अक्षरा सिंह के घर में नहीं है गैस सिलेंडर? मां ने बनाया मास्टर प्लान, वीडियो कर देगा हैरान
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में उछाल का असर अब आम लोगों की जेब पर भी साफ दिखाई देने लगा है. खासकर कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में हाल ही में हुई बढ़ोतरी ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. महंगाई के इस दौर में कई जगहों से ऐसी खबरें भी सामने आ रही हैं कि लोग गैस सिलेंडर को ब्लैक में बेचकर ज्यादा पैसा कमाने की कोशिश कर रहे हैं. इसी गंभीर मुद्दे को भोजपुरी इंडस्ट्री की जानी-मानी अभिनेत्री अक्षरा सिंह ने मजेदार अंदाज में पेश किया है. दरअसल, अक्षरा के घर में एलपीजी सिलेंडर को लेकर सीक्रेट प्लानिंग चल रही है. भोजपुरी एक्ट्रेस ने अपनी मां के साथ मजाकिया वीडियो शेयर किया है जिसे देखकर पहले लगता है कि शायद वो भी गैस की किल्लत से जूझ रही हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि एक्ट्रेस की मां ब्लैक में गैस बेचकर पैसे कमाने का मास्टर प्लान रही हैं. इस वीडियो को देखकर फैंस की हंसी नहीं रुक रही है.
रिसर्च के अनुसार- इंसानों से 50% ज्यादा चापलूस है एआई:चापलूसी करने वाली एआई रोमांस और डेटिंग की दुनिया को बदल रही
खुद की तारीफ से खुश होना इंसानी स्वभाव है। बाजार में ऐसे दर्जनों एप लॉन्च हो चुके हैं जो लोगों की इस कमजोरी का फायदा उठाते हैं। एआई आधारित ये वर्चुअल पार्टनर अब डेटिंग और रोमांस के स्पेस में तेजी से जगह बना रहे हैं। ये एआई साथी न केवल मनचाही बातचीत करते हैं, बल्कि यूजर की भावनाओं और पसंद के अनुसार खुद को ढालते हुए एक आदर्श बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड जैसा व्यवहार करते हैं। जहां वास्तविक रिश्तों में मतभेद, आलोचना और जटिलताएं होती हैं, वहीं एआई साथी लगातार सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं। जैसे कि वे कहते हैं, ‘मैं तुमसे मिलने के लिए बहुत उत्साहित हूं, ‘तुमसे मिलना... बातें करना.. मेरे जीवन का मूल उद्देश्य है’। रिसर्चर इन्हें चापलूस एआई कहते हैं। इंसानों से भी 50% ज्यादा चापलूस है एआई - रिसर्च साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक नए शोध पत्र में 11 प्रमुख लैंग्वेज मॉडलों में सामाजिक चाटुकारिता की माप की गई। मॉडलों ने इंसानों की तुलना में करीब 50% ज्यादा चाटुकारिता दिखाई। उन्होंने यूजर की अनैतिक, अवैध या हानिकारक व्यवहार से जुड़ी गलत बातों का भी समर्थन किया। स्टैनफोर्ड और कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में भी ऐसे ही नतीजे आए। 22 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड हो चुके एप शिक्षाविद जेम्स मुल्डून के मुताबिक फ्रेंड एंड कम्पैनियन कहलाने वाले ये एप 22 करोड़ से ज्यादा बार डाउनलोड किए जा चुके हैं। अकेलेपन और भावनात्मक असुरक्षा के बीच लोग ऐसा साथी खोज रहे हैं जो आलोचना के बजाय उनकी बात को सही ठहराए। वास्तविकता से पलायन की प्रवृत्ति को बढ़ावा समाजशास्त्र की प्रोफेसर और ‘आर्टिफिशियल इंटिमेसी’ की लेखिका शेरी टर्कल कहती हैं, यदि एआई यूजर की हां में हां मिलाएगा तो लोग वास्तविकता स्वीकार करने से बचेंगे। चापलूस एआई के साथ बातचीत यूजर में गलतफहमी पैदा कर देती है कि वह हर बार सही है।
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