अश्विनी भिडे को बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) का नया आयुक्त नियुक्त किया गया है। वे अपने व्यापक प्रशासनिक अनुभव और सुप्रसिद्ध दृढ़ कार्यशैली के साथ शहर के सर्वोच्च नागरिक पद पर आसीन होंगी। वे इस पद पर आसीन होने वाली पहली महिला हैं। महाराष्ट्र सरकार में एक विश्वसनीय चेहरे के रूप में जानी जाने वाली भिडे से मुंबई के नगरपालिका प्रशासन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है।
अश्विनी भिडे कौन हैं?
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की करीबी सहयोगी, भिडे पहले मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) में सचिव के पद पर कार्यरत थीं। उन्होंने मुंबई की महत्वाकांक्षी भूमिगत मेट्रो परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और यह सुनिश्चित किया कि प्रमुख अवसंरचना कार्य समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ें। उन्हें बीएमसी में अतिरिक्त आयुक्त के रूप में भी पूर्व अनुभव है, जिससे उन्हें नगर प्रशासन की गहरी समझ प्राप्त है। अपने निर्णायक दृष्टिकोण के लिए जानी जाने वाली भिडे को एक तेज और कुशल अधिकारी माना जाता है। भिडे, 1995 बैच की आईएएस अधिकारी हैं, जो अपने दृढ़ और परिणामोन्मुखी प्रशासनिक दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध हैं। उनसे 2030 तक पूर्ण कार्यकाल की उम्मीद है। इस अवधि के दौरान, वह मुंबई के अवसंरचना विकास, स्वच्छता व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और व्यापक शहरी प्रशासन सहित प्रमुख जिम्मेदारियों की देखरेख करेंगी।
हालिया बीएमसी चुनाव और राजनीतिक संदर्भ
पिछले बीएमसी चुनाव 15 जनवरी, 2026 को हुए थे, जिसमें मतदान सुबह 7:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक चला और मतगणना 16 जनवरी को हुई। चुनाव एक ही चरण में हुए थे। 2017 के चुनावों में अविभाजित शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। 2026 में भाजपा ने 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया।
बीएमसी क्या करती है?
बृहन्मुंबई नगर निगम मुंबई का स्थानीय शासी निकाय है। 1888 के बॉम्बे नगर निगम अधिनियम के तहत स्थापित, यह भारत का सबसे धनी और सबसे बड़ा नागरिक निकाय है, जिसका वार्षिक बजट कई छोटे राज्यों से भी अधिक है। बीएमसी मुंबई में दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाली आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के लिए जिम्मेदार है। इनमें जल आपूर्ति, सीवरेज और जल निकासी प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन, सड़कें और बुनियादी ढांचा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा, अग्नि और आपदा प्रबंधन, और शहरी नियोजन और विकास शामिल हैं।
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भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे ने न केवल विपक्ष बल्कि भाजपा के भीतर भी मतभेद उजागर कर दिए हैं। पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब निशिकांत दुबे ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बीजू पटनायक को जवाहरलाल नेहरू और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के बीच कड़ी बताया। इस बयान को बीजू जनता दल ने बेहद आपत्तिजनक और असत्य करार दिया। पार्टी का आरोप है कि इस तरह की टिप्पणी से बीजू पटनायक की देशभक्ति पर सवाल उठाने की कोशिश की गई है।
उल्लेखनीय है कि बीजू पटनायक को देश के महान स्वतंत्रता सेनानी, कुशल पायलट और दूरदर्शी नेता के रूप में जाना जाता है। ऐसे में उनके बारे में इस तरह के आरोपों ने राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है।
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि भाजपा के ही वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत जय पांडा ने खुले तौर पर निशिकांत दुबे के बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा कि बीजू पटनायक केवल ओडिशा ही नहीं बल्कि पूरे देश के महान नेता थे और उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाना पूरी तरह अनुचित और हास्यास्पद है। पांडा ने अपने बयान में बीजू पटनायक को आधुनिक भारत के सबसे बड़े देशभक्तों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में देश की सेवा कई भूमिकाओं में की, चाहे वह पायलट के रूप में हो, उद्योगपति के रूप में या फिर राजनीतिक नेता के रूप में।
हम आपको यह भी बता दें कि इस मामले को लेकर संसद में भी हंगामा देखने को मिला। बीजद सांसद सस्मित पात्रा ने सोमवार को राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि निशिकांत दुबे द्वारा दिए गए बयान पूरी तरह झूठे और मनगढ़ंत हैं। उन्होंने इसे बेहद शर्मनाक बताया और विरोध स्वरूप पार्टी ने सदन से वाकआउट किया। सस्मित पात्रा ने यह भी आरोप लगाया कि निशिकांत दुबे ने बीजू पटनायक को सीआईए एजेंट तक कह दिया, जो कि एक गंभीर और अपमानजनक आरोप है। इस मुद्दे को लेकर उन्होंने एक संसदीय समिति से भी इस्तीफा दे दिया।
उधर, ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजद प्रमुख नवीन पटनायक ने भी इस विवाद पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने निशिकांत दुबे के बयान को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए कहा कि ऐसा बयान देने वाले को मानसिक चिकित्सक की जरूरत है। नवीन पटनायक ने यह भी याद दिलाया कि चीन युद्ध के समय जवाहरलाल नेहरू ने बीजू पटनायक को दिल्ली में अपने पास कार्यालय दिया था ताकि वह रणनीतिक मामलों में सहयोग कर सकें। इससे उनकी भूमिका और देश के प्रति योगदान साफ होता है।
दूसरी ओर, विवाद बढ़ने के बाद निशिकांत दुबे ने सफाई देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य बीजू पटनायक का अपमान करना नहीं था। उन्होंने कहा कि वह केवल नेहरू गांधी परिवार के कार्यों पर सवाल उठा रहे थे और उसी संदर्भ में उन्होंने बात कही थी। निशिकांत दुबे ने यह भी कहा कि भाजपा और जनसंघ हमेशा बीजू पटनायक का सम्मान करते रहे हैं, खासकर उस समय जब कांग्रेस ने उनके साथ अन्याय किया था। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर किसी को उनकी बात से ठेस पहुंची है तो वह अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए तैयार हैं।
हम आपको बता दें कि बीजू पटनायक भारतीय राजनीति के ऐसे नेता थे जिनकी पहचान केवल एक राज्य तक सीमित नहीं थी। उन्होंने इंडोनेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन में मदद की, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान महत्वपूर्ण मिशनों में भाग लिया और ओडिशा के विकास में अहम भूमिका निभाई। उनकी छवि एक साहसी और राष्ट्रवादी नेता की रही है। यही कारण है कि उनके खिलाफ किसी भी तरह की टिप्पणी पर व्यापक प्रतिक्रिया सामने आती है।
बहरहाल, यह पूरा विवाद भारतीय राजनीति में बयानबाजी की सीमा और जिम्मेदारी को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। जहां एक ओर राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के प्रति सम्मान बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। इस मुद्दे ने यह भी दिखा दिया कि किसी भी बयान का असर केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पार्टी के भीतर भी मतभेद पैदा कर सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद किस दिशा में जाता है और क्या इससे राजनीतिक संवाद की शैली में कोई बदलाव आता है। फिलहाल तो दिल्ली से लेकर भुवनेश्वर तक का सियासी माहौल गर्माया हुआ है।
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