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ईरान संघर्ष खत्म होने के बाद अमेरिका 'नाटो' पर फिर से कर सकता है विचार
वाशिंगटन, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नाटो से हटने पर विचार कर रहे हैं। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इसके संकेत दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यूरोपीय साथियों के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान संघर्ष के बाद यूएस इस गठबंधन पर फिर से समीक्षा कर सकता है।
रूबियो ने नाटो की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर सहयोगी देश अमेरिकी सैन्य अभियानों में बाधा डालते हैं, तो इस गठबंधन का महत्व कम हो जाता है। उन्होंने फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा, “अगर नाटो सिर्फ यूरोप की रक्षा के लिए है, लेकिन जरूरत पड़ने पर हमें सैन्य अड्डों का उपयोग नहीं करने देता, तो यह एकतरफा व्यवस्था बन जाती है।”
राष्ट्रपति ट्रंप ने इससे भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वह नाटो से अमेरिका को बाहर निकालने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। उन्होंने ब्रिटिश दैनिक द टेलिग्राफ को दिए इंटरव्यू में गठबंधन को “पेपर टाइगर” बताया और कहा कि इससे बाहर निकलना “सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि गंभीर विचार का विषय” है। ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ उनके अभियान में साथ नहीं दिया।
विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा को लेकर अमेरिका की नाराजगी सामने आई है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अहम मार्ग है, लेकिन इसके बावजूद सहयोगी देशों ने नौसैनिक बल तैनात करने में हिचक दिखाई, जिससे वॉशिंगटन में असंतोष बढ़ा।
अमेरिकी प्रशासन ने इस विवाद को ईरान संघर्ष के व्यापक संदर्भ में रखा है। रूबियो के अनुसार, अमेरिकी सेना अपने लक्ष्यों को हासिल करने के करीब है और ईरान की वायुसेना, नौसेना, मिसाइल सिस्टम और रक्षा ढांचे को काफी हद तक कमजोर किया जा चुका है। उन्होंने कहा, “हम अपने उद्देश्यों को हासिल करने के बहुत करीब हैं,” और यह अभियान ईरान के लिए निकट भविष्य में परमाणु हथियार विकसित करना लगभग असंभव बना देगा।
हालांकि, यूरोपीय नेताओं ने इस रुख का विरोध किया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने नाटो को “दुनिया का सबसे प्रभावी सैन्य गठबंधन” बताते हुए इसका समर्थन दोहराया और स्पष्ट किया कि ब्रिटेन ईरान संघर्ष में शामिल नहीं होगा।
1949 में स्थापित नाटो लंबे समय से अमेरिका और यूरोप के बीच सुरक्षा सहयोग का आधार रहा है। ये संगठन सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर आधारित है। लेकिन मौजूदा हालात में यह सिद्धांत केवल सदस्य देशों पर हमले की स्थिति में लागू होता है, न कि ईरान जैसे बाहरी संघर्षों पर। ऐसे में ट्रंप के बयान ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों में बढ़ती दरार को और गहरा कर रहे हैं।
--आईएएनएस
केआर/
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