Raja Raghuvanshi Mother: राजा रघुवंशी का दूसरा जन्म? कुंडली ने सबको चौंकाया! MP News
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तेल नहीं, इस केमिकल की कमी से दुनिया में मचेगा हाहाकार, मिडिल ईस्ट जंग बन रही है वजह
मिडिल ईस्ट में एक महीने से जारी युद्ध का असर अब सिर्फ ऊर्जा सप्लाई तक सीमित नहीं रहा है. एक ऐसी गैस की किल्लत पैदा हो गई है जिसका कोई विकल्प नहीं है और इसके बिना दुनिया की बड़ी टेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनियों का काम रुक सकता है. हम बात कर रहे हैं हीलियम की, जो एक रंगहीन, गंधहीन और गैर-विषाक्त गैस है. यह गैस उन कंप्यूटर चिप्स को बनाने के लिए बेहद जरूरी है जो आज की एआई (AI) तकनीक और वैश्विक अर्थव्यवस्था को रफ्तार दे रहे हैं. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ गुब्बारों में भरने वाली गैस समझते हैं, लेकिन असल में यह मॉडर्न टेक्नोलॉजी की जान है.
कतर में उत्पादन रुकने से मचा हड़कंप
दुनिया में हीलियम का सबसे बड़ा भंडार कतर और अमेरिका के पास है. हाल ही में कतर के रास लफान (Ras Laffan) स्थित दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी (LNG) प्लांट में उत्पादन ठप हो गया है. इससे दुनिया भर में हीलियम की कुल सप्लाई का लगभग 30 पर्सेंट हिस्सा अचानक से कम हो गया है. अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, कतर दुनिया की एक-तिहाई हीलियम सप्लाई करता है. जानकारों का कहना है कि प्लांट की खराब हुई प्रोडक्शन लाइनों को ठीक करने में सालों का समय लग सकता है, जो वैश्विक टेक इंडस्ट्री के लिए बहुत बुरी खबर है.
चिप बनाने में क्यों जरूरी है हीलियम
कंप्यूटर चिप या सेमीकंडक्टर बनाने की प्रक्रिया में हीलियम का रोल बहुत महत्वपूर्ण है. चिप बनाने के दौरान 'वेफर्स' (सिलिकॉन डिस्क) पर बहुत बारीक सर्किट छापे जाते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में तापमान को स्थिर रखना जरूरी होता है. हीलियम एक बेहतरीन थर्मल कंडक्टर है, इसलिए चिप कंपनियां वेफर के पीछे हीलियम गैस छोड़ती हैं ताकि वहां से गर्मी को तेजी से बाहर निकाला जा सके. दक्षिण कोरिया की सांगम्योंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जोंग-ह्वान ली का कहना है कि मौजूदा तकनीक में हीलियम का कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है. इसके बिना चिप बनाना लगभग नामुमकिन है.
मेडिकल और स्पेस सेक्टर पर भी बुरा असर
हीलियम सिर्फ चिप बनाने के काम ही नहीं आती, बल्कि मेडिकल क्षेत्र में एमआरआई (MRI) मशीनों के सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट को ठंडा रखने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है. इसके अलावा स्पेस इंडस्ट्री में रॉकेट फ्यूल टैंकों को साफ करने के लिए भी इसकी जरूरत पड़ती है. स्पेसएक्स (SpaceX) और ब्लू ओरिजिन (Blue Origin) जैसी कंपनियों के बढ़ते रॉकेट लॉन्च के कारण इसकी मांग पहले से ही ज्यादा थी. अब सप्लाई घटने से इन सभी क्षेत्रों में अफरा-तफरी मच गई है और कंपनियां दूसरे विकल्पों की तलाश में जुट गई हैं.
सप्लाई चेन और ट्रांसपोर्ट की चुनौतियां
हीलियम गैस को स्टोर करना और एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है. इसके अणु इतने छोटे होते हैं कि वे मामूली से छेद से भी बाहर निकल जाते हैं. कतर इसे लिक्विड फॉर्म में बदलकर 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के रास्ते भेजता है. इन कंटेनरों में हीलियम को सिर्फ 35 से 48 दिनों तक ही रखा जा सकता है. युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की पकड़ मजबूत होने से करोड़ों डॉलर के हीलियम कंटेनर समुद्र में फंसे हुए हैं. अगर समय रहते इन्हें नहीं निकाला गया, तो गैस गर्म होकर उड़ जाएगी.
स्मार्टफोन और कारों पर पड़ेगा सीधा असर
इंडस्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हीलियम की यह कमी लंबे समय तक बनी रही, तो कंपनियां उत्पादन कम करने या पूरी तरह बंद करने पर मजबूर हो जाएंगी. टाइडल वेव सॉल्यूशंस के पार्टनर कैमरून जॉनसन का कहना है कि इसका सीधा असर स्मार्टफोन, ऑटोमोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों की कीमतों पर पड़ेगा. रूस भी हीलियम का बड़ा उत्पादक है, लेकिन अमेरिकी और यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के कारण वहां से सप्लाई लेना संभव नहीं है. अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका पर टिकी हैं, जो इस गैस का सबसे बड़ा उत्पादक देश है.
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