ईरान को ट्रम्प के दामाद पर भरोसा नहीं:शांति वार्ता के लिए उपराष्ट्रपति वेंस पहली पसंद, कहा- वे दूसरों के मुकाबले कम नुकसानदेह
ईरान ने ट्रम्प सरकार को संकेत दिया है कि वह राष्ट्रपति की चुनी हुई टीम के बजाए जेडी वेंस के साथ बातचीत करना ज्यादा पसंद करेगा। CNN के मुताबिक सूत्रों का कहना है कि ईरान वेंस को युद्ध विरोधी मानता है। ईरान ट्रम्प के दामाद और सलाहकार जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ के साथ बातचीत नहीं करना चाहता। ईरान का कहना है उनके साथ बातचीत चल रही थी तभी अमेरिका-ईजराइल ने हमला कर दिया था। एक राजनयिक सूत्र ने CNN के हवाले से कहा- पुरानी टीम के साथ बातचीत की कोई संभावना नहीं है। ईरान को लगता है कि बातचीत का प्रस्ताव सिर्फ अमेरिका-इजराइल के लिए एक और चाल है, ताकि वे फिर से हमले के लिए कुछ और समय ले सकें। व्हाइट हाउस बोला- कौन बातचीत करेगा यह ट्रम्प तय करेंगे इससे पहले ब्रिटिश अखबार गार्जियन ने भी मंगलवार को रिपोर्ट दी थी कि ईरान के अधिकारी स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर से बात नहीं करना चाहते। हालांकि व्हाइट हाउस ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह गलत बताया और इसे विदेशी प्रचार बताया। व्हाइट हाउस ने साफ किया है कि अमेरिका की तरफ से बातचीत कौन करेगा, इसका फैसला सिर्फ राष्ट्रपति ट्रम्प ही करेंगे। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने साफ कहा कि केवल राष्ट्रपति ट्रम्प ही तय करेंगे कि उनकी ओर से बातचीत कौन करेगा। ट्रम्प ने भी कहा कि इस प्रक्रिया में वेंस के साथ-साथ मार्को रुबियो, स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर भी शामिल हैं। ईरान को ट्रम्प के दामाद पर भरोसा नहीं ट्रम्प के करीबी लोगों के मुकाबले, वेंस को तेहरान में ऐसा नेता माना जा रहा है जो पश्चिम एशिया में सैन्य कार्रवाई को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं है। CNN के एक सूत्र के मुताबिक, “ऐसा माना जा रहा है कि वेंस इस संघर्ष को खत्म करने की कोशिश करेंगे।” एक और सूत्र ने CNN से कहा कि अगर बातचीत का कोई नतीजा निकालना है, तो जेडी वेंस को शामिल होना चाहिए। विटकॉफ और कुशनर के साथ कुछ नहीं होगा। यह पहले भी हो चुका है। ईरान के लिए यह पसंद का नहीं, बल्कि नुकसान कम करने का मामला है। वह ऐसे व्यक्ति को चुनना चाहता है जिसका इस युद्ध से कम जुड़ाव हो। ट्रम्प प्रशासन में बढ़ रहा वेंस का कद जानकारी से यह संकेत मिलता है कि वेंस, जो पहले विदेशों में सैन्य दखल के खिलाफ रहे हैं, अब मुख्य वार्ताकार बन सकते हैं। इससे यह भी दिखता है कि सरकार में उनका प्रभाव बढ़ रहा है और ईरान उन्हें अमेरिका के अलग तरह के प्रतिनिधि के रूप में देख रहा है। वेंस पहले भी मिडिल ईस्ट में अमेरिकी दखल के खिलाफ रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने ट्रम्प का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि उन्हें भरोसा है कि ट्रम्प सही फैसला लेंगे और पिछली गलतियों को नहीं दोहराया जाएगा। वेंस में बढ़ती दिलचस्पी यह दिखाती है कि वह अब अमेरिकी विदेश नीति में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। अगर ट्रम्प उन्हें आगे करते हैं, तो यह उनके लिए खुद को एक सफल सौदेबाज साबित करने का बड़ा मौका होगा। ईरान की तरफ से गालिबाफ कर सकते हैं बातचीत इससे पहले ट्रम्प ने सोमवार को दावा किया था कि वह ईरान में सबसे सम्मानित शख्स के साथ बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। तब माना गया था कि वे शख्स गालिबाफ हो सकते हैं। हालांकि गालीबाफ ने कुछ ही देर बाद सोशल मीडिया पर लिखा कि अमेरिका के साथ कोई बातचीत नहीं हुई है। ऐसी खबरें वित्तीय और तेल बाजारों को प्रभावित करने के लिए फैलाई जा रही हैं। हालांकि ऐसा अभी भी माना जा रहा है कि ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ बातचीत में शामिल हो सकते हैं। लेकिन जैसे अमेरिका को यह पसंद नहीं कि ईरान उसके वार्ताकार चुने, वैसे ही ईरान भी अपने प्रतिनिधि को लेकर सतर्क है। किसी भी बातचीत के लिए ईरान के सर्वोच्च नेता की मंजूरी जरूरी होगी। ईरान बिना शर्त युद्धविराम या आत्मसमर्पण नहीं चाहता। वह खुद को मजबूत स्थिति में मानते हुए बातचीत करना चाहता है। उनका मानना है कि क्षेत्र में दबाव बनाने में वह आगे हैं। खाड़ी देशों ने मध्यस्थता से दूरी बनाई फिलहाल स्थिति यह है कि बातचीत शुरू होने से पहले ही यह तय करना मुश्किल हो गया है कि टेबल पर कौन बैठेगा। इस बीच खाड़ी देशों ने मध्यस्थता से दूरी बना ली है। कतर ने कहा कि अगर ईरान खाड़ी देशों पर हमले बंद नहीं करता, तो वह बातचीत में मदद नहीं करेगा। ईरान ने यह शर्त नहीं मानी, जिसके बाद ये देश पीछे हट गए। उधर सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी इस कूटनीतिक प्रक्रिया से दूरी बनाते दिख रहे हैं। वॉशिंगटन में इस बात पर चर्चा हो रही है कि अगर बातचीत नाकाम होती है तो क्या ये देश सैन्य कार्रवाई में साथ देंगे। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच सरकार स्तर पर बातचीत जारी है। दोनों पक्ष 15 प्वाइंट्स की एक योजना पर अपने-अपने मांग और रियायतों की समीक्षा कर रहे हैं। बातचीत के लिए तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों के नाम सामने आए हैं, लेकिन अभी कोई औपचारिक बैठक तय नहीं हुई है। जंग से पहले ईरान-अमेरिका में हुई थी बातचीत अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच 28 फरवरी को जंग शुरू होने से पहले दोनों पक्षों के बीच कई दौर की शांति वार्ता हुई थी। यह बातचीत बातचीत सीधे नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष तरीके से हुई थी। इसमें दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने नहीं बैठे, बल्कि एक मिडिएटर के जरिए अपनी बात पहुंचा रहे थे। ओमान ने इस दौरान मिडिएटर की भूमिका निभाई थी। ओमान के विदेश मंत्री सैय्यद बदर बिन हमद अल बुसैदी दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचा रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, युद्ध से पहले कम से कम 2 से 3 राउंड की बातचीत हुई: पहला दौर- 6 फरवरी 2026 को ओमान के मस्कट में हुआ दूसरा दौर- फरवरी के आखिरी सप्ताह में जिनेवा में हुआ इसके अलावा 26–27 फरवरी के बीच बैकचैनल (गोपनीय) बातचीत हुई कौन-कौन शामिल थे: अमेरिका- स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर ईरान- अब्बास अराघची (विदेश मंत्री) बातचीत का एजेंडा: नतीजा: दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी और शर्तों पर मतभेद के कारण कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका। इसी बीच 28 फरवरी 2026 को हालात बिगड़ गए और अमेरिका-इजराइल की सैन्य कार्रवाई के साथ संघर्ष शुरू हो गया।
अप्रैल में रूस से 6 करोड़ बैरल कच्चा-तेल खरीदेगा भारत:यह डिस्काउंट की जगह प्रीमियम पर मिलेगा; ईरान जंग के बीच सप्लाई सुधारने की कोशिश
मिडिल ईस्ट में जारी इजराइल-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस संकट से निपटने के लिए भारतीय रिफाइनर्स ने रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदने का फैसला किया है। जानकारी के मुताबिक, अप्रैल महीने की डिलीवरी के लिए भारत ने रूस से लगभग 60 मिलियन यानी 6 करोड़ बैरल कच्चे तेल का सौदा किया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावित होने के बाद भारत को सऊदी अरब और इराक से होने वाली सप्लाई में दिक्कत आ रही थी। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत अब फिर से रूसी तेल पर भरोसा जता रहा है। फरवरी के मुकाबले दोगुनी हुई रूसी तेल की खरीद डेटा इंटेलिजेंस फर्म केपलर के मुताबिक, अप्रैल के लिए रूस से की गई यह खरीदारी फरवरी के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है। हालांकि, यह मात्रा मार्च के लगभग बराबर ही है। मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण सप्लाई रुकने से भारतीय कंपनियां अब उन रास्तों को तलाश रही हैं, जहां से तेल की सप्लाई बिना किसी रुकावट के हो सके। इसी वजह से पिछले कुछ हफ्तों में रूसी तेल की मांग में अचानक तेजी आई है। क्रूड से 15 डॉलर तक महंगा मिल रहा रूसी तेल हैरानी की बात यह है कि जो रूसी तेल कभी भारत को भारी डिस्काउंट पर मिलता था, अब उसके लिए प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये सौदे ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर 5 से 15 डॉलर प्रति बैरल के प्रीमियम (अतिरिक्त कीमत) पर बुक किए गए हैं। सप्लाई की कमी और मांग ज्यादा होने की वजह से कीमतों में यह उछाल देखा जा रहा है। अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी भारत की इस खरीदारी के पीछे अमेरिका द्वारा दी गई एक विशेष छूट का बड़ा हाथ है। अमेरिका ने भारत को उन रूसी तेल कार्गो को लेने की अनुमति दी है, जो 5 मार्च से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे। बाद में इस छूट का दायरा बढ़ाकर 12 मार्च कर दिया गया। यह छूट विशेष रूप से इसलिए दी गई ताकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से पैदा हुई तेल की किल्लत को दूर किया जा सके। सऊदी और इराक का तेल खाड़ी देशों में फंसा पिछले साल के अंत में अमेरिकी दबाव के कारण भारत ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी थी और सऊदी अरब व इराक जैसे देशों की ओर रुख किया था। लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद इन देशों का अधिकांश तेल 'पर्शियन गल्फ' के अंदर ही फंस गया है। नई दिल्ली के अधिकारियों को उम्मीद है कि जब तक होर्मुज में स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक अमेरिका अपनी छूट की समय सीमा को आगे बढ़ाता रहेगा। MRPL-हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी की बाजार में वापसी दिसंबर से रूसी तेल से दूरी बनाने वाली भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां अब फिर से एक्टिव हो गई हैं। मंगलौर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) और हिंदुस्तान मित्तल एनर्जी लिमिटेड जैसी कंपनियों ने रूसी बाजार में वापसी की है। इन कंपनियों का फोकस अब घरेलू मांग को पूरा करने के लिए स्टॉक जमा करने पर है। वेनेजुएला से भी आयात बढ़ा, 4 साल का रिकॉर्ड टूटा सिर्फ रूस ही नहीं, भारत अपनी तेल की जरूरतों के लिए वेनेजुएला पर भी निर्भरता बढ़ा रहा है। केपलर के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में वेनेजुएला से भारत का कच्चा तेल आयात 8 मिलियन बैरल तक पहुंच सकता है। यह अक्टूबर 2020 के बाद का उच्चतम स्तर है। भारत अपनी सप्लाई को डाइवर्सिफाई करने के लिए दक्षिण अमेरिकी देशों से भी संपर्क बढ़ा रहा है। डिमांड के कारण रूस को अच्छा मुनाफा हो रहा भारत और चीन जैसे देशों की बढ़ती मांग और ऊंची कीमतों के कारण रूस को अच्छा मुनाफा हो रहा है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक का सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट रेवेन्यू रूस इसी समय कमा रहा है। मार्च 2022 के बाद रूसी तेल की मांग और कमाई अपने हाई पर है। मार्केट एनालिस्ट्स का कहना है कि भारत के पास अभी रूस के अलावा कोई बेहतर विकल्प नहीं है, क्योंकि वेनेजुएला की क्वालिटी रूसी तेल जैसी नहीं है और मिडिल ईस्ट का रास्ता असुरक्षित है। ये खबर भी पढ़ें… घर के पास PNG पाइपलाइन, तो कनेक्शन लेना ही होगा: कंपनी 3 महीने का नोटिस देगी, कनेक्शन नहीं लिया तो LPG सप्लाई बंद होगी अगर आपके घर के पास गैस पाइपलाइन आ गई है और आपने PNG कनेक्शन नहीं लिया है, तो अगले 3 महीने में आपके घर आने वाला LPG सिलेंडर बंद कर दिया जाएगा। मिडिल-ईस्ट में जारी युद्ध और गैस की किल्लत को देखते हुए केंद्र सरकार ने 'नेचुरल गैस और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूशन ऑर्डर 2026' लागू किया है। पूरी खबर पढ़ें…
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