमार के चरित्र का वर्णन आता है तब कांवड़ का जिक्र होता है। जहां पता चलता है कि श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर उन्हें तीर्थ यात्रा पर ले जाता है। कांवड़ असल में तराजू जैसी आकृति का एक नमूना होता है। श्रवण ने अपने माता-पिता को दोनों ओर बिठा लिया और कांवड़ कंधे पर रखकर चला।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तीर्थ क्षेत्र में दशानन रावण से जुड़ी कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। यहां नोएडा के पास बिसरख गांव को रावण की जन्मस्थली बताया जाता है। मेरठ को मयराष्ट्र बताते हुए उसे रावण की ससुराल बताया जाता है। यहीं बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां पर खुद रावण ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर शिवजी का जलाभिषेक किया था, जबकि रावण से भी सैकड़ों वर्ष पहले भगवान परशुराम ने इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी और 108 कलश से उनका अभिषेक किया था।
स्कंद पुराण में शिव उपासना के लिए रामोपाख्यान सर्ग में एक जिक्र आता है, जहां शिवगण नंदी और रावण की बातचीत होती है. इस स्थान पर नंदी कहते हैं कि जो प्राणी जलाशय से शिवालय तक पैदल ही गमन करता है, और फिर जल ले जाकर शिवालय को धोकर साफ करता है, वह बिना किसी विधान की पूजा के शिवलोक को प्राप्त कर लेता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि स्कंद पुराण में कांवड़ यात्रा का जिक्र नहीं है, लेकिन ये जरूर लिखा है कि 'जलाशय से जल लेकर शिवालय तक की यात्रा'. संभवतः आगे चलकर यही व्याख्या कांवड़ यात्रा के संदर्भ में ली गई होगी।
हालांकि कांवड़ यात्रा विशुद्ध ग्रामीण परंपरा है और इसकी शुरुआत इधर के आधुनिक काल में ही कभी हुई हो, इसकी अधिक संभावना हो सकती है। शिवजी की कावड़ यात्रा का जिक्र पुराणों में मिले न मिले, किसी रावण ने कांवड़ पहले चढ़ाई हो या नहीं, शिवभक्तों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके लिए तो बस इतनी सी बात है, वे शिव के हैं और शिव उनके हैं। वहीं कांवड़ के व्युत्पत्तिपरक जो अर्थ किए गए हैं, उनमें एक के अनुसार ‘क’ अक्षर अग्नि को द्योतक है और ‘आवर’ का अर्थ ठीक से वरण करना। प्रार्थना यह है कि अग्नि अर्थात स्रष्टा, पालक एवं संहारकर्ता परमात्मा हमारा मार्गदर्शक बने और वही हमारे जीवन का लक्ष्य हो तथा हम अपने राष्ट्र और समाज को अपनी शक्ति से सक्षम बनाएं।
गंगाजल, पारद, पाषाण, धतूराफल आदि सबमें शिव सत्ता मानी गई है। अतः सब प्राणियों, जड़-जंगम पदार्थों में स्वयं भूतनाथ पशुपतिनाथ की सुगमता और सुलभता ही तो आपको देवाधिदेव महादेव सिद्ध करती है। कांवड़ शिव के उन सभी रूपों को नमन है। कंधे पर गंगा को धारण किए श्रद्धालु इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं। यों भी कह सकते हैं कि कांवड़ यात्रा शिव के कल्याणकारी रूप और निष्ठा के नीर से उसके अभिषेक को तीव्र रूप में प्रतिध्वनित करती है।
वास्तव में, कांवड़ यात्रा का यह धार्मिक उत्सव न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण धरोहर भी है। कांवड़िये इस यात्रा के माध्यम से न केवल अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं, बल्कि यह यात्रा उन्हें एकजुटता और भाईचारे का भी अनुभव कराती है। इस दौरान भक्तों की भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता को दर्शाता है। सही मायनों में, कांवड़ यात्रा भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में निहित सिद्धांतों की पुनर्स्थापना है। कांवड़ यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं है, ये महादेव को शीतल जल अर्पित करने की परंपरा है, ये लोक-उत्सव है, समानता का सन्देश है क्योंकि चारों तरफ भगवा ही भगवा दिखता है जो सनातन संस्कृति का प्रतीक है।
- डॉ. आशीष वशिष्ठ,
स्वतंत्र पत्रकार
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25 जुलाई को देवशयनी एकादशी व्रत है, देवशयनी एकादशी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन से विष्णुजी चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास शुरु होता है। देवशयनी एकादशी के दिन सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने से घर में खुशहाली और समृद्धि आती है तो आइए हम आपको देवशयनी एकादशी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें देवशयनी एकादशी व्रत के बारे में
पंडितों के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन से चातुर्मास, यानी चार महीने का पवित्र समय प्रारंभ होता है। इस साल 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी। देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु राजा बलि के पास पाताल लोक में चार महीने के लिए विश्राम करने चले जाते हैं और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। यह समय आंतरिक शांति, ध्यान, भक्ति और साधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस एकादशी तिथि से श्रीहरि 4 महीनों के लिए क्षीसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। पंडितों के अनुसार अगर आपके जीवन में परेशानी चल रही है या कोई भी काम नहीं बन रहा है, तो इस दिन विष्णुजी की श्रद्धापूर्वक पूजा करने के साथ-साथ आप उन्हें उनके प्रिय फूल अर्पित कर सकते हैं।
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को चढाएं ये फूल, होंगे लाभान्वित
शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु को पीले रंग के फूल बेहद प्रिय हैं। ऐसे में उनकी पूजा के दौरान पीले पुष्प जरूर अर्पित करें। साथ ही, आप उन्हें ताजे गेंदे के फूलों की माला भी अर्पित कर सकते हैं। उनके वस्त्र का रंग भी पीला ही है, ऐसे में इस रंग की माला उन्हें चढ़ाने से विष्णुजी प्रसन्न हो सकते हैं। ऐसे में जातक के कार्यों में आ रही बाधा दूर हो सकती है। साथ ही प्रगति के योग भी बनते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु को कमल के फूल भी बहुत प्रिय हैं। साथ ही, इस पुष्प को देवी लक्ष्मी का भी प्रिय माना गया है। ऐसे में देवशयनी एकादशी के दिन संभव हो तो विष्णु भगवान को कमल के फूल जरूर अर्पित करने चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु के साथ-साथ माता लक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त हो सकती है। साथ ही, घर की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी रहती है। इसके अलावा, आप देवशयनी एकादशी पर आप अन्य पीले रंग के फूल भी भगवान विष्णु को अर्पित कर सकते हैं।
चातुर्मास है संयम, साधना और दान का काल
देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक मास तक चलने वाले चातुर्मास को आत्मसंयम, भक्ति, तप, जप और दान का श्रेष्ठ काल माना जाता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को स्थगित कर दिया जाता है, क्योंकि इस दौरान भगवान विष्णु की अनुपस्थिति मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास में सात्त्विक जीवन अपनाने तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस चार माह की अवधि में संयम, साधना, सत्संग, सेवा और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। यह समय स्वयं को ईश्वर भक्ति में लीन करने और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व भी है खास
देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु राजा बलि के पास पाताल लोक में चार महीने के लिए विश्राम करने चले जाते हैं और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। यह समय आंतरिक शांति, ध्यान, भक्ति और साधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
देवशयनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक धर्मात्मा और पराक्रमी राजा मान्धाता का राज्य था। उनके राज्य में प्रजा सुखी और संतुष्ट थी। एक समय वहां वर्षा रुक गई, जिससे सूखा और भयंकर अकाल पड़ गया। प्रजा दुखी और भूख से त्रस्त होने लगी। राजा ने कई धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और तप करवाए, लेकिन फिर भी कोई समाधान नहीं हुआ। तब राजा तपोभूमि पर महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुँचे और उन्होंने स्थिति बताई। महर्षि अंगिरा ने कहा— "हे राजन्! यह समय देवताओं की विशेष कृपा का है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'देवशयनी एकादशी' कहा जाता है। इस दिन जो व्यक्ति व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करता है और रात्रि जागरण करता है, वह सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति पाता है। आप स्वयं यह व्रत कीजिए और प्रजा को भी प्रेरित कीजिए।" राजा ने महर्षि की आज्ञा का पालन किया और पूरे राज्य में देवशयनी एकादशी का आयोजन कराया। लोगों ने उपवास रखा, पूजन किया, रात्रि जागरण और भजन-संकीर्तन किया। फलस्वरूप भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और जल्द ही मेघ गर्जना के साथ भारी वर्षा हुई। धरती पुनः हरी-भरी हो गई और प्रजा को अन्न-जल की प्राप्ति हुई। तब से इस व्रत का विशेष महत्त्व स्थापित हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार, जब देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से पूछा कि "हे प्रभु! आप दिन-रात जागकर सृष्टि का संचालन करते हैं, क्या आपको कभी विश्राम नहीं चाहिए?" तब श्रीहरि विष्णु ने उत्तर दिया – "हे लक्ष्मी! मैं आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक क्षीरसागर में योगनिद्रा में विश्राम करूँगा। इस काल में सृष्टि का संचालन देवगण करेंगे।" तभी से इस तिथि को "देवशयनी एकादशी" कहा जाने लगा। इसी काल में भगवान विष्णु राजा बलि के लोक में निवास करते हैं। वामन अवतार की कथा के अनुसार जब भगवान ने तीन पग में सारा ब्रह्मांड माँग लिया, तब बलि ने आत्मसमर्पण कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने वचन दिया कि वे चातुर्मास में उसके लोक में निवास करेंगे। देवशयनी एकादशी से ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जिसमें विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन आदि शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। यह समय तप, संयम, साधना और सेवा का काल माना गया है। इस दिन का उपवास, पूजन और कथा श्रवण करने से समस्त पापों का नाश होता है और भक्त को वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है।
देवशयनी एकादशी पर करें इन चीजों का दान, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन अन्न दान को बहुत पुण्यकारी माना गया है। इस दिन गरीबों, जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन कराना शुभ माना जाता है। गेहूं, चावल, दाल, फल और अन्य खाद्य सामग्री का दान करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। इसके अलावा, इस दिन जरूरतमंद लोगों को वस्त्र दान करना भी शुभ माना जाता है। साफ और नए कपड़ों का दान करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
इस दिन जल से जुड़ी वस्तुओं का दान भी विशेष फलदायी माना जाता है। गर्मी के मौसम को देखते हुए पानी के घड़े, शरबत या अन्य पेय पदार्थों का दान करना पुण्य का कार्य माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जल दान करने से व्यक्ति को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस दिन पीला चंदन, पीला केसर, पीले फूल और गरीबों व जरूरतमंदों को जूते-चप्पल का दान करें। इन चीजों का दान करना बहुत शुभ माना जाता है।
देवशयनी एकादशी के दिन मौसमी फल जैसे आम, तरबूज आदि करें। साथ ही पीले वस्त्र, नए वस्त्र का दान करें। इन चीजों के दान से सुख-समृद्धि बढ़ती है। इसके अलावा गाय की सेवा करना, जरूरतमंदों की मदद करना और धार्मिक कार्यों में सहयोग देना भी इस दिन अच्छा माना जाता है।
- प्रज्ञा पाण्डेय
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