गांव में या शहर में गैस की सबसे जल्दी डिलिवरी कहां होती है? ईरान युद्ध के बीच जानें जवाब
ईरान और अमेरिका-इस्राइल के बीच जारी युद्ध का आज 27वां दिन है. युद्ध जब से शुरू हुआ है, तब से रसोई गैस को लेकर लोगों के मन में एक बड़ा सवाल है कि आखिर पहले शहर में सिलेंडर मिलेगा या फिर गांव में. सरकार ने गैस की बढ़ती मांग और नए-नए बदलावों के बीच बुकिंग और गैस की सप्लाई को लेकर कुछ नियम बनाएं हैं. ये नियम ये सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है कि हर किसी के पास बराबरी से गैस पहुंच सके. ऐसे मामले में आपका ये जानना आवश्यक है कि शहर और गांव में असली फर्क क्या होता है और किसे कब गैस मिलती है.
शहर में क्या है नियम?
शहरी इलाकों में गैसों की सप्लाई गांव की तुलना में तेज और व्यवस्थित ढंग से होती है. यहां गैस के कनेक्शन ज्यादा हैं और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क भी मजबूत हैं, जिस वजह से डिलीवरी में ज्यादा परेशानी नहीं होती है. अगली बुकिंग के लिए शहरों में कम से कम 25 दिनों का इंतजार करना पड़ता है. आम तौर पर बुकिंग के बाद दो-तीन दिन में डिलीवरी हो ही जाती है.
शहरों में सप्लाई चेन मजबूत होने से लेट कम होता है. आसान भाषा में बताएं तो शहरों में सिलेंडर मिलने की स्पीड अधिक होती है. आपने अगर समय पर बुकिंग की है तो आपको अधिक इंतजार नहीं करना होगा. इसी वजह से शहरी उपभोक्ताओं को आसानी से गैस सप्लाई मिल जाती है.
गांव में लगता है ज्यादा समय?
दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में स्थिति थोड़ी सी अलग होती है. यहां का डिलीवरी नेटवर्क उतना मजबूत नहीं है और ट्रांसपोर्टेशन भी एक बड़ा फैक्टर बन जाता है. शहरी इलाकों में जैसे 25 दिन का गैप होता है ठीक वैसे ही ग्रामीण इलाकों में अगली बुकिंग के लिए 45 दिनों का गैप जरूरी है. ग्रामीण इलाकों में कई जगह सड़कें अच्छी नहीं होती, जिस वजह से डिलीवरी में देरी होती है.
सप्लाई सीमित होने पर प्रायोरिटी भी तय की जाती है.
ट्रांसपोर्टेशन और खराब सड़कों की वजह से ऐसा नहीं है कि गांवों में गैस नहीं मिलती. सरकार ने बस सप्लाई सीमित होने की वजह से प्रायरिटी भी तय की है. चूकिं स्मूद तरीके से गैस की सप्लाई नहीं हो पा रही है और सरकार सप्लाई को बैलेंस्ड रखने के लिए ऐसे फैसले कर रही है. सरकार के फैसले का उद्देश्य हर क्षेत्र में गैस की पहुंच सुनिश्चित करना और ब्लैक मार्केटिंग को रोकना है.
तो आखिर पहले किसे मिलता है सिलेंडर?
आसान भाषा में बोलें तो शहरों में गैस जल्दी पहुंचती है. इसका मतलब ये नहीं है कि गांवों को पीछे रखा जाता है. देरी की वजह नियम और लॉजिस्टिक्स हैं. सरकार का पूरा फोकस अभी बराबरी से गैस के वितरण करने पर है, जिससे शहरी या ग्रामीण किसी भी इलाके में गैस की कमी न हो.
कुर्सी पर लंबे समय तक बैठकर काम करने वालों की सेहत को होता है नुकसान
नई दिल्ली, 26 मार्च (आईएएनएस)। आज के समय में ऑफिस में सारा काम कंप्यूटर के सहारे कुर्सी पर बैठकर किया जाता है और लगातार 8-9 घंटे कुर्सी पर जमकर बैठने से कई तरह की परेशानियां होने लगती हैं।
ऐसे में अक्सर आपने देखा होगा कि ऑफिस में बैठकर काम करने वाले लोगों का पाचन बाकी लोगों की तुलना में ज्यादा खराब होता है लेकिन ऐसा क्यों? इसके पीछे कई कारण हैं लेकिन आयुर्वेद में इसका भी हल छिपा है।
ऑफिस में बैठकर लगातार काम करने से चलना-फिरना कम हो गया है। तुरंत खाकर कुर्सी पर बैठ जाते हैं या फिर डेस्क पर ही खा लेते हैं। इससे शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है और गैस बनना, पेट बाहर निकलना, ब्लोटिंग की दिक्कत, वजन का बढ़ना और भूख कम लगने जैसी शिकायतें होने लगती हैं। अगर ऐसी जीवनशैली लगातार लंबे समय तक रहती है, तो धीरे-धीरे पाचन मंद हो जाता है व खाना पचने की बजाय पेट में सड़ने लगता है और शरीर बीमारियों का शिकार हो जाता है।
आयुर्वेद के अनुसार सिर्फ अच्छा भोजन करना ही काफी नहीं होता है बल्कि भोजन के साथ अच्छी आदतों को भी अपनाना जरूरी है। अगर भोजन को शांत मन और खुशी से किया जाए तो भोजन शारीरिक ताकत के साथ मन के विकारों को भी कम करता है। अगर आप भी ऑफिस में ऐसी ही जीवनशैली में काम करते हैं तो आज ही संभल जाए। इसके लिए भोजन को शांत मन से करें और धीरे-धीरे चबा-चबा कर खाएं। भोजन को जल्दी खत्म करने में किसी तरह की तेजी न दिखाएं। आराम से भोजन को स्वाद के साथ खाएं।
दूसरा, खाना खाते समय मोबाइल से दूरी रखें और भोजन को करने के बाद तुरंत कुर्सी पर न बैठें बल्कि कुछ मिनट के लिए टहलें। भले ही 10 मिनट का समय निकालें लेकिन टहलें जरूर। पूरे दिन कुर्सी पर लगातार नहीं बैठें। 1-2 घंटे के बीच थोड़ा पैदल चलें और खूब सारा पानी भी पीएं। गर्मियों में शरीर को ज्यादा पानी की जरूरत होती है। ऐसे में भरपूर मात्रा में पानी जरूर पीएं। इसके अलावा, दोपहर के वक्त तला-भुना कम खाएं और हल्का व पौष्टिक भोजन लें। हल्का भोजन पचने में आसान होता है।
--आईएएनएस
पीएस/पीएम
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