रूस ने एक बार फिर दोस्त भारत के लिए अपने खजाना, होर्मुज संकट के बीच भेज रहा ये खास चीज
कहावत है कि सच्ची दोस्ती वही होती है, जो मुश्किल समय में साथ खड़ी रहे. मौजूदा वैश्विक हालात में भारत और रूस के रिश्ते इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करते नजर आ रहे हैं. मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़ी अनिश्चितता ने दुनिया भर की ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है. ऐसे समय में रूस ने भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाई है.
होर्मुज संकट और भारत की चुनौती
ईरान द्वारा होर्मुज मार्ग पर पाबंदी जैसे हालात ने भारत सहित कई देशों के लिए तेल और गैस आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी. यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है. ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी ऊर्जा आपूर्ति को बिना बाधा बनाए रखना. इस स्थिति में भारत ने अपने भरोसेमंद सहयोगी रूस की ओर रुख किया, जिसने तुरंत मदद का हाथ बढ़ाया.
रूस से बढ़ता ‘काला सोना’ आयात
अब केवल कच्चे तेल और गैस ही नहीं, बल्कि कोयले के क्षेत्र में भी रूस भारत का बड़ा सहयोगी बनकर उभरा है. रूस से बड़े पैमाने पर उच्च गुणवत्ता वाले कोयले की सप्लाई शुरू हो चुकी है। यह कोयला भारत के बिजलीघरों और औद्योगिक इकाइयों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मार्च के शुरुआती तीन हफ्तों में रूस से कोयले के आयात में फरवरी के मुकाबले करीब 25 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं, साल-दर-साल आधार पर यह वृद्धि लगभग 50% तक पहुंच गई है। यह तेजी दर्शाती है कि भारत ने तेजी से अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव किया है.
ऊर्जा सुरक्षा के लिए रणनीतिक बदलाव
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत आने वाले समय में रूस से कोयले के आयात को और बढ़ा सकता है. मिडिल ईस्ट में जारी अस्थिरता और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम को देखते हुए भारत वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ा रहा है.
विश्लेषकों के अनुसार, मार्च के अंत तक कोयला आयात में 20-35 प्रतिशत तक और वृद्धि हो सकती है. इसका मतलब है कि आने वाले समय में भारतीय बंदरगाहों पर रूसी कोयले से भरे जहाजों की संख्या और बढ़ेगी.
बढ़ती बिजली मांग और राहत की उम्मीद
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और गर्मियों के मौसम में बिजली की मांग अपने चरम पर पहुंच जाती है. ऐसे में कोयले की कमी बड़े संकट का कारण बन सकती है. लेकिन रूस से मिल रही नियमित आपूर्ति ने इस चिंता को काफी हद तक कम कर दिया है.
इस ‘काले सोने’ की मदद से भारत अपने पावर प्लांट्स को पूरी क्षमता से चला सकेगा. साथ ही, इससे बिजली की कीमतों को स्थिर रखने में भी मदद मिलेगी, जिसका सीधा फायदा आम जनता और उद्योगों दोनों को होगा.
भरोसे की साझेदारी
कुल मिलाकर, मौजूदा वैश्विक संकट के बीच भारत और रूस की ऊर्जा साझेदारी और मजबूत होती दिख रही है. रूस ने एक बार फिर साबित किया है कि वह केवल एक व्यापारिक साझेदार ही नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद दोस्त भी है. आने वाले समय में यह सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूती देगा.
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पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के साथ ज्यादती बेइंतहा, ईद पर नहीं पढ़ने दी गई नमाज : मानवाधिकार संगठन
इस्लामाबाद, 30 मार्च (आईएएनएस)। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक बार फिर अहमदिया समुदाय को धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित किए जाने के आरोप सामने आए हैं। जो अवसर पूरे समाज को एकजुट करने का होना चाहिए था, वह कथित तौर पर भेदभाव और बहिष्कार की एक और मिसाल बनकर रह गया।
अल्पसंख्यक अधिकार संगठन वॉइस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) की रिपोर्ट के मुताबिक, ईद के मौके पर कई इलाकों में पुलिस की भारी तैनाती, प्रशासनिक रुकावटें और कानूनी कार्रवाई के डर ने अहमदिया समुदाय के लोगों को खुलकर इबादत करने से रोक दिया। कई स्थानों पर धार्मिक सभाएं या तो बाधित कर दी गईं या शुरू ही नहीं हो सकीं।
रिपोर्ट में कहा गया, यह कोई एकबारगी घटना नहीं है, बल्कि साल-दर-साल दोहराया जाने वाला एक पैटर्न है। हर वर्ष अहमदिया समुदाय को समान तरह की पाबंदियों, दबावों और संदेशों का सामना करना पड़ता है—कि सार्वजनिक धार्मिक जीवन में उनकी भागीदारी स्वीकार्य नहीं है।
वीओपीएम ने इस स्थिति के लिए पाकिस्तान के कानूनी ढांचे को जिम्मेदार ठहराया है, जिसमें अहमदिया समुदाय की धार्मिक गतिविधियों पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगाए गए हैं। समय के साथ ये कानून न केवल नीतियों को प्रभावित करते हैं, बल्कि समाज के नजरिए को भी आकार देते हैं, जिससे भेदभाव सामान्य होता जा रहा है और स्थानीय प्रशासन बिना किसी विरोध के ऐसे कदम उठाता रहता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियां, जिनका काम नागरिकों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना है, कई मामलों में खुद पाबंदियों का साधन बन जाती हैं। शांतिपूर्ण इबादत में बार-बार हस्तक्षेप न केवल समुदाय को अलग-थलग करता है, बल्कि जवाबदेही और कानून के शासन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
अहमदिया समुदाय के लिए इसका असर सिर्फ एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। ईद जैसे पर्व, जो एकता, आस्था और खुशी का प्रतीक होते हैं, उनके लिए असमानता और अलगाव की याद दिलाने वाले बन जाते हैं। हर साल खुले तौर पर त्योहार मनाने से वंचित रहना उनके भीतर अलगाव की भावना को और गहरा करता है।
रिपोर्ट में यह विरोधाभास भी उजागर किया गया है कि एक ओर पाकिस्तान धार्मिक स्वतंत्रता और उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई की बात करता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती। वीओपीएम का कहना है कि जब तक इस दोहराए जा रहे पैटर्न को खत्म नहीं किया जाता, तब तक समान अधिकारों का वादा अधूरा ही रहेगा और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव जारी रहेगा।
--आईएएनएस
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