श्वेत प्रदर को नजरअंदाज न करें, बढ़ सकती है गंभीर संक्रमण की संभावना
नई दिल्ली, 30 मार्च (आईएएनएस)। श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया) महिलाओं में होने वाली एक समस्या है, लेकिन इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। अक्सर महिलाएं इसे सामान्य या हार्मोनल बदलाव मानकर नजरअंदाज कर देती हैं, लेकिन अगर समय पर ध्यान न दिया जाए, तो यह गंभीर संक्रमण का कारण बन सकता है।
ल्यूकोरिया दो तरह की होती है फिजियोलॉजिकल और पाथोलॉजिकल। ओव्यूलेशन (पीरियड के बीच का समय), पीरियड आने से पहले, गर्भावस्था के दौरान किशोरावस्था (puberty) में हार्मोनल बदलाव के कारण फिजियोलॉजिकल ल्यूकोरिया होता है। इस स्थिति में शरीर से निकलने वाले पानी का रंग सफेद या पारदर्शी होता है। कोई खुजली, जलन या दर्द नहीं होती और न गंध आती है, लेकिन अगर स्राव में रंग, गंध या मात्रा असामान्य हो, तो यह किसी संक्रमण या अन्य समस्या का संकेत हो सकता है। इसमें कैंडिडा, ट्राइकोमोनास या बैक्टीरियल संक्रमण, क्रॉनिक सर्विसाइटिस या कभी-कभी सिनाइल वेजिनाइटिस और पीआईडी (पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज) संक्रमण जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं।
श्वेतप्रदर के कारणों का पता लगाने के लिए डॉक्टर से मिलकर पूरी जांच कराना जरूरी है। इसमें विस्तृत मेडिकल हिस्ट्री लेना, पेल्विक और योनि जांच करना और जरूरत पड़ने पर वजाइनल स्मीयर से संक्रमण का परीक्षण करना शामिल है। यदि गंभीर कारणों को पहले ही नजरअंदाज कर दिया जाए, तो यह ऊपर की जननांग संरचनाओं में फैल सकता है और एंडोमेट्राइटिस, साल्पिंगाइटिस और पेरिटोनाइटिस जैसे गंभीर संक्रमण का रूप ले सकता है।
ऐसे में घरेलू और आयुर्वेदिक उपाय भी काफी मददगार हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, आंवला पाउडर या पेस्ट, जिसे शहद और चीनी के साथ लिया जाए, दिन में दो बार 15 दिन तक लेने से योनि स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है। इसके अलावा न्याग्रोधा, उद्धुम्बरा, अश्वत्थ और प्लाक्षा के ताजे पत्तों का पेस्ट, जिसे तांडुलोदक यानी चावल धोने के पानी में मिलाकर उपयोग किया जाए, दिन में दो बार 15 दिन तक करने से भी लाभ मिलता है।
इसके साथ ही कुछ जरूरी सावधानियां अपनाना भी जरूरी है। व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखें, खासकर मासिक धर्म के दौरान। कपड़े के बजाय पैड्स का इस्तेमाल करें और समय-समय पर उसे बदलते रहें। इसके साथ ही शारीरिक संबंध बनाते समय प्रोटेक्शन का इस्तेमाल जरूर करें।
--आईएएनएस
पीआईएम/वीसी
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रूस ने एक बार फिर दोस्त भारत के लिए अपने खजाना, होर्मुज संकट के बीच भेज रहा ये खास चीज
कहावत है कि सच्ची दोस्ती वही होती है, जो मुश्किल समय में साथ खड़ी रहे. मौजूदा वैश्विक हालात में भारत और रूस के रिश्ते इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करते नजर आ रहे हैं. मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़ी अनिश्चितता ने दुनिया भर की ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है. ऐसे समय में रूस ने भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाई है.
होर्मुज संकट और भारत की चुनौती
ईरान द्वारा होर्मुज मार्ग पर पाबंदी जैसे हालात ने भारत सहित कई देशों के लिए तेल और गैस आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी. यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है. ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी ऊर्जा आपूर्ति को बिना बाधा बनाए रखना. इस स्थिति में भारत ने अपने भरोसेमंद सहयोगी रूस की ओर रुख किया, जिसने तुरंत मदद का हाथ बढ़ाया.
रूस से बढ़ता ‘काला सोना’ आयात
अब केवल कच्चे तेल और गैस ही नहीं, बल्कि कोयले के क्षेत्र में भी रूस भारत का बड़ा सहयोगी बनकर उभरा है. रूस से बड़े पैमाने पर उच्च गुणवत्ता वाले कोयले की सप्लाई शुरू हो चुकी है। यह कोयला भारत के बिजलीघरों और औद्योगिक इकाइयों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मार्च के शुरुआती तीन हफ्तों में रूस से कोयले के आयात में फरवरी के मुकाबले करीब 25 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं, साल-दर-साल आधार पर यह वृद्धि लगभग 50% तक पहुंच गई है। यह तेजी दर्शाती है कि भारत ने तेजी से अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव किया है.
ऊर्जा सुरक्षा के लिए रणनीतिक बदलाव
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत आने वाले समय में रूस से कोयले के आयात को और बढ़ा सकता है. मिडिल ईस्ट में जारी अस्थिरता और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम को देखते हुए भारत वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ा रहा है.
विश्लेषकों के अनुसार, मार्च के अंत तक कोयला आयात में 20-35 प्रतिशत तक और वृद्धि हो सकती है. इसका मतलब है कि आने वाले समय में भारतीय बंदरगाहों पर रूसी कोयले से भरे जहाजों की संख्या और बढ़ेगी.
बढ़ती बिजली मांग और राहत की उम्मीद
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और गर्मियों के मौसम में बिजली की मांग अपने चरम पर पहुंच जाती है. ऐसे में कोयले की कमी बड़े संकट का कारण बन सकती है. लेकिन रूस से मिल रही नियमित आपूर्ति ने इस चिंता को काफी हद तक कम कर दिया है.
इस ‘काले सोने’ की मदद से भारत अपने पावर प्लांट्स को पूरी क्षमता से चला सकेगा. साथ ही, इससे बिजली की कीमतों को स्थिर रखने में भी मदद मिलेगी, जिसका सीधा फायदा आम जनता और उद्योगों दोनों को होगा.
भरोसे की साझेदारी
कुल मिलाकर, मौजूदा वैश्विक संकट के बीच भारत और रूस की ऊर्जा साझेदारी और मजबूत होती दिख रही है. रूस ने एक बार फिर साबित किया है कि वह केवल एक व्यापारिक साझेदार ही नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद दोस्त भी है. आने वाले समय में यह सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूती देगा.
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